बेटी की फीस के लिए...!

अजय यादव Picture
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यूं नंगे पाँव दौड़ी माँ, साड़ी में लिपटी थी ममता,
आँखों में एक सपना "बेटी" की पढ़ाई व क्षमता।
रास्ते में पत्थर-दग्गड हैं आए, पाँवों में चुभते रहे,
लोग तमाशा देखते रहे, "माँ" कदम बढ़ाती रही।
 
न जूते की चाह रही, न जीत का कोई अभिमान,
माँ के लिए तो बेटी ही दुनिया में उसका सम्मान।
3 हज़ार की जीत नहीं, ये हौसले की कहानी थी,
इनाम की हर पाई में बेटी को पढ़ाएँ निशानी थी।
 
जिस उम्र में आराम चाहिए, उसमें दौड़ लगा दी,
माँ ने अपनी जीत बेटी के "भविष्य" पर लुटा दी।
ये कौन कहता है सपनों की कीमत बड़ी होती है?
माँ की मेहनत साथ है मुश्किल भी छोटी होती है।
 
नमन उस माँ को जिसने दुनिया को ये समझाया,
बेटी की फीस के आगे माँ ने अपना दर्द भुलाया।
उसके नंगे पाँवों ने शायद ये नया इतिहास लिखा,
माँ ने दौड़ जीती, जीत में बेटी का भविष्य दिखा।
(संदर्भ -47 की रमाबाई फीस के लिए नंगे पैर मैराथन दौड़ीं)
 
संजय एम तराणेकर

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