जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की पाबंदी और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

प्रशासनिक अधिकार सरकार के पास लेकिन मौलिक अधिकारों की रक्षा करना अदालत की जिम्मेदारी

हर्षिता यादव  Picture
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दिल्ली के जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन के निर्धारित स्थलों की सूची से हटाने का मामला अब केवल प्रशासनिक निर्णय तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकारों, सरकार की जिम्मेदारी और न्यायपालिका की संवैधानिक भूमिका पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। दिल्ली पुलिस के 11 अक्टूबर 2026 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रदर्शन स्थल निर्धारित करना प्रशासन का अधिकार है, तो क्या सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में सरकार को आदेश दे सकता है अथवा केवल सलाह देकर अपनी भूमिका पूरी करेगा? इसका उत्तर संविधान की व्यवस्था और न्यायिक समीक्षा की शक्तियों में छिपा है।
 
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक निर्णय लेने का अधिकार प्राप्त है। राजधानी दिल्ली जैसे महानगर में यातायात, सुरक्षा, सार्वजनिक सुविधाओं और सरकारी संस्थानों के कामकाज को ध्यान में रखकर प्रदर्शन स्थलों का निर्धारण करना प्रशासनिक जिम्मेदारी है। लेकिन प्रशासनिक अधिकारों का अर्थ यह नहीं है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित करने का असीमित अधिकार भी अधिकारियों के पास आ जाता है। सरकार का प्रत्येक निर्णय संविधान की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। यदि किसी आदेश से नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं, तो न्यायालय उसकी वैधानिकता और औचित्य की समीक्षा कर सकता है।
 
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों के कारण नागरिक अपनी समस्याएं सरकार तक पहुंचा सकते हैं, नीतियों का विरोध कर सकते हैं और सार्वजनिक महत्व के विषयों पर अपनी असहमति व्यक्त कर सकते हैं। हालांकि ये अधिकार निरंकुश नहीं हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अंतर्गत निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसलिए असली प्रश्न प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने के अधिकार का नहीं, बल्कि प्रतिबंध की आवश्यकता, औचित्य और उसके अनुपात का है।
 
जंतर-मंतर लंबे समय से देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, कर्मचारियों और राजनीतिक दलों के लिए अपनी बात रखने का प्रमुख स्थान रहा है। संसद और केंद्रीय सरकारी संस्थानों के निकट होने के कारण यहां होने वाले प्रदर्शनों का संदेश जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और आम नागरिकों तक अपेक्षाकृत आसानी से पहुंचता है। यदि इस स्थान को पूरी तरह प्रदर्शन सूची से बाहर कर दिया जाता है और रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान तथा सीबीडी मैदान जैसे दूसरे स्थान निर्धारित किए जाते हैं, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि इस बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी और इसके पीछे कौन-से व्यावहारिक आधार हैं।
 
प्रदर्शन स्थल की दूरी अपने आप में किसी आदेश को असंवैधानिक नहीं बनाती। प्रशासन को भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा, यातायात और नागरिक सुविधाओं का ध्यान रखना पड़ता है। जंतर-मंतर पर शौचालय, पेयजल, चिकित्सा सहायता और पर्याप्त स्थान जैसी सुविधाओं की कमी हो सकती है। ऐसे में किसी बड़े और सुविधाजनक स्थल पर प्रदर्शन आयोजित करने का सुझाव जनहित के अनुकूल भी हो सकता है। लेकिन यदि वैकल्पिक स्थानों तक पहुंचना कठिन हो, सार्वजनिक परिवहन की सुविधा पर्याप्त न हो अथवा संबंधित अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने की संभावना बहुत कम हो जाए, तो इस निर्णय के प्रभाव का निष्पक्ष आकलन आवश्यक हो जाता है।
 
यहीं सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण बनती है। प्रशासनिक निर्णय लेना और उसकी न्यायिक समीक्षा करना दो अलग-अलग विषय हैं। न्यायालय सामान्य परिस्थितियों में स्वयं यह तय नहीं करता कि शहर में कौन-सी सड़क पर प्रदर्शन होना चाहिए या किस मैदान को निर्धारित किया जाए। यह काम संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों का है। लेकिन यदि उनके निर्णय को मनमाना, भेदभावपूर्ण या मौलिक अधिकारों के विपरीत बताया जाता है, तो न्यायालय यह जांच सकता है कि फैसला कानून के अनुरूप लिया गया या नहीं। वह यह भी देख सकता है कि प्रशासन ने नागरिकों के अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने के लिए उचित विचार किया था या नहीं।
 
इस मामले में उपलब्ध समाचार के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है। यह कदम महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे सरकार के विरुद्ध अंतिम निर्णय या याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला मानना उचित नहीं होगा। नोटिस जारी करने का अर्थ है कि अदालत संबंधित पक्षों का पक्ष सुनकर विवाद के कानूनी पहलुओं की जांच करना चाहती है। सरकार को यह बताने का अवसर मिलेगा कि जंतर-मंतर को निर्धारित स्थलों की सूची से हटाने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया और वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था किस आधार पर की गई।
 
यदि सरकार यह स्पष्ट कर देती है कि निर्णय सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, यातायात और प्रदर्शनकारियों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर लिया गया है तथा नए स्थलों पर प्रभावी प्रदर्शन के लिए पर्याप्त व्यवस्था उपलब्ध है, तो अदालत प्रशासनिक निर्णय में हस्तक्षेप करने से बच सकती है। इसके विपरीत, यदि आदेश के पीछे ठोस आधार नहीं मिलते, निर्णय लेने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण पहलुओं की अनदेखी दिखाई देती है या नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर अनुचित प्रभाव पड़ता है, तो न्यायालय सरकार को पुनर्विचार करने का निर्देश दे सकता है। परिस्थितियों और कानूनी आधारों के अनुसार वह आदेश को निरस्त करने या उसमें संशोधन करने जैसी राहत पर भी विचार कर सकता है।
 
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। अदालत सरकार को सुझाव दे सकती है, उससे जवाब मांग सकती है और कानूनी निर्देश भी जारी कर सकती है। सलाह और आदेश एक समान नहीं होते। यदि न्यायालय केवल किसी वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार करने का सुझाव देता है, तो उसका स्वरूप अलग होगा। लेकिन यदि अंतिम न्यायिक आदेश में सरकार या पुलिस को निर्धारित समय में निर्णय लेने, उचित प्रक्रिया अपनाने अथवा मौलिक अधिकारों के अनुरूप व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों को उसका पालन करना होगा। इसे सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना नहीं, बल्कि संविधान के तहत न्यायिक अधिकार का प्रयोग कहा जाएगा।
 
इस मामले का एक व्यापक पक्ष यह भी है कि विरोध प्रदर्शन केवल राजनीतिक दलों की गतिविधि नहीं हैं। कर्मचारी, किसान, सामाजिक संगठन और अपनी समस्याओं से जूझ रहे आम नागरिक भी अपनी मांगें रखने के लिए इनका सहारा लेते हैं। यदि प्रदर्शन की अनुमति के लिए बनाए गए नियम अस्पष्ट हों, वैकल्पिक स्थलों की सुविधाओं का विवरण उपलब्ध न हो या अनुमति देने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी हो, तो इससे नागरिकों के लिए अनावश्यक कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। इसलिए सरकार को ऐसे स्पष्ट मानक संचालन नियम बनाने चाहिए, जिनमें स्थल चयन, अनुमति, सुरक्षा, चिकित्सा सहायता, पेयजल, शौचालय और सार्वजनिक परिवहन जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख हो। साथ ही, अचानक पैदा होने वाले जनहित के मुद्दों पर शांतिपूर्ण विरोध के लिए भी व्यावहारिक व्यवस्था होनी चाहिए।
 
अंततः जंतर-मंतर विवाद में न तो प्रशासन के अधिकारों को पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही मौलिक अधिकारों को केवल व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कमजोर किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का उद्देश्य किसी सरकार को राजनीतिक रूप से दबाव में लाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि प्रशासनिक निर्णय संविधान की सीमाओं के भीतर रहें। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सरकार व्यवस्था बनाए रखे, नागरिकों को अपनी आवाज उठाने का अवसर मिले और विवाद की स्थिति में न्यायपालिका निष्पक्ष समीक्षा करे। इसलिए इस मामले में अंतिम कसौटी यह नहीं होगी कि प्रदर्शन जंतर-मंतर पर ही हो या किसी दूसरे मैदान में, बल्कि यह होगी कि नई व्यवस्था नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को वास्तविक रूप से सुरक्षित रखती है या उसे केवल कागजों तक सीमित कर देती है।
 
कांतिलाल मांडोत

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