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संवेदनशील प्रशासन और संयमित छात्र: संतुलन ही समाधान
दूसरी पालियों में समाधान, पहली में जीवन की हार, परीक्षा से बड़ी है जिंदगी, अंक केवल संकेत हैं, मूल्य नहीं
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
कभी-कभी बस एक छोटा-सा क्षण पूरी व्यवस्था की आत्मा को बेनकाब कर देता है। घड़ी ने दस मिनट का फासला तय किया—और एक बच्ची परीक्षा कक्ष के बाहर रह गई। वही दस मिनट उसके जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी बन गए। नियम अपनी जगह अडिग खड़े रहे, पर जीवन चुपचाप फिसल गया। दूसरी ओर, एक परीक्षा केंद्र पर प्रश्नपत्र कम पड़े तो उसी तंत्र ने नियमों को मोड़कर दो पालियों में परीक्षा करा दी। यही विरोधाभास हमारे समय की नंगी सच्चाई है—जहाँ सुविधा हो वहाँ नियम लचीले, और जहाँ करुणा चाहिए वहाँ वे पत्थर बनकर गिरते हैं।
दस मिनट की देरी पर दरवाज़ा बंद कर देना नियम की कठोरता नहीं, संवेदना की विफलता है। परीक्षा का उद्देश्य प्रतिभा की जाँच है, न कि घड़ी की सुइयों की पूजा। यदि चाहा जाता तो कोई व्यावहारिक रास्ता निकाला जा सकता था—जैसा अन्य परिस्थितियों में निकाला भी गया। पर यहाँ नियमों की दीवार ऊँची कर दी गई और मानवीय विवेक को बाहर छोड़ दिया गया। परिणाम केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रहा, वह एक असहनीय त्रासदी में बदल गया। प्रश्न नियमों के अस्तित्व का नहीं, उनमें जीवित मनुष्यता की उपस्थिति का है। क्या व्यवस्था इतनी यांत्रिक हो चुकी है कि उसे परिस्थितियों की धड़कन सुनाई ही नहीं देती?
इसी क्रम में दूसरी घटना ने तंत्र का दूसरा चेहरा भी दिखाया। जब प्रश्नपत्र कम पड़ गए और व्यवस्था की अपनी भूल उजागर हुई, तो तुरंत समाधान तलाश लिया गया। दो पालियाँ बनीं, प्रतियाँ तैयार हुईं, समय-सारिणी बदली—और परीक्षा पूरी करा दी गई। यहाँ नियमों को मोड़ना संभव था, क्योंकि आवश्यकता थी। यही विरोधाभास सबसे चुभता है—जहाँ सिस्टम की असुविधा हो, वहाँ लचीलापन; जहाँ छात्र की मजबूरी हो, वहाँ कठोरता क्यों? क्या नियम केवल नीचे की ओर सख्त और ऊपर की ओर नरम होते हैं? क्या करुणा का पैमाना भी पद और अधिकार देखकर बदल जाता है?
पर इस पूरी पीड़ा का एक और पक्ष भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। कोई भी परीक्षा जीवन से बड़ी नहीं होती। अंक केवल भविष्य की दिशा तय करते हैं, अस्तित्व की कीमत नहीं। देर हो जाए तो अगला अवसर मिलता है, अगला प्रयास संभव है, अगला वर्ष भी आता है। पर यदि जीवन का पन्ना ही फाड़ दिया जाए, तो उसे कोई परिणाम फिर नहीं जोड़ सकता। क्षणिक आवेग में उठाया गया चरम कदम समस्या का समाधान नहीं, परिवार के लिए आजीवन घाव बन जाता है। हमें यह समझना और समझाना होगा कि असफलता अंत नहीं, अनुभव है; ठोकर हार नहीं, आगे बढ़ने की तैयारी है।
हमारे समाज ने परीक्षा को उपलब्धि से आगे बढ़ाकर प्रतिष्ठा और पहचान का पैमाना बना दिया है। अंक अब केवल परिणाम नहीं रहे, वे मानो सम्मान का प्रमाणपत्र बन गए हैं। माता-पिता की आकांक्षाएँ, रिश्तेदारों की तुलना और सोशल मीडिया की चकाचौंध—ये सब मिलकर एक कोमल मन पर ऐसा दबाव रचते हैं, जो दिखाई नहीं देता पर भीतर गहराई तक चुभता है। ऐसे माहौल में दस मिनट की देरी महज़ समय का अंतर नहीं रह जाती; वह मानो सपनों के ढह जाने का प्रतीक बन जाती है। यहीं परिवार और विद्यालय की असली भूमिका शुरू होती है। बच्चों को सिखाना होगा कि जीवन की कीमत किसी परिणाम से कहीं अधिक है। परीक्षा एक अवसर है, अस्तित्व का अंतिम सत्य नहीं।
प्रशासन की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। नियम अनुशासन बनाए रखने के लिए होते हैं, पर उनका उद्देश्य मनुष्यों की रक्षा करना है, उन्हें तोड़ना नहीं। यदि कोई नियम ऐसी स्थिति पैदा करे जहाँ जीवन ही संकट में पड़ जाए, तो उसके स्वरूप पर पुनर्विचार अनिवार्य हो जाता है। हर परीक्षा केंद्र पर मानवीय विवेक की एक खिड़की खुली रहनी चाहिए—ऐसी व्यवस्था, जहाँ आपात स्थिति में समाधान खोजा जा सके। जब तकनीकी त्रुटियों पर तत्काल विकल्प संभव हैं, तो कुछ मिनट की देरी पर संवेदना असंभव क्यों प्रतीत होती है? प्रशासनिक दक्षता के साथ संवेदनशीलता भी अनिवार्य प्रशिक्षण का हिस्सा बननी चाहिए।
छात्रों के लिए यह घटना एक चेतावनी भी है और एक सीख भी। समयपालन कोई औपचारिक नियम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व की रीढ़ है; अनुशासन ही वह आधार है जिस पर सफलता की इमारत खड़ी होती है। परीक्षा के दिन तैयारी केवल पाठ्यक्रम की नहीं, परिस्थिति की भी होनी चाहिए—समय से पहुँचना, विकल्प सोचकर चलना, जोखिम से बचना। किंतु यदि कभी चूक हो जाए, तो उसे जीवन की हार का नाम न दें। सच्चा साहस गिरकर फिर खड़े होने में है, न कि एक ठोकर को अंतिम सत्य मान लेने में। असफलता से जूझना परिपक्वता है; क्षणिक आवेग में स्वयं को ही दंडित कर देना नहीं। जीवन एक लंबी दौड़ है—एक मोड़ फिसलन भरा हो सकता है, पर वह पूरी मंज़िल को निगल नहीं सकता।
यह घटना हमें एक कठोर सत्य से रूबरू कराती है—संतुलन ही व्यवस्था और जीवन, दोनों की सबसे बड़ी आवश्यकता है। नियम हों, पर उनमें मानवता की धड़कन भी हो; अनुशासन हो, पर उसके साथ समझ और संवेदना भी। उतना ही जरूरी है कि विद्यार्थी भी क्षणिक आघात को अंतिम फैसला न बनने दें। समाधान किसी एक पक्ष की कठोरता में नहीं, दोनों के सामंजस्य में छिपा है। जब प्रशासन विवेकशील हो और युवा संयमित, तभी त्रासदियों के रास्ते बंद होते हैं। यदि व्यवस्था पत्थर न बने और छात्र आवेग के बजाय साहस चुनें, तो अनेक घरों की रोशनी बच सकती है। परीक्षा कक्ष का दरवाज़ा समय पर बंद हो सकता है, पर जीवन का द्वार कभी बंद नहीं होना चाहिए—और उसे खुला रखना ही समाज, सिस्टम और छात्र, हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।

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