मौत का कारोबार: एक हॉस्पिटल सीज़ कर देने से क्या रुक जाएगी गोंडा की फर्जी स्वास्थ्य व्यवस्था?
दो नवजातों की हत्या जैसी मौत के बाद भी केवल सीज़ — जनता का गुस्सा, सीएमओ के बयान पर विवाद और पूरे जिले में फैले फर्जी क्लिनिकों का खुला नेटवर्क सवालों के घेरे में
गोंडा। जानकी नगर मोहल्ले के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान दो नवजात बच्चों की दर्दनाक मौत ने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। प्रशासन ने उक्त अस्पताल को घटना के बाद सीज़ (सिल) कर दिया है, लेकिन जनता और स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता इस कदम को सिर्फ़ “दिखावटी कार्रवाई” मान रहे हैं। सवाल सुलग रहे हैं — क्या सिर्फ़ एक-दो अस्पताल को सीज़ कर देना ही पर्याप्त है? क्या बुलडोजर जैसी कड़ी कार्रवाई की कमी इस मामले की गम्भीरता नहीं दिखाती? और सबसे बड़ा सवाल — इन मौतों का जिम्मेदार कौन है?
क्या 'सीज़ कर देना' ही सबसे बड़ी कार्रवाई है?
शुरुआती तौर पर अस्पताल को सीज़ करना परिजनों और स्थानीय नागरिकों के लिए तत्काल राहत जैसा दिखा, पर विशेषज्ञों और नागरिकों का कहना है कि यह एक अल्पकालिक कदम मात्र है। मौजूदा व्यवस्था में बिना पंजीकरण वाले क्लिनिक और निजी अस्पताल अक्सर कहीं और नए पते पर फिर से खुल जाते हैं या संचालक केवल नाम बदलकर काम चालू रख लेते हैं। इसलिए सिर्फ सीज़िंग होने से समस्या का जड़ खत्म नहीं होती — असली जरूरत है दोषियों पर तेज़, पारदर्शी और कानूनी कार्रवाई की।
स्थानीय नागरिक निहार ने कहा, “हॉस्पिटल सीज़ कर दिया, पर क्या मालिक, संचालक और जिन अधिकारियों ने इसे दर्ज़ होने दिया — उन पर मुकर्रर कार्रवाई होगी? सिर्फ खबरों में सीज़ दिखाना बड़े सवालों का जवाब नहीं है।”
क्यों नहीं चलेगा 'बुलडोजर' — या क्यों नहीं किया जा रहा?
हालांकि शासन की भाषा में ‘बुलडोजर’ एक सख्त संकेत बन चुका है, पर स्वास्थ्य माफिया और अवैध क्लिनिकों के मामलों में यह तर्ज़ पर अलग कारण मौजूद हैं — राजनीतिक-आर्थिक लिंकेज, जमीन/व्यवसायों का आर्थिक हित, और स्थानीय संरक्षण। कई बार इन क्लिनिकों के पीछे बड़े नेटवर्क और पैसे होते हैं जो त्वरित कार्रवाई को रोकते हैं।दूसरी ओर प्रशासन कहता है कि बुलडोजर जैसा कोई कदम कानूनी प्रक्रियाओं के बिना नहीं उठाया जा सकता — जहाँ जीवनदाता सेवाओं का प्रश्न है, वहाँ बिना कानूनी प्रक्रिया के हिंसक कार्रवाई पर सवाल उठते हैं। पर जनता का मत है कि यदि कानून की तेज़ी से पालना कर अपराधियों की संपत्ति जब्त की जाए, लाइसेंस रद्द किए जाएँ और आपराधिक मुक़दमों की शुरुआत हो तो वही बुलडोजर की तरह प्रभावी नतीजा दे सकता है — बशर्ते कार्यवाही पारदर्शी और त्वरित हो।
जिम्मेदार कौन? — संचालक, चिकित्सक या सिस्टम?
इस मामले में कई स्तरों पर जिम्मेदारी तय करनी होगी — संचालक जिसने बिना पंजीकरण के अस्पताल चलाया; संविदा बताने वाला चिकित्सक जिसने वहां मरीजों को भेजा; और वे प्रशासनिक अफसर जिनके निगरानी के दायरे में ये संस्थाएँ आती रहीं। स्वास्थ्य व्यवस्था की फेलिंग सिर्फ़ एक व्यक्ति तक ससीमित नहीं है — यह सिस्टमेटिक विफलता है।
सीएमओ डॉ. रश्मि वर्मा के बयान को लेकर हुए विवाद ने भी प्रश्न खड़े कर दिए कि क्या स्वास्थ्य महकमे की प्राथमिकताओं में मरीजों की सुरक्षा और जवाबदेही शीर्ष पर है। लोगों का गुस्सा इसलिए भी बढ़ा क्योंकि आरोप है कि लापरवाही और सुस्त कार्रवाई के कारण मासूमों की जान चली गयी।
पूरे जिले में फैला नेटवर्क — यह पहला मामला नहीं
गोंडा के जिन्हें इलाकों का जायजा लिया गया है, वहां फर्जी क्लिनिक, अवैध हॉस्पिटल और अनाधिकृत मेडिकल स्टोर्स की एक लंबी सूची मिलती है। ये संस्थाएँ अक्सर चौक-चौराहों और बाजारों में खुलेआम चलती हैं — जिनकी जानकारी स्थानीय स्वास्थ्य कार्यालयों से लेकर जिला प्रशासन तक मौजूद रहती है। कई बार स्थानीय शिकायतों के बाबजूद औपचारिक नोटिस निकालकर मामला शांत कर दिया जाता है, पर गंभीर आपराधिक मुक़दमे नहीं चलाए जाते। यही वजह है कि यह व्यापार वर्षों से फल-फूल रहा है। स्थानीय चिकित्सक संघ का कहना है कि जब तक डॉक्टरों के पंजीकरण, अस्पतालों के लाइसेंस और उपकरणों की कठोर जाँच नहीं होगी, और दोषियों पर आर्थिक व आपराधिक दंड लागू नहीं होगा, तब तक ऐसी घटनाएँ सिलसिलेवार होती रहेंगी।
जनता की मांग — सिर्फ़ सीज़ नहीं, सख्त और पारदर्शी कार्रवाई चाहिए
स्थानीय प्रदर्शनकारियों और परिजनों की मांगें साफ हैं:
1. मृतक नवजातों की फॉरेंसिक जांच व नेक्रोस्कोपी पूरी पारदर्शिता के साथ हो।
2. अस्पताल संचालक और वहाँ तैनात चिकित्सक व स्टाफ़ के खिलाफ आपराधिक मुक़दमे दर्ज हों — केवल प्रशासनिक नोटिस नहीं।
3. जिले के सभी निजी अस्पतालों/क्लिनिकों की तत्काल व सार्वजनिक सूची जारी कर डिजिटल रजिस्टर बनाए जाएँ।
4. स्वास्थ्य विभाग के उन अधिकारीयों पर भी जांच हो जिनके दायरे में यह अवैध गतिविधियाँ चल रही थीं।
5. फर्जी अस्पतालों की संपत्ति जब्त करने और लाइसेंस रद्द करने जैसे कड़े आर्थिक कदम उठाए जाएँ।
निष्कर्ष — समाधान का फार्मूला
घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल “चीज कर देना” (सीज़) न तो न्याय है और न ही सुधार। असरदार कदम वे होंगे जिनमें कानूनी मुक़दमों की त्वरित शुरुआत, दोषियों की आर्थिक ज़ब्ती, पारदर्शी डिजिटल रजिस्टर, और जनता की निगरानी शामिल हो — साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करना ताकि लोग निःशुल्क गुणवत्तापूर्ण इलाज के विकल्प अपनाएँ। यदि प्रशासन इन बिंदुओं पर ठोस और पारदर्शी कदम उठाता है तो यह घटना सिर्फ़ एक चेतावनी बनकर रह जाएगी — वरना गोंडा का यह दर्दनाक अध्याय वहीँ रुक जाएगा जहाँ से शुरू हुआ: कागज़ों पर सीज़ और सड़कों पर नारा-निशान।


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