भुखमरी के खिलाफ आखिर कब जंग जीतेगी दुनिया?

केंद्र और राज्य सरकारें गरीब एवं वंचित वर्गों के लिए अनेक खाद्यान्न योजनाएं संचालित कर रही हैं।

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

आधुनिक विज्ञान के इस युग में मानव ने अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए विलासिता की हर छोटी-बड़ी वस्तु का आविष्कार कर लिया है और जीवन को लगातार अधिक सुविधाजनक बनाता जा रहा है। लेकिन शरीर को तंदुरुस्त रखने के लिए पेट की भूख मिटाने वाली कोई चमत्कारी गोली आज तक नहीं खोजी जा सकी है। यही कारण है कि भोजन की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मनुष्य को निरंतर कर्म करना पड़ता है।

 आधुनिक विज्ञान के इस युग में जब हर क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई हैतब कृषि क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा। वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने से दुनिया के अनेक देशों में फसलों की बंपर पैदावार हो रही है। इससे न केवल किसान समृद्ध हो रहे हैंबल्कि देश भी आर्थिक रूप से मजबूत बन रहे हैं। किंतु यह विडंबना ही है कि खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद आज भी दुनिया के कई देशों में लोग भयावह भुखमरी के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक व्यथित कर देती है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार आधा दर्जन देशों में भुखमरी की स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि लोगों को एक समय का शुद्ध और पौष्टिक भोजन भी नसीब नहीं हो पा रहा है। विश्व के लगभग 50 देशों में करीब 30 करोड़ लोगों को एक वक्त का भोजन भी बड़ी मुश्किल से उपलब्ध हो पाता है और वे अक्सर खाली पेट रात गुजारने को विवश रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार दुनिया की लगभग 8.5 प्रतिशत आबादीअर्थात करीब 70 करोड़ लोगों को भरपेट और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पाताजिसके कारण कुपोषण की समस्या लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही है। दुनिया के अधिकांश देश विकसितविकासशील और प्रगतिशील राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल होने की होड़ में लगे हुए हैंलेकिन उनके भीतर युद्धअकालसूखाअतिवृष्टिबढ़ती महंगाईबेरोजगारीआर्थिक असमानता और कमजोर खाद्य वितरण प्रणाली जैसी समस्याओं के कारण गरीबीभुखमरी और कुपोषण लगातार बढ़ रहे हैं।

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले भारत की स्थिति का आकलन भी वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2025 की रिपोर्ट से किया जा सकता हैजिसमें 123 देशों में भारत का स्थान 102वां बताया गया है। यह स्थिति दर्शाती है कि देश में आज भी करोड़ों लोगों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। भारत कृषि प्रधान देश है और कृषि को उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों का भोजन से वंचित रहना चिंता और आत्ममंथन का विषय है। केंद्र और राज्य सरकारें गरीब एवं वंचित वर्गों के लिए अनेक खाद्यान्न योजनाएं संचालित कर रही हैं।

हरित पुनरुद्धार की ओर बढ़ते भारत के कदम Read More हरित पुनरुद्धार की ओर बढ़ते भारत के कदम

इन योजनाओं का लाभ लाखों-करोड़ों जरूरतमंदों तक पहुंच रहा हैफिर भी यदि भुखमरी और कुपोषण की समस्या बनी हुई है तो कहीं न कहीं खाद्यान्न वितरण प्रणाली में मौजूद कमियों को दूर करने की आवश्यकता है। साथ ही समाज और नागरिकों को भी भोजन तथा अन्न की बर्बादी रोकने के लिए गंभीरता से विचार करना होगा। भोजन की बर्बादी के मामले में भारत विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में हर वर्ष करोड़ टन से अधिक भोजन बर्बाद हो जाता है। यदि दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रभावी प्रबंधन के साथ इस बर्बादी को रोका जाए तो देश में कुपोषण और भुखमरी की स्थिति में काफी हद तक सुधार संभव है।

संपादकीय पेज के लिए समसामयिक आलेख  Read More संपादकीय पेज के लिए समसामयिक आलेख 

विश्व से भुखमरी समाप्त करने के लिए वैश्विक महाशक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी अपने आर्थिक और सामरिक हितों से ऊपर उठकर सोचना होगा। हथियारों के सौदों पर अरबों-खरबों डॉलर खर्च करने के बजाय विश्व शांति और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जिन देशों में भुखमरी के हालात गंभीर हैंवहां मानवीय आधार पर खाद्यान्न और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराकर उन्हें बदहाली से उबारने का प्रयास किया जाना चाहिए। मानव जाति का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि एक ओर दुनियाभर की सरकारें सुरक्षा और शांति के नाम पर हथियारों के विशाल भंडार तैयार कर रही हैंवहीं दूसरी ओर युद्ध और संघर्षों के कारण पर्यावरणजलवायु और प्राकृतिक संसाधनों को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

जंगलराज से विकासराज तक : उत्तर प्रदेश की बदलती तस्वीर और नई आर्थिक शक्ति बनने का सफर Read More जंगलराज से विकासराज तक : उत्तर प्रदेश की बदलती तस्वीर और नई आर्थिक शक्ति बनने का सफर

परिणामस्वरूप कहीं अकालकहीं सूखाकहीं बाढ़ और कहीं अन्य प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैंजो अंततः भुखमरी की समस्या को और अधिक गंभीर बना रही हैं। दुनिया के देश हथियारों के बल पर सीमाओं की जंग तो जीत सकते हैंलेकिन अपने ही नागरिकों के पेट की भूख के खिलाफ लड़ाई आखिर कब जीतेंगेयह प्रश्न आज समूचे विश्व के सामने एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है। जब तक दुनिया की प्राथमिकताओं में मानव जीवनखाद्य सुरक्षा और मानवीय संवेदनाएं सर्वोच्च स्थान प्राप्त नहीं करेंगीतब तक भुखमरी के खिलाफ यह जंग अधूरी ही रहेगी।

अरविंद रावल

About The Author

Post Comments

Comments