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हरित पुनरुद्धार की ओर बढ़ते भारत के कदम
समृद्ध भविष्य की नींव रखने जैसा है जो सतत विकास के वैश्विक लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक सिद्ध होगा
महेन्द्र तिवारी
पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत ने भूमि बहाली के क्षेत्र में एक ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धि हासिल की है जिसने पूरी दुनिया के सामने सफलता का एक नया मार्ग प्रशस्त किया है। भारत ने अपने निरंतर और सुनियोजित प्रयासों से 21.76 मिलियन हेक्टेयर बंजर और खराब हो चुकी भूमि को फिर से हरा-भरा और उपजाऊ बनाने में सफलता प्राप्त की है। इस विशाल आंकड़े की गंभीरता और इसके भौगोलिक विस्तार को इस तरह समझा जा सकता है कि यह क्षेत्रफल लगभग पूरे यूनाइटेड किंगडम अर्थात ब्रिटेन के कुल भौगोलिक आकार के बराबर है। इतने बड़े पैमाने पर सूखी, ऊसर और जीवनहीन हो चुकी ज़मीन को पुनर्जीवित करना केवल एक प्रशासनिक सफलता नहीं है बल्कि यह प्रकृति के प्रति देश की गहरी प्रतिबद्धता और दूरगामी नीतियों का जीवंत परिणाम है। इस ऐतिहासिक कदम ने न केवल भारत की पारिस्थितिक सुरक्षा को मजबूत किया है बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति देश की साख को बहुत ऊंचा किया है। भूमि का इस तरह से पुनरुद्धार करना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की नींव रखने जैसा है जो सतत विकास के वैश्विक लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक सिद्ध होगा।
इस पूरी मुहिम की वैश्विक कड़ियों को जोड़कर देखना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि भारत के ये प्रयास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे बड़े अभियानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। इसी संदर्भ में बॉन चुनौती का नाम प्रमुखता से उभर कर सामने आता है। बॉन चुनौती वास्तव में वनों की कटाई को रोकने और मरुस्थलीकरण के कारण बंजर हो चुकी भूमि को फिर से उपजाऊ और हरा-भरा बनाने का एक बहुत बड़ा वैश्विक संकल्प है। इस महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत वर्ष 2011 में जर्मनी की सरकार और इंटरनेशनल यूनियन फॉर Conservation ऑफ नेचर द्वारा संयुक्त रूप से की गई थी। जब इसे वैश्विक स्तर पर शुरू किया गया था तब इसका प्राथमिक लक्ष्य रखा गया था कि वर्ष 2020 तक पूरी दुनिया में 150 मिलियन हेक्टेयर खराब हो चुकी भूमि को बहाल किया जाएगा। इसके बाद इस लक्ष्य को और अधिक विस्तारित करते हुए वर्ष 2030 तक 350 मिलियन हेक्टेयर भूमि को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया गया। भारत ने इस वैश्विक चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया और अपनी घरेलू प्राथमिकताओं को इसके साथ इस तरह जोड़ा कि आज देश इस दिशा में मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहा है।
भारत की इस पर्यावरणीय यात्रा में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब देश ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी जिम्मेदारियों को और अधिक विस्तार देने का निर्णय लिया। वर्ष 2019 में भारत की राजधानी नई दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय के चौदहवें सत्र का आयोजन किया गया था जिसे कॉप 14 के नाम से भी जाना जाता है। इस वैश्विक सम्मेलन में दुनिया भर के पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं की उपस्थिति में भारत ने अपने पुराने लक्ष्यों में बड़ा संशोधन किया। भारत ने वैश्विक मंच पर यह संकल्प लिया कि वह वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर और निम्नीकृत भूमि को पूरी तरह से बहाल करेगा। वर्तमान समय में हासिल किया गया 21.76 मिलियन हेक्टेयर का यह आंकड़ा इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से आगे बढ़ रहा है और वह इस अत्यंत महत्वाकांक्षी लक्ष्य को निर्धारित समय सीमा से बहुत पहले ही प्राप्त करने की मजबूत स्थिति में पहुंच चुका है।
इस विशाल भूभाग को दोबारा जीवन देने और उसे हरा-भरा बनाने के लिए देश में बहुआयामी रणनीतियों को अपनाया गया जिसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका वनरोपण की रही है। देश के विभिन्न राज्यों में जो जमीनें पूरी तरह से खाली थीं या जहां औद्योगिक गतिविधियों और खनन कार्यों के बाद खदानों को बंजर छोड़ दिया गया था वहां बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाए गए। इस प्रक्रिया में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि केवल पेड़ न लगाए जाएं बल्कि उन स्थानीय प्रजातियों के पौधों को चुना जाए जो वहां की मिट्टी और जलवायु के अनुकूल हों। इससे बंजर पहाड़ियों और मैदानी इलाकों में एक बार फिर से सघन हरित आवरण लौटने लगा जिसने भूमि के क्षरण को रोक दिया और मिट्टी की खोई हुई पोषक क्षमता को वापस लाने में मदद की।
वनरोपण के साथ-साथ जल और मिट्टी के संरक्षण के लिए जलागम प्रबंधन तकनीक का व्यापक स्तर पर उपयोग किया गया जो इस सफलता की रीढ़ साबित हुई। इसके अंतर्गत पहाड़ी और ढलान वाले क्षेत्रों में वैज्ञानिक पद्धतियों से छोटे-छोटे बांधों का निर्माण किया गया जिन्हें चेक डैम कहा जाता है। इन संरचनाओं के माध्यम से वर्षा के तेजी से बहते हुए पानी को रोका गया जिससे न केवल उपजाऊ मिट्टी का बहाव थमा बल्कि ज़मीन के भीतर पानी का स्तर भी तेजी से ऊपर उठा। भूजल स्तर में सुधार होने के कारण आसपास की सूखी और प्यासी ज़मीन को पर्याप्त नमी मिली जिससे वहां प्राकृतिक रूप से वनस्पतियों का उगना दोबारा शुरू हो गया और कई सूखी नदियां तथा जलस्रोत पुनर्जीवित हो उठे।
इस अभियान की एक और बड़ी विशेषता कृषि वानिकी को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना रही है जिसने पारंपरिक खेती के तौर-तरीकों को सकारात्मक रूप से बदल दिया। परंपरागत रूप से किसान केवल अपनी फसलों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करते थे लेकिन नई नीतियों के तहत उन्हें खेतों की मेड़ों पर और फसलों के बीच के खाली स्थानों में आर्थिक रूप से उपयोगी पेड़ लगाने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया गया। इससे किसानों को न केवल ईंधन और चारे के रूप में अतिरिक्त संसाधन मिले बल्कि खेतों की मिट्टी की नाइट्रोजन स्थिरीकरण क्षमता और सामान्य उर्वरता में भी भारी सुधार हुआ। कृषि वानिकी ने देश के ग्रामीण अंचलों में एक नए प्रकार के लाभदायक और टिकाऊ हरित तंत्र को जन्म दिया जिसने पर्यावरण के साथ-साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को भी संबल प्रदान किया।
इन सभी सरकारी और तकनीकी प्रयासों को वास्तविक शक्ति और गति तब मिली जब इसमें आम जनता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को अनिवार्य बनाया गया। संयुक्त वन प्रबंधन प्रणाली के अंतर्गत वनों के आसपास रहने वाले स्थानीय ग्रामीण निवासियों और विशेषकर आदिवासी समुदायों को जंगलों की रक्षा करने और नए पौधे लगाने की सीधी जिम्मेदारी सौंपी गई। जब इन समुदायों को यह अहसास हुआ कि जंगलों का विकास सीधे तौर पर उनके अपने जीवन, संस्कृति और आजीविका से जुड़ा हुआ है तो उन्होंने इस अभियान को एक जन आंदोलन का रूप दे दिया। लोगों के इस सामूहिक जुड़ाव के कारण ही नए लगाए गए पौधों की जीवित रहने की दर में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई और सामुदायिक वनों का दायरा तेजी से बढ़ने लगा।
इस ऐतिहासिक भूमि बहाली अभियान के दूरगामी और बहुआयामी लाभ अब प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने लगे हैं जिनमें सबसे बड़ा लाभ एक विशाल कार्बन अवशोषक क्षेत्र का निर्माण होना है। जब 21.76 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर नए पेड़-पौधे और घनी वनस्पतियां विकसित होती हैं तो वे वायुमंडल से हर साल लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों को सोख लेती हैं। यह प्रक्रिया वैश्विक तापन के खतरों को कम करने में भारत की ओर से विश्व को दिया गया एक अमूल्य योगदान है। यह हरित क्षेत्र देश के कार्बन उत्सर्जन को संतुलित करने में एक मजबूत ढाल की तरह काम कर रहा है और वैश्विक जलवायु सुधार में अपनी महती भूमिका निभा रहा है।
इसके साथ ही जैव विविधता की बहाली इस अभियान का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण परिणाम है क्योंकि जो क्षेत्र कभी पूरी तरह से उजाड़ और बेजान हो चुके थे वहां अब एक बार फिर से विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों को अपना खोया हुआ प्राकृतिक आवास मिल रहा है। पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों और मिट्टी के भीतर रहने वाले सूक्ष्मजीवों की संख्या में वृद्धि होने से संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र दोबारा सक्रिय हो रहा है जो प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। अंततः इस पूरी प्रक्रिया ने देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई और अभूतपूर्व मजबूती प्रदान की है जो सतत विकास का सबसे बड़ा उदाहरण है। भूमि के उपजाऊ होने से जहां एक ओर कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ है वहीं दूसरी ओर जंगलों से मिलने वाले विभिन्न उत्पादों जैसे फल, शहद, गोंद और अनेक प्रकार की दुर्लभ जड़ी-बूटियों ने स्थानीय लोगों की दैनिक आय को बढ़ाने में मदद की है। रोजगार के नए अवसर पैदा होने से ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि आई है जो यह सिद्ध करती है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों को एक साथ प्राप्त किया जा सकता है।


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