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सत्ता से सेवा तक का परिवर्तन नए भारत की कार्यसंस्कृति का पवित्र प्रस्थान
नई दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय का साउथ ब्लॉक से निकलकर ‘सेवा तीर्थ’ में स्थापित होना केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि शासन की सोच और दिशा में ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है। यह परिवर्तन उस मानसिकता से मुक्ति का संकेत है, जो कभी औपनिवेशिक शासन की संरचनाओं और प्रतीकों से जुड़ी थी। अब देश का शासन उस परिसर से संचालित होगा, जिसे सेवा की भावना के साथ राष्ट्र को समर्पित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सेवा तीर्थ केवल एक नाम नहीं, बल्कि यह संकल्प है। यह संकल्प है नागरिकों की अपेक्षाओं को सर्वोपरि मानकर शासन चलाने का, यह संकल्प है प्रशासन को जनसेवा का माध्यम बनाने का।
साउथ ब्लॉक, जो कभी ब्रिटिश हुकूमत के प्रशासनिक ढांचे का प्रतीक था, स्वतंत्र भारत में भी लंबे समय तक सत्ता का केंद्र बना रहा। किंतु बदलते समय के साथ यह आवश्यक हो गया कि शासन का ढांचा भी स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र पहचान को प्रतिबिंबित करे। सेवा तीर्थ इसी विचार का परिणाम है। यह नाम अपने आप में पवित्रता, समर्पण और उत्तरदायित्व का बोध कराता है। ‘नागरिक देवो भव’ का संदेश इसकी दीवारों पर अंकित है, जो इस बात को रेखांकित करता है कि अब शासन का केंद्र बिंदु जनता है, न कि सत्ता का अहंकार।
सेवा तीर्थ का उद्घाटन ऐसे समय में हुआ जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तीव्र गति से अग्रसर है। नए परिसर में पहले ही दिन जिन निर्णयों पर हस्ताक्षर हुए, वे इस बात के प्रमाण हैं कि यह भवन केवल प्रशासनिक औपचारिकताओं का स्थान नहीं, बल्कि संवेदनशील और त्वरित निर्णयों का केंद्र होगा। सड़क दुर्घटना पीड़ितों को डेढ़ लाख रुपये तक कैशलेस उपचार की सुविधा देना इस सोच का उदाहरण है कि किसी नागरिक की जान इलाज के अभाव में न जाए। अस्पताल तक पहुंचाने वाले को प्रोत्साहन देना सामाजिक उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने का प्रयास है।
महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ‘लखपति दीदी’ लक्ष्य को आगे बढ़ाना भी इसी सेवा दृष्टि का हिस्सा है। लाखों महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प सेवा तीर्थ से और सशक्त रूप में आगे बढ़ेगा। यह केवल आंकड़ों का लक्ष्य नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की सामाजिक संरचना को मजबूत करने का प्रयास है। जब महिलाएं सशक्त होती हैं तो परिवार, समाज और अंततः राष्ट्र सशक्त होता है।
किसानों के लिए कृषि अवसंरचना को मजबूत करने हेतु ऋण लक्ष्य को दोगुना कर दो लाख करोड़ रुपये करना भी इस नई कार्यसंस्कृति का संकेत है। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। सेवा तीर्थ से लिए गए ऐसे निर्णय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देंगे। संपूर्ण एग्रीकल्चर वैल्यू चेन को सुदृढ़ करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है, जिससे उत्पादन, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन की व्यवस्था मजबूत होगी।
युवा उद्यमियों के लिए स्टार्टअप इंडिया फंड ऑफ फंड्स 2.0 को दस हजार करोड़ रुपये के कॉर्पस के साथ स्वीकृति देना भविष्य की अर्थव्यवस्था की तैयारी है। तकनीक, उन्नत विनिर्माण और नवाचार आधारित उद्योगों को प्रोत्साहन देकर भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति सुदृढ़ करेगा। सेवा तीर्थ से संचालित यह पहल दर्शाती है कि शासन अब केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं, बल्कि नवोन्मेष को भी समान महत्व दे रहा है।
प्रधानमंत्री ने उद्घाटन समारोह में कहा कि साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतें ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक जरूरतों के लिए बनी थीं, जबकि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन जैसे परिसर भारत की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निर्मित किए गए हैं। यह कथन शासन की मानसिकता में आए परिवर्तन को स्पष्ट करता है। अब निर्णय किसी शासक की सोच को लागू करने के लिए नहीं, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए होंगे।
सेवा तीर्थ का निर्माण प्रशासनिक दक्षता की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। वर्षों से दिल्ली में विभिन्न मंत्रालय अलग-अलग इमारतों में संचालित हो रहे थे, जिन पर भारी किराया व्यय होता था। कर्मचारियों की आवाजाही में समय और संसाधनों की हानि होती थी। नए परिसर के माध्यम से इन खर्चों में कमी आएगी, समय की बचत होगी और कार्यक्षमता में वृद्धि होगी। यह कदम आर्थिक अनुशासन और सुशासन का उदाहरण है।
इस परिवर्तन को व्यापक संदर्भ में देखें तो यह गुलामी की मानसिकता से मुक्ति के अभियान का हिस्सा है। पहले रेसकोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग किया गया, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और पुलिस स्मारक जैसे निर्माण किए गए। इन सभी प्रयासों का उद्देश्य स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र पहचान को स्थापित करना है। सेवा तीर्थ उसी श्रृंखला की कड़ी है, जहां नामकरण भी विचारधारा और दृष्टिकोण का द्योतक बन जाता है।
देश के विकास के साथ जुड़ता सेवा तीर्थ का नाम अपने आप में उन्नति की निशानी है। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि विकसित भारत के संकल्प का प्रतीक है। यहां से लिए गए निर्णय प्रशासनिक फाइलों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करेंगे। यह स्थल शासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और संवेदनशील बनाने की दिशा में प्रेरित करेगा।
नए भारत की पहचान केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति के परिवर्तन से भी बनती है। सेवा तीर्थ इस परिवर्तन का जीवंत उदाहरण है। यह सत्ता के केंद्रीकरण से सेवा के विकेंद्रीकरण की यात्रा है। यहां से उठने वाली हर पहल नागरिकों के विश्वास को मजबूत करेगी और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को गति देगी।
सेवा तीर्थ उस विचार का प्रतीक है जिसमें शासन स्वयं को जनता का सेवक मानता है। जब कार्यस्थल ही सेवा का संदेश देता हो, तो निर्णयों में संवेदनशीलता स्वाभाविक हो जाती है। विकसित भारत की कल्पना केवल योजनाओं और नीतियों में नहीं, बल्कि ऐसे ही प्रेरक प्रतीकों में भी साकार होती है। सेवा तीर्थ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो आने वाले वर्षों में भारत की प्रशासनिक कार्यसंस्कृति को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।
कांतिलाल मांडोत

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