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मोबाइल को साधन बनाएं, स्वामी न बनने दें
तकनीक का उद्देश्य जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाना था
प्रो. (डा.) मनमोहन प्रकाश
तकनीक का उद्देश्य जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाना था, किंतु आज वही तकनीक मानव के समय, ध्यान और व्यवहार पर अधिकार करती दिखाई देती है। यही कारण है कि तकनीक के महत्वपूर्ण अविष्कार 'मोबाइल' को साधन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
मोबाइल आज मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। इसके बिना दिनचर्या अधूरी-सी प्रतीत होती है। कभी जेब में, कभी हथेली में, कभी तकिए के नीचे और कई बार अनजाने में विवेक के ऊपर।आज के समय में यह केवल संचार का उपकरण नहीं रहा, बल्कि इक्कीसवीं सदी का सबसे प्रभावशाली सहचर बन गया है। विडंबना यह है कि हर समय जुड़े रहने के बावजूद आधुनिक मानव भीतर से अधिक अकेलापन अनुभव कर रहा है।
आज अधिकांश लोगों की सुबह सूर्य दर्शन से पहले मोबाइल स्क्रीन दर्शन से शुरू होती है और रात भी उसी पर समाप्त होती है। दर्पण में स्वयं को देखने से पहले यह जानना अधिक आवश्यक हो गया है कि किसका संदेश आया, किसने पोस्ट को पसंद किया और किसने ‘सीन’ करके छोड़ दिया।यह बात सही है कि औपचारिक संदेशों से संपर्क तो बना रहता है, कुशलक्षेम का पता भी लगता रहता है,परंतु आत्मीय संवाद लगातार घटता जा रहा है। परिणामस्वरूप दूर बैठे लोग पास लगते हैं और पास बैठे लोग दूर होते चले जा रहे हैं।
आधुनिक युग के अमीर-गरीब परिवार का मोबाइल एक सक्रिय सदस्य बन चुका है। छोटे बच्चे को खाना खिलाने, बहलाने और सुलाने से लेकर विद्यार्थियों के होमवर्क, प्रोजेक्ट और ऑनलाइन कक्षाओं तक हर जगह उसकी उपस्थिति अनिवार्य-सी हो गई है। वृद्धजनों के लिए यह भजन, प्रवचन और मनोरंजन का साधन है, तो कामकाजी वर्ग के लिए सीमित अवकाश में मनोरंजन का प्रमुख साथी।
जन्म से लेकर विवाह और शोक-सूचनाओं तक, बैंकिंग, टिकट बुकिंग, डिजिटल भुगतान, ई-शासन, ऑनलाइन खरीदारी, स्वास्थ्य परामर्श और दूरस्थ शिक्षा—आज लगभग सब कुछ मोबाइल के माध्यम से संभव हुआ है। समय की बचत और सुविधाओं का विस्तार इसका सकारात्मक पक्ष है, किंतु इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही गहरा और चिंताजनक है।
भोजन की थाली सामने हो, माता-पिता कुछ कहना चाहें या जीवनसाथी संवाद की अपेक्षा रखे,अक्सर उत्तर मिलता है, “रुको, ज़रा एक ज़रूरी मैसेज देख लूँ,या भेज दूं।” यह जानते हुए भी कि वाहन चलाते समय मोबाइल का उपयोग जानलेवा हो सकता है, फिर भी यह आदत छूट नहीं पाती। यहीं से प्रश्न उठता है कि "क्या हम मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं या मोबाइल हमें उपयोग कर रहा है"?
आज प्रत्येक व्यक्ति के पास उसका निजी मोबाइल है। कुछ के पास तो एक से अधिक भी।इस यंत्र में उपयोग करने वाले की पूरी डिजिटल जन्मकुंडली सुरक्षित रहती है,मसलन क्या देखा, कब देखा, किससे बात की, कहाँ गया आदि। यही कारण है कि मोबाइल पर उपयोग कर्ता ने ताला लगा कर रखा है।यह एक ऐसा मूक जासूस बन गया है, जो मनुष्य की गोपनीयताओं से भली-भांति परिचित है। जहाँ यह बिछुड़ों को मिला सकता है, वहीं अविश्वास और संबंधों में दरार का कारण बन अपने प्रिय जनों को दूर भी कर सकता है।
फैशन, विचारधाराएँ, सही-गलत और अच्छाई-बुराई की परिभाषाएँ भी आज मोबाइल से ही ग्रहण की जा रही हैं। यह ज्ञान का विशाल भंडार है।इसमें राजनीति, कला, विज्ञान, चिकित्सा, मौसम, अर्थशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक का ज्ञान समाहित है। किंतु यह ज्ञान पूर्ण भी हो सकता है, अधूरा भी और भ्रामक भी। ‘व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय’ के माध्यम से मोबाइल जहाँ जागरूक करता है, वहीं भ्रम, तनाव और वैमनस्य भी पैदा कर सकता है।
विद्यार्थियों के लिए मोबाइल सरकारी योजनाओं, शिक्षा और रोज़गार के अवसरों की जानकारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, प्रारंभिक साक्षात्कार और ‘वर्क फ्रॉम होम’ जैसी संभावनाओं का सशक्त माध्यम है। किंतु इसका असीमित उपयोग उनकी एकाग्रता, स्मरण-शक्ति और धैर्य को प्रभावित कर रहा है।
मोबाइल-आसक्ति नींद छीनती है, आँखों और गर्दन पर दबाव डालती है तथा सोच को कुछ सेकंड की रील तक सीमित कर देती है। साइबर अपराध के क्षेत्र में इसका दुरुपयोग और भी गंभीर है, यथा फर्जी कॉल, झूठे लिंक, डेटा चोरी, ब्लैकमेलिंग, साइबर बुलिंग और डीपफेक जैसी चुनौतियाँ तेज़ी से बढ़ रही हैं। मोबाइल घर की सुरक्षा में सहायक भी हो सकता है और आपकी सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से चोरों को यह सूचना भी दे सकता है कि आप घर पर नहीं हैं।
इन सब नकारात्मक पहलुओं के बावजूद मोबाइल की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता है। आपात सहायता, टेलीमेडिसिन, डिजिटल भुगतान, सरकारी सेवाओं की पहुँच, शिक्षा, नेविगेशन, आपदा प्रबंधन तथा बुज़ुर्गों और दिव्यांगों की सहायता में इसकी भूमिका सराहनीय है। अतः निष्कर्ष स्पष्ट है कि मोबाइल मानव जीवन का आवश्यक साधन है, परंतु उसका स्वामी नहीं। संतुलित उपयोग, डिजिटल अनुशासन, सुरक्षा के प्रति सजगता और अपनों से प्रत्यक्ष संवाद ही इसे मानवता के लिए वरदान बना सकते हैं।

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