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राष्ट्र निर्माण का संकल्प परम्परा से प्रेरणा और भविष्य की दिशा
राष्ट्र केवल भू-भाग का नाम नहीं होता और न ही वह मात्र शासन-व्यवस्था से परिभाषित होता है। राष्ट्र व्यक्ति, संस्कृति, इतिहास, मूल्यों और साझा आकांक्षाओं की जीवंत अभिव्यक्ति है। भारत जैसे प्राचीन देश के लिए राष्ट्र की संकल्पना और भी व्यापक है, क्योंकि यहाँ राज्य से पहले सभ्यता थी, संविधान से पहले संस्कृति थी और सत्ता से पहले समाज था। आज जब हम राष्ट्र-निर्माण की बात करते हैं तो हमें अपने अतीत की उन जड़ों की ओर लौटना आवश्यक हो जाता है, जहाँ से हमारी राष्ट्रीय चेतना ने आकार लिया।
स्वाधीनता प्राप्ति का इतिहास हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र का निर्माण त्याग, तप और अनुशासन से होता है। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के माध्यम से जन-शक्ति को संगठित किया। सुभाष चन्द्र बोस ने अदम्य साहस और संघर्ष की भावना जगाई। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण का स्वप्न देखा और सरदार वल्लभभाई पटेल ने बिखरी रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर राजनीतिक एकता स्थापित की। इन नेताओं के लिए सत्ता साध्य नहीं बल्कि साधन थी। उनका उद्देश्य व्यक्तिगत प्रतिष्ठा नहीं बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण था। यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद भी राष्ट्र-निर्माण का कार्य एक सतत प्रक्रिया के रूप में चलता रहा।
किन्तु समय के साथ परिस्थितियाँ बदलीं। लोकतंत्र की स्थापना के बाद संविधान ने हमें अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी बोध कराया। परन्तु आज का परिदृश्य कई प्रश्न खड़े करता है। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर समाज का विखंडन राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती बन रहा है। राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता की जगह अवसरवादिता बढ़ी है। सत्ता-प्राप्ति के लिए नैतिक मूल्यों से समझौते की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। यह स्थिति उस आदर्शवाद से भिन्न है जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय दिखाई देता था।
आज राष्ट्र-निर्माण का अर्थ केवल आर्थिक विकास नहीं रह गया है। भौतिक प्रगति आवश्यक है, किन्तु उसके साथ नैतिक और सांस्कृतिक विकास भी उतना ही अनिवार्य है। यदि विकास के साथ चरित्र का निर्माण नहीं होगा तो समाज में असंतुलन उत्पन्न होगा। आधुनिक शिक्षा ने ज्ञान के नए आयाम खोले हैं, परन्तु यदि उसमें संस्कारों का समावेश न हो तो वह अधूरी रह जाती है। प्राचीन भारत में तक्षशिला विश्वविद्यालय और नालन्दा विश्वविद्यालय जैसे शिक्षाकेंद्र केवल बौद्धिक ज्ञान ही नहीं देते थे, बल्कि जीवन-मूल्यों की शिक्षा भी प्रदान करते थे। वहाँ स्वावलम्बन, अनुशासन और नैतिकता को शिक्षा का अभिन्न अंग माना जाता था। आज आवश्यकता है कि हम आधुनिकता और परम्परा के बीच संतुलन स्थापित करें।
युवाशक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होती है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब युवाओं ने सकारात्मक दिशा में ऊर्जा लगाई, तब-तब परिवर्तन हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में युवाओं की भूमिका निर्णायक रही। आज भी वही ऊर्जा राष्ट्र-निर्माण का आधार बन सकती है, बशर्ते उसे सही दिशा मिले। आज के युवा तकनीक से जुड़े हैं, विश्व के विचारों से परिचित हैं और अवसरों से परिपूर्ण हैं। यदि उनमें राष्ट्र-प्रेम, सामाजिक उत्तरदायित्व और कर्तव्य-बोध का समावेश हो जाए तो वे भारत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।
समकालीन संदर्भ में राष्ट्र-निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण आयाम सामाजिक समरसता है। धार्मिक सहिष्णुता और विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। अतीत में भी अनेक मत और पंथ साथ-साथ पनपे। यदि हम संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाएँ तो विभाजनकारी प्रवृत्तियों को रोका जा सकता है। संगठन की शक्ति को समझना होगा। जैसे बँधी हुई झाड़ू के तिनके मिलकर स्वच्छता का कार्य करते हैं, वैसे ही संगठित समाज ही राष्ट्र को सुदृढ़ बना सकता है।
राष्ट्र-सेवा केवल युद्धभूमि में शत्रु से संघर्ष तक सीमित नहीं है। यह सेवा समाज के हर छोटे-बड़े कार्य में निहित है। ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन करना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, पर्यावरण की सुरक्षा करना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी राष्ट्र-निर्माण का ही भाग है। जब उद्योगपति समाजहित में योगदान देते हैं, जब शिक्षक समर्पण के साथ विद्यार्थियों को संस्कार देते हैं, जब नागरिक कर का ईमानदारी से भुगतान करते हैं, तब राष्ट्र की नींव मजबूत होती है।
वर्तमान समय में वैश्वीकरण ने विश्व को एक सूत्र में बाँध दिया है। संचार क्रांति ने सीमाओं को लगभग प्रतीकात्मक बना दिया है। ऐसे में राष्ट्र-निर्माण का अर्थ आत्मनिर्भरता के साथ वैश्विक सहयोग भी है। हमें अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए विश्व से संवाद स्थापित करना होगा। जो श्रेष्ठ हमारे पास है उसे दुनिया के सामने रखना और जो अच्छा बाहर है उसे अपनाना ही संतुलित विकास का मार्ग है।
अंततः राष्ट्र-निर्माण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें हर पीढ़ी की भागीदारी अनिवार्य है। अतीत हमें प्रेरणा देता है, वर्तमान हमें अवसर देता है और भविष्य हमसे संकल्प की अपेक्षा करता है। यदि हम अपने स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों को स्मरण रखते हुए आधुनिक चुनौतियों का सामना करें, शिक्षा में संस्कारों का समावेश करें, युवाओं में सेवा-भाव जगाएँ और समाज में समरसता को बढ़ावा दें, तो भारत न केवल भौतिक रूप से समृद्ध होगा बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी विश्व के लिए आदर्श बन सकेगा। यही सच्चे अर्थों में राष्ट्र-निर्माण का संकल्प है।
कांतिलाल मांडोत

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