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राष्ट्र का सुनहरा भविष्य युवाशक्ति ,नवयुवकों का जागरण और कर्तव्यबोध
भारत सदियों से संयम, त्याग और आध्यात्मिक चेतना की भूमि रहा है। यहाँ आत्मसंयम को ही वास्तविक शक्ति माना गया है और चरित्र को ही मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति समझा गया है। यही कारण है कि इस देश ने समय-समय पर ऐसे महान आदर्श प्रस्तुत किए, जिन्होंने न केवल भारत बल्कि सम्पूर्ण विश्व को दिशा दी। भीष्म पितामह की आजीवन ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा हो, भगवान महावीर का संयम और तप का संदेश हो या स्वामी विवेकानन्द का तेजस्वी व्यक्तित्व इन सबने सिद्ध किया कि सच्ची शक्ति बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि भीतर के आत्मबल में निहित होती है। आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी इन आदर्शों को आत्मसात कर राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को समझे, क्योंकि देश की बागडोर अब युवाओं के हाथ में है।
वर्तमान समय में युवाशक्ति अनेक चुनौतियों से घिरी हुई दिखाई देती है। भोगवादी प्रवृत्तियाँ, दिखावा, कृत्रिम जीवनशैली और व्यसनों की प्रवृत्ति ने युवाओं के नैसर्गिक तेज को धूमिल कर दिया है। देर रात तक अनावश्यक मनोरंजन में डूबे रहना, असंतुलित दिनचर्या, अस्वस्थ खान-पान और फैशन की अंधी दौड़ ने उनके शरीर और मन दोनों को कमजोर किया है। जबकि एक युवा के व्यक्तित्व में ऊर्जा, उत्साह, दृढ़ निश्चय और कर्मठता का संचार होना चाहिए। राष्ट्र का भविष्य उन्हीं कंधों पर टिका होता है जिनमें सामर्थ्य, चरित्र और कर्तव्यनिष्ठा का बल हो। यदि युवा स्वयं ही शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से दुर्बल हो जाएँ, तो राष्ट्र की प्रगति कैसे संभव होगी?
कृत्रिमता के इस युग में मनुष्य बाहरी सजावट से अपनी वास्तविकता को ढकने का प्रयास करता है, परन्तु सच्चाई यह है कि कृत्रिम सौंदर्य कभी भी नैसर्गिक शक्ति और आत्मविश्वास का स्थान नहीं ले सकता। जिस प्रकार सूखी जड़ वाला वृक्ष ऊपर से हरा दिखाया जाए तो भी वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता, उसी प्रकार यदि युवा केवल बाहरी आडंबर में उलझे रहेंगे और आत्मिक विकास की ओर ध्यान नहीं देंगे, तो उनका व्यक्तित्व खोखला रह जाएगा। राष्ट्र निर्माण के लिए ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जिनकी जड़ें मजबूत हों, जिनके भीतर आत्मसंयम और आत्मविश्वास की गहरी नींव हो।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा ने सदैव संयम, तप और साधना को महत्व दिया है। यहाँ जीवन को केवल भोग का साधन नहीं, बल्कि साधना का अवसर माना गया है। स्वामी विवेकानन्द जब विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए शिकागो गए, तब भी उन्होंने अपने संस्कारों और संयम को नहीं छोड़ा। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व का रहस्य बाहरी आकर्षण नहीं, बल्कि भीतर की पवित्रता और आत्मबल था। यही आत्मबल युवाओं को अपनाना होगा। जब युवा अपने चरित्र को दृढ़ बनाते हैं, तब वे समाज में विश्वास और प्रेरणा के स्तंभ बनते हैं।
आज देश अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। विज्ञान, तकनीक, शिक्षा, उद्योग, राजनीति और सामाजिक जीवन में नई संभावनाएँ उभर रही हैं। इन संभावनाओं को साकार करने की जिम्मेदारी युवाओं पर ही है। देश की बागडोर उनके हाथ में है, इसलिए उन्हें केवल अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानना चाहिए। देश के प्रति समर्पण केवल नारों से सिद्ध नहीं होता, बल्कि अनुशासन, ईमानदारी और परिश्रम से प्रकट होता है। जब युवा अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा से करते हैं, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।
युवाओं का प्रथम कर्तव्य है कि वे स्वयं को शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ बनाएं। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। नियमित दिनचर्या, संतुलित आहार, व्यायाम और योग से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है। साथ ही अध्ययन, चिंतन और सत्साहित्य के माध्यम से बुद्धि का विकास होता है। ज्ञान से ही विवेक उत्पन्न होता है और विवेक से ही सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित होती है। जब युवा विवेकशील बनेंगे, तब वे समाज को सही दिशा दे सकेंगे।
दूसरा महत्वपूर्ण कर्तव्य है नैतिक मूल्यों का पालन। ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, करुणा और सहयोग की भावना ही समाज को जोड़ती है। यदि युवा भ्रष्टाचार, छल और स्वार्थ से दूर रहकर आदर्श जीवन जिएँगे, तो समाज में विश्वास की नींव मजबूत होगी। राष्ट्र का निर्माण केवल सड़कों और भवनों से नहीं, बल्कि सुदृढ़ चरित्र वाले नागरिकों से होता है। युवाओं को यह समझना होगा कि उनका प्रत्येक कार्य देश के भविष्य को प्रभावित करता है।
तीसरा कर्तव्य है सामाजिक जागरूकता और सक्रिय भागीदारी। युवाओं को पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा प्रसार, स्वच्छता अभियान, डिजिटल साक्षरता और सामाजिक समरसता जैसे कार्यों में आगे आना चाहिए। वे नई सोच और नवाचार के माध्यम से देश को आत्मनिर्भर बना सकते हैं। तकनीकी दक्षता और रचनात्मकता के बल पर वे विश्व पटल पर भारत की प्रतिष्ठा को ऊँचा उठा सकते हैं। जब युवा अपने कौशल और प्रतिभा को राष्ट्रहित में समर्पित करते हैं, तब देश प्रगति की नई ऊँचाइयों को छूता है।
आज आवश्यकता है कि युवा कृत्रिम आकर्षणों से ऊपर उठकर वास्तविक जीवन मूल्यों को अपनाएँ। संयम का अर्थ केवल त्याग नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा का सही दिशा में उपयोग करना है। जब इन्द्रियाँ भोग से हटकर योग की ओर उन्मुख होती हैं, तब व्यक्ति में अद्भुत शक्ति का संचार होता है। यही शक्ति राष्ट्र निर्माण का आधार बनती है। युवाओं को चाहिए कि वे अपने भीतर आत्मगौरव और राष्ट्रगौरव की भावना को जागृत करें।
भारत का भविष्य उज्ज्वल तभी होगा जब उसकी युवा पीढ़ी जागरूक, अनुशासित और समर्पित होगी। आज का युवा यदि अपने वर्तमान को संवार ले, तो उसका कल स्वयं ही स्वर्णिम हो जाएगा। देश की प्रगति किसी एक नेता या संस्था पर निर्भर नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सामूहिक प्रयास पर आधारित है। जब प्रत्येक युवा यह संकल्प लेगा कि वह अपने जीवन को राष्ट्र के हित में उपयोग करेगा, तब भारत पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर होगा।
अंततः यही कहा जा सकता है कि राष्ट्र का सुनहरा भविष्य युवाशक्ति के जागरण में निहित है। युवाओं को अपने कर्तव्यों का बोध होना चाहिए और उन्हें पूरे समर्पण के साथ निभाना चाहिए। संयम, परिश्रम, नैतिकता और देशभक्ति के आधार पर ही एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। आज समय की पुकार है कि युवा स्वयं को बदलें, समाज को बदलें और राष्ट्र को नई ऊँचाइयों तक ले जाएँ। जब युवाशक्ति जागृत होगी, तब भारत का भविष्य सचमुच स्वर्णिम बनेगा।
कांतिलाल मांडोत

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