राजनीतिक हस्तक्षेप से परे हो - छात्रसंघ चुनाव

राज्य सरकारों के महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे और राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई

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भारत में विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों का इतिहास स्वतंत्रता पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। उस दौर में छात्र संगठनों ने न केवल विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईबल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। स्वतंत्रता के बाद देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव नियमित रूप से आयोजित होने लगे। निस्संदेहस्कूलों और कॉलेजों के छात्रसंघ चुनावों ने देश को अनेक कुशलदूरदर्शी और जनप्रिय नेता दिए हैं। ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि छात्र राजनीति से निकलकर लोकसभाराज्यसभा तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे और राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब तक विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं थातब तक छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों और छात्र हितों के प्रतीक बने रहे। उनकी सकारात्मक गूँज गाँवोंकस्बों और महानगरों तक सुनाई देती थी। किंतु समय के साथ राजनीति के बढ़ते दखलधनबल और बाहुबल के प्रभाव ने छात्रसंघ चुनावों की गरिमा को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप अनेक राज्यों में ये चुनाव हिंसकविवादास्पद और अत्यधिक खर्चीले होते चले गए। उत्तर प्रदेशमध्य प्रदेशराजस्थान सहित कई राज्यों में छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे मुख्य कारण छात्र गुटों के बीच बढ़ती हिंसाबाहरी तत्वों का हस्तक्षेपविश्वविद्यालय परिसरों में भय का वातावरणछात्रों एवं प्राध्यापकों को धमकाना तथा गंभीर आपराधिक घटनाएँ रहीं। यही कारण है कि कई राज्यों में आज भी प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लागू है।

इसके विपरीत दिल्लीकेरलहरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में राज्य सरकारों एवं विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निर्धारित कड़े नियमों के अंतर्गत आज भी प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न कराए जाते हैं। वहीं कुछ राज्यों में चुनाव केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि लगभग प्रत्येक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल में ऐसे अनेक नेता हैंजिन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की और आगे चलकर देश एवं राज्यों के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राज्यों में विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनाव स्वस्थशांतिपूर्णनिष्पक्ष और लोकतांत्रिक वातावरण में संपन्न कराए जाएँ। इसके लिए राज्य सरकारोंविश्वविद्यालय प्रशासन तथा सभी राजनीतिक दलों को दलगत हितों से ऊपर उठकर सकारात्मक पहल करनी होगी।

छात्रसंघ चुनाव राजनीतिक हस्तक्षेपधनबल और बाहुबल से मुक्त होकर केवल छात्रों के जनसमर्थन और लोकप्रियता के आधार पर संपन्न होने चाहिए। यही व्यवस्था लोकतंत्र की वास्तविक भावना को मजबूत करेगी और विद्यार्थियों में नेतृत्वउत्तरदायित्व तथा राष्ट्र निर्माण की भावना विकसित करेगी। यदि युवा पीढ़ी को छात्र जीवन से ही लोकतांत्रिक मूल्यों का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलेगातो भविष्य में देश को अधिक संवेदनशीलसक्षम और उत्तरदायी नेतृत्व प्राप्त होगा।

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अरविंद रावल

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