2027 का चुनाव: जातीय समीकरण से ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे जनता के रोजमर्रा के सवाल

उत्तर प्रदेश का मतदाता पिछले कुछ वर्षों में कई स्तरों पर बदला है।

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राजीव शुक्ला
 
उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनाव कभी केवल चुनाव नहीं होते। यहां चुनाव सामाजिक समीकरणों, जातीय पहचान, क्षेत्रीय प्रभाव, धार्मिक ध्रुवीकरण, नेतृत्व की लोकप्रियता और सरकार के कामकाज—इन सबका मिला-जुला परिणाम होते हैं। वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव भी इससे अलग नहीं होगा। सभी राजनीतिक दल अभी से अपनी-अपनी रणनीतियां बनाने में जुट गए हैं और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने की कवायद तेज होती दिखाई दे रही है। लेकिन इस बार सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल जातीय समीकरणों के सहारे सत्ता की राह आसान होगी? उत्तर प्रदेश का मतदाता पिछले कुछ वर्षों में कई स्तरों पर बदला है।
 
वह जाति और समुदाय को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करता, लेकिन उसके सामने रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े ऐसे सवाल भी हैं जिन्हें चुनावी भाषणों में लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता। रोजगार चाहिए, महंगाई से राहत चाहिए, बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए, अस्पताल में इलाज चाहिए, सुरक्षित माहौल चाहिए, किसानों को उचित आय चाहिए, छोटे व्यापारियों को कारोबार का अवसर चाहिए और सरकारी दफ्तरों में बिना सिफारिश तथा बिना अनावश्यक भागदौड़ के काम चाहिए। यही वे मुद्दे हैं जो 2027 की चुनावी बहस की असली दिशा तय कर सकते हैं।
 
जातीय समीकरण महत्वपूर्ण, लेकिन निर्णायक अकेले नहीं उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति को जातीय समीकरणों से अलग करके समझना मुश्किल है। राजनीतिक दलों के टिकट वितरण से लेकर संगठनात्मक नियुक्तियों और चुनावी रणनीति तक सामाजिक प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हर दल अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश करेगा। लेकिन जातीय पहचान और राजनीतिक पसंद के बीच अब पहले जैसी सीधी रेखा नहीं रह गई है। एक ही जाति या समुदाय के मतदाता अलग-अलग मुद्दों के आधार पर अलग राजनीतिक विकल्प चुन सकते हैं।
 
युवा मतदाता रोजगार को प्राथमिकता दे सकता है, महिला मतदाता सुरक्षा और महंगाई को, किसान लागत और बाजार को तथा व्यापारी कारोबार और प्रशासनिक व्यवस्था को। इसलिए 2027 में जातीय समीकरण चुनाव की जमीन तैयार कर सकते हैं, लेकिन उस जमीन पर परिणाम की इमारत केवल जातीय गणित से खड़ी होगी, यह मान लेना राजनीतिक दलों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। उत्तर प्रदेश की विशाल युवा आबादी चुनावी राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण वर्ग है। युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल रोजगार और भविष्य का है। सरकारी नौकरियां सीमित हैं और हर युवा सरकारी नौकरी का इंतजार नहीं कर सकता।
 
असली चुनौती ऐसे निजी और स्थानीय रोजगार पैदा करने की है, जिनमें सम्मानजनक आय, स्थिरता और आगे बढ़ने की संभावना हो। लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, छोटे कारोबार, सेवा क्षेत्र, निर्माण गतिविधियां और स्थानीय उद्यम यदि मजबूत होते हैं तो रोजगार का बड़ा आधार तैयार हो सकता है। लेकिन यदि छोटे उद्यम लागत, बिजली, कर्ज, बाजार, नियमों और प्रशासनिक जटिलताओं के बीच कमजोर पड़ते हैं तो रोजगार का संकट और गहरा सकता है।
 
2027 में राजनीतिक दलों से केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं होगा कि कितनी नौकरियां देने का वादा किया जा रहा है। सवाल यह भी होगा कि वे नौकरियां आएंगी कहां से, निजी क्षेत्र कैसे बढ़ेगा और छोटे शहरों तथा कस्बों में रोजगार के अवसर कैसे बनेंगे? महंगाई का राजनीतिक असर आंकड़ों से ज्यादा रसोई में दिखाई देता है। परिवार का मासिक बजट जब बिगड़ता है तो उसका असर भोजन से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और बचत तक पहुंचता है।
 
सरकारें महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अनेक नीतिगत कदम उठा सकती हैं, लेकिन आम परिवार का सवाल सीधा है—महीने के अंत में घर का खर्च कैसे चले? 2027 के चुनाव में राजनीतिक दलों को यह बताना होगा कि आम परिवार की क्रय शक्ति बढ़ाने के लिए उनकी ठोस योजना क्या है। केवल राहत योजनाएं लंबे समय का समाधान नहीं हो सकतीं। स्थायी समाधान आय बढ़ाने, रोजगार पैदा करने और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर प्रभावी नियंत्रण की क्षमता में है।
 
किसान अब केवल समर्थन नहीं, सम्मानजनक आय चाहता है उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। लेकिन किसान की समस्या को केवल चुनावी नारों तक सीमित करना अब पर्याप्त नहीं होगा। किसान के सामने लागत बढ़ने, बाजार, सिंचाई, भंडारण, फसल के उचित मूल्य और मौसम की अनिश्चितता जैसे सवाल हैं। छोटे और सीमांत किसान के लिए खेती केवल उत्पादन का प्रश्न नहीं, परिवार की आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न है।
 
2027 में किसान यह देखेगा कि किस राजनीतिक दल की नीतियां उसकी आय और जोखिम दोनों को समझती हैं। केवल कर्जमाफी या सहायता की घोषणा से आगे बढ़कर कृषि को टिकाऊ और लाभकारी बनाने की बहस जरूरी होगी। शिक्षा और स्वास्थ्य पर जनता का धैर्य टूट रहा है। किसी भी सरकार की वास्तविक परीक्षा स्कूल और अस्पताल में होती है। गरीब परिवार के बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलती है या नहीं और बीमारी की स्थिति में परिवार को आर्थिक संकट से गुजरना पड़ता है या नहीं—इन सवालों का असर किसी राजनीतिक नारे से कम नहीं है।
 
सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता, तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और उच्च शिक्षा की लागत जैसे मुद्दे युवाओं और अभिभावकों को प्रभावित करते हैं। इसी तरह सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर, दवाएं, जांच सुविधाएं, आपातकालीन सेवाएं और मरीजों के साथ व्यवहार भी चुनावी मुद्दा बन सकता है। जनता अब केवल भवन नहीं देखती। वह पूछती है—भवन बन गया, लेकिन उसमें सेवा कितनी मिल रही है? कानून-व्यवस्था चुनाव का हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगी। सरकारें अपने प्रदर्शन के आंकड़े सामने रखेंगी और विपक्ष अपने अनुभवों तथा घटनाओं को मुद्दा बनाएगा।
 
लेकिन आम नागरिक के लिए कानून-व्यवस्था का अर्थ बहुत सरल है—उसकी शिकायत सुनी जाए, पुलिस निष्पक्ष व्यवहार करे, अपराधी के खिलाफ कार्रवाई हो और निर्दोष व्यक्ति अनावश्यक कानूनी परेशानी में न फंसे। जनता के मन में यह विश्वास होना चाहिए कि कानून सबके लिए समान है। यदि किसी व्यक्ति को न्याय पाने के लिए प्रभाव, पहचान या आर्थिक क्षमता का सहारा लेना पड़े तो व्यवस्था पर उसका भरोसा कमजोर होता है। इसलिए 2027 में कानून-व्यवस्था की बहस केवल अपराध की संख्या तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
 
पुलिस की जवाबदेही, निष्पक्ष जांच, समयबद्ध न्याय और नागरिक अधिकार भी इसके केंद्र में होने चाहिए। छोटे व्यापारी और मध्यम वर्ग की आवाज चुनावी राजनीति में गरीब और बड़े उद्योगों की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन छोटे व्यापारी, दुकानदार, स्वरोजगार करने वाले लोग और निम्न-मध्यम वर्ग भी बड़ी संख्या में राजनीतिक परिणाम प्रभावित करते हैं। छोटे व्यापारियों के लिए कारोबार चलाना आसान है या मुश्किल? बिजली, किराया, कर, लाइसेंस, बाजार और ऑनलाइन प्रतिस्पर्धा का दबाव कितना है? स्थानीय बाजारों में ग्राहक की क्रय शक्ति कैसी है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब चुनावी घोषणापत्रों में दिखाई देना चाहिए।
 
मध्यम वर्ग की भी अपनी चिंताएं हैं—बच्चों की फीस, मकान, स्वास्थ्य खर्च, परिवहन, रोजगार की असुरक्षा और भविष्य के लिए बचत। यह वर्ग अक्सर राजनीतिक विमर्श में दिखाई कम देता है, लेकिन मतदान के समय उसकी प्राथमिकताएं निर्णायक हो सकती हैं। उत्तर प्रदेश तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। सड़कें, एक्सप्रेसवे, मेट्रो, एयरपोर्ट और बड़े प्रोजेक्ट विकास की तस्वीर बदल रहे हैं। लेकिन विकास का दूसरा चेहरा भी है—जलभराव, यातायात, अतिक्रमण, कचरा, प्रदूषण, खराब नालियां और स्थानीय स्तर पर नागरिक सुविधाओं की कमी। गांवों में भी सड़क और बिजली से आगे रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई और स्थानीय अर्थव्यवस्था के सवाल हैं। 2027 में विकास की परिभाषा केवल बड़े प्रोजेक्टों की संख्या नहीं हो सकती। सवाल यह होगा कि इन परियोजनाओं का आम आदमी की जिंदगी पर वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा।

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