मैक्रों की पुकार, मोदी का संकेत: क्या बदलेगा डिजिटल भविष्य?
बचपन दांव पर है: क्या भारत निर्णायक कदम उठाएगा?, विश्व बहस के केंद्र में भारत: क्या बनेगा नया डिजिटल मानक?
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
दिल्ली के भारत मंडपम में एआई इंपैक्ट समिट का वह क्षण ऐतिहासिक बन गया। इमैनुएल मैक्रों मंच पर खड़े थे; आँखों में गहरी चिंता और स्वर में पिता-सी व्याकुलता। उन्होंने प्रधानमंत्री की ओर देख कहा— “मिस्टर प्राइम मिनिस्टर, क्या आप इस क्लब में शामिल होंगे?” यह केवल कूटनीतिक प्रश्न नहीं, एक पिता की पुकार और सभ्यता की चेतावनी थी। उन्होंने पूछा, “जो चीजें वास्तविक जीवन में अपराध हैं, वे हमारे बच्चों के सामने क्यों परोसी जा रही हैं? फ्रांस पंद्रह वर्ष से कम आयु के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध की दिशा में बढ़ रहा है। स्पेन और ग्रीस भी आगे हैं। अब भारत को ‘कोलिशन ऑफ विलिंग’ में शामिल होने का आमंत्रण है— क्योंकि यह नियमों से बढ़कर हमारी सभ्यता का प्रश्न है।” उनके शब्द सभागार में गूँजे और असंख्य माता-पिताओं के हृदय तक पहुँचे। क्या हम अब भी मौन रहेंगे?
यह विमर्श अब केवल तकनीक की प्रगति का नहीं, हमारे बच्चों के मन और मर्म की सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है। वैज्ञानिक शोध निरंतर चेतावनी दे रहे हैं कि सामाजिक माध्यम किशोरों में अवसाद, चिंता और आत्महत्या जैसे विचारों की प्रवृत्ति को बढ़ा रहे हैं। अनवरत स्क्रीन पर अंगुली चलाने की आदत ऐसी जकड़ बन चुकी है कि बच्चे नींद, अध्ययन और वास्तविक संबंधों से दूर होते जा रहे हैं। भारत में पचास करोड़ से अधिक युवा इंटरनेट से जुड़े हैं, जिनमें दस से चौदह वर्ष आयु के लाखों बच्चे इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टिकटॉक जैसे मंचों पर घंटों डूबे रहते हैं। इमैनुएल मैक्रों इसे स्पष्ट शब्दों में “डिजिटल अब्यूज” कहते हैं। प्रश्न यह है— क्या हम इसे अब भी मात्र “एक्सपोजर” का नाम देकर टालते रहेंगे, या फिर समय की पुकार सुनकर अपने बच्चों को इस विषैली स्क्रीन-जगत से बचाने का साहस करेंगे?
भारत में यह बहस पुरानी है, पर अब निर्णायक हो चली है। आर्थिक सर्वेक्षण ने सोशल मीडिया पर आयु-आधारित सीमा की अनुशंसा की है। एआई इंपैक्ट समिट में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि सरकार मंचों से डीपफेक और आयु-नियंत्रण पर चर्चा कर रही है। आंध्र प्रदेश सोलह वर्ष से कम आयु के लिए प्रतिबंध का प्रस्ताव रख चुका है। पर प्रश्न है— क्या केवल कानून पर्याप्त होगा? फेक आईडी और वीपीएन को कैसे रोका जाएगा? ऑस्ट्रेलिया ने सोलह वर्ष से कम आयु पर प्रतिबंध लगाया, फिर भी चुनौतियाँ बनी रहीं। भारत जैसे विशाल देश में यह और कठिन होगा। फिर भी इमैनुएल मैक्रों का प्रश्न स्पष्ट है— क्या बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि होगी?
विरोधी पक्ष का कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक समाधान नहीं है। बच्चे शिक्षा, संवाद और सृजन के लिए इन मंचों का उपयोग करते हैं; कठोर प्रतिबंध उन्हें छिपे और अनियंत्रित उपयोग की ओर धकेल सकता है। इसलिए सख्त अभिभावकीय निगरानी, प्रभावी आयु-सत्यापन और सुदृढ़ सामग्री छनन को अधिक संतुलित विकल्प माना जा रहा है। डिजिटल व्यक्तिगत आँकड़ा संरक्षण अधिनियम अठारह वर्ष से कम आयु के लिए अभिभावकीय सहमति अनिवार्य करता है, किंतु प्रश्न शेष है— क्या यह पर्याप्त है? इमैनुएल मैक्रों का स्पष्ट मत है— जब तक मंच स्वयं जवाबदेही नहीं स्वीकारेंगे, तब तक बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी। फ्रांस में विधेयक आगे बढ़ चुका है। अब प्रश्न भारत के सामने है— क्या वह प्रतीक्षा करेगा?
यह प्रश्न केवल बच्चों तक सीमित नहीं, पूरे समाज का है। सोशल मीडिया ने सूचना को जनसुलभ बनाया, पर साथ ही घृणा, उत्पीड़न और मिथ्या समाचार का खुला बाजार भी खड़ा कर दिया। सबसे आसान लक्ष्य हमारे बच्चे बनते हैं। एआई के दौर में डीपफेक और एआई जेनरेटेड कंटेंट ने खतरा दोगुना कर दिया है। ग्रोक चैटबॉट से हजारों बच्चों की सेक्शुअलाइज्ड इमेज बनने की घटना ने दुनिया को झकझोर दिया। इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट कहा, “एआई सबके लिए होनी चाहिए, पर बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है।” नरेंद्र मोदी ने भी उत्तर दिया कि एआई को ‘फैमिली-गाइडेड’ और ‘चाइल्ड-सेफ’ बनाना अनिवार्य है। जब दोनों नेता एक स्वर में चेतावनी दे रहे हैं, तो प्रश्न यही है— क्या यह संकल्प केवल मंचीय शब्द बनकर रह जाएगा?
अब निर्णय की घड़ी आ पहुँची है। भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र है; हमारी डेमोग्राफी हमारी ताकत है, लेकिन अगर हम बच्चों को डिजिटल जहर से नहीं बचाएंगे, तो यह ताकत कमजोर पड़ सकती है। मैक्रों का प्रस्ताव एक सीधी चुनौती है— क्या हम यूरोप के साथ संतुलित और नियंत्रित मार्ग चुनेंगे, या अमेरिकी मॉडल (फ्रीडम फर्स्ट) को अपनाएंगे? जी-7 की अध्यक्षता इस समय फ्रांस के पास है और यह विषय उनकी प्राथमिकताओं में अग्रणी है। यदि भारत इस पहल से जुड़ता है, तो वैश्विक मानक तय हो सकते हैं। निस्संदेह, क्रियान्वयन सरल नहीं होगा। प्लेटफॉर्म्स प्रतिरोध करेंगे, उपयोगकर्ता असंतोष प्रकट करेंगे। पर प्रश्न सीधा है— जब बच्चों का भविष्य दाँव पर हो, तब क्या कठिनाई निर्णय को टालने का कारण बन सकती है?
अंततः प्रश्न हम सबके लिए है— क्या हम सोशल मीडिया को अपने बच्चों का मित्र मानते हैं या अनजाने में उन्हें उनके भविष्य का शत्रु बना रहे हैं? इमैनुएल मैक्रों ने दिल्ली की धरती पर जो कहा, वह केवल फ्रांस की नीति की घोषणा नहीं थी; वह समूची मानवता के अंत:करण से उठी चेतावनी थी। अगर हम अब नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। समय आ गया है कि भारत दृढ़ और साहसी निर्णय ले। बच्चों की हँसी आभासी परदे की चमक में नहीं, वास्तविक जीवन की खुली धूप में खिलनी चाहिए। प्रश्न यही है— क्या हम इस परिवर्तन के लिए तैयार हैं? उत्तर किसी और के पास नहीं, हमारे सामूहिक संकल्प में छिपा है।

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