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बालिका सशक्तिकरण की बात, लेकिन विस्थापित आज भी बदहाल, एनटीपीसी पर उठे सवाल
CSR कार्यक्रमों से नहीं बल्कि स्थायी विकास से होगा सशक्तिकरण, NTPC रिहंद पर स्थानीय लोगों का हमला
संतोष कुमार गुप्ता (संवाददाता)
बीजपुर/ सोनभद्र -
एनटीपीसी रिहंद सीएसआर विभाग द्वारा विगत वर्ष की भांति इस वर्ष भी एक माह के लिए बालिका सशक्तिकरण अभियान का आयोजन किया जा रहा है। बालिका सशक्तिकरण अभियान कार्यशाला का भव्य उद्घाटन दिनांक 21 मई को तरंग प्रेक्षागृह में मुख्य अतिथि संजय असाटी परियोजना प्रमुख (रिहंद) विशेष अतिथि संदीप नायक, परियोजना प्रमुख (सिंगरौली), प्रज्ञा नायक, अध्यक्ष, वनिता समाज, नीलू असाटी, अध्यक्ष, वर्तिका महिला मंडल समिति, प्रणय कुमार नायक, महाप्रबंधक (प्रचालन एवं अनुरक्षण) सतेंद्र कुमार सिन्हा, महाप्रबंधक (प्रचालन, एनटीपीसी विंध्याचल), माणिक्यन सुरेश, महाप्रबंधक (अनुरक्षण एवं एडीएम, एनटीपीसी विंध्याचल), उप समादेष्टा सीआईएसएफ प्रकाश, विभागाध्यक्षगण, वर्तिका महिला मंडल समिति की वरिष्ठ सदस्यों, यूनियन एवं एसोसिएशन के प्रतिनिधिगण एवं अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा एनटीपीसी गीत एवं दीप प्रज्वलन के साथ किया गया।

मुख्य अतिथि परियोजना प्रमुख असाटी ने बालिका सशक्तिकरण के महत्व पर जोर देते हुए बालिकाओं के सर्वांगीण विकास हेतु सीएसआर द्वारा आयोजित इस अभियान की सराहना की। उन्होंने कहा कि सशक्तिकरण का अर्थ है किसी को शक्ति देना या किसी को मजबूत और आत्मविश्वासी बनाना। उन्होंने यह भी कहा कि यह अभियान केवल शिक्षा तक ही सीमित नहीं है अपितु यह एक समग्र विकास पहल है जो शैक्षिक सहायता, कौशल निर्माण, व्यक्तित्व विकास और जीवन कौशल प्रशिक्षण प्रदान करता है। कार्यशाला में भाग ले रही बालिकाओं को संबोधित करते हुए श्री असाटी ने कहा कि आप सभी ताकत, लचीलेपन और आशा की प्रतिमूर्ति हो। आपको यहां से जो सीख मिले उसे अपने आस-पास में भी बांटना है। इसके पूर्व मुख्य अतिथि सहित अन्य आमंत्रित गणमान्य अतिथियों का पुष्प गुच्छ देकर स्वागत किया गया।
मानव संसाधन विभागाध्यक्ष राजेश बोचापाई ने सभी गणमान्य अतिथियों का हार्दिक स्वागत करते हुए उनकी उपस्थिति के प्रति आभार व्यक्त किया ।कार्यशाला के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि इस वर्ष सात विद्यालयों से कुल 140 बालिकाएं प्रशिक्षण में शामिल हुई हैं। इस अवसर पर बालिका सशक्तिकरण अभियान के पूर्व प्रतिभागियों तथा डीएवी स्कूल में अध्ययनरत बालिकाओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए सभी का मन मोह लिया तथा पूर्व के वर्षों में आयोजित कार्यशाला के अनुभवों को साझा करते हुए एनटीपीसी रिहंद के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के दौरान डीएवी में अध्ययनरत उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली पिछले कार्यशाला की जेम बालिकाओं को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि जहां एक ओर एनटीपीसी द्वारा महिला एवं बालिका सशक्तिकरण की बातें की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर परियोजना से विस्थापित किए गए परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं, रोजगार और समुचित पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लोगों ने सवाल उठाया कि जब सशक्तिकरण और समृद्धि की बात की जाती है तो विस्थापित परिवारों को आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने की दिशा में ठोस प्रयास क्यों नहीं किए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि एनटीपीसी को केवल छोटे-छोटे कार्यक्रम कर दिखावा बंद करना चाहिए। यदि वास्तव में विकास और सशक्तिकरण की बात की जा रही है तो सबसे पहले यहां के विस्थापित और स्थानीय लोगों के स्थायी रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और मूलभूत सुविधाओं पर गंभीरता से काम करना चाहिए। लोगों का कहना है कि क्षेत्र के वास्तविक विकास की ठोस नीति अपनाकर ही एनटीपीसी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभा सकती है।
स्थानीय लोगों ने पुनर्वास व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह कैसा पुनर्वास है जहां आज भी लोगों को टैंकर से पानी की आपूर्ति की जा रही है। लोगों का कहना है कि कभी सुप्रीम कोर्ट के दस्तावेजों और शर्तों में विस्थापितों को पोर्टेबल वाटर” यानी शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की बात कही गई थी, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी अधूरी दिखाई देती है। ग्रामीणों का आरोप है कि स्थायी जल व्यवस्था, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं के बिना पुनर्वास केवल कागजों तक सीमित होकर रह गया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि एक तरफ एनटीपीसी महिला सशक्तिकरण अभियान चला रही है, वहीं दूसरी तरफ विस्थापित और आसपास के गांवों के लोग आज भी पानी, रोजगार और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। लोगों का आरोप है कि इससे यह जाहिर होता है कि एनटीपीसी केवल कागजी कोरम पूरा कर रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि वास्तव में सामाजिक जिम्मेदारी निभानी है तो दिखावटी कार्यक्रमों के बजाय क्षेत्र के लोगों को स्थायी सुविधाएं और विकास देना चाहिए, अन्यथा ऐसे अभियानों का कोई वास्तविक मतलब नहीं रह जाता।


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