होर्मुज में थमी रफ्तार ने बढ़ाई दुनिया की धड़कन, तेल से लेकर महंगाई तक गहराता संकट

"ईरान युद्ध का वैश्विक असर, खाड़ी से तेल आपूर्ति आधी होने की आशंका; भारत समेत 145 देशों में पेट्रोल की कीमतों पर दबाव"

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ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध का सबसे गंभीर असर अब युद्धक्षेत्र से बाहर दिखाई देने लगा है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। युद्ध से पहले जहां इस समुद्री रास्ते से प्रतिदिन सौ से अधिक जहाज गुजरते थे, वहीं अब इनकी संख्या घटकर कुछ जहाजों तक सीमित रह गई है। यातायात में करीब 95 प्रतिशत की गिरावट का मतलब केवल समुद्री व्यापार का संकट नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा और रोजमर्रा की महंगाई से है।
 
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। इसलिए यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का असर कुछ देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया, यूरोप और अफ्रीका से लेकर दुनिया के दूर-दराज के बाजारों तक पहुंचता है। मौजूदा संकट में यही सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरा है।
 
युद्ध से पहले खाड़ी के देशों से रोजाना करीब 1.7 करोड़ बैरल कच्चे तेल का निर्यात होता था। अगस्त 2026 तक यह मात्रा घटकर लगभग 90 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई है। यानी खाड़ी क्षेत्र से होने वाला तेल निर्यात करीब आधे स्तर पर पहुंच गया है। बाजार विशेषज्ञों का अनुमान है कि प्रतिदिन 50 से 70 लाख बैरल तक तेल की आपूर्ति किसी न किसी रूप में प्रभावित हो रही है।
 
इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई दे रहा है। युद्ध से पहले की तुलना में तेल करीब 20 प्रतिशत तक महंगा हो चुका है। यदि होर्मुज में लंबे समय तक सामान्य आवाजाही बहाल नहीं होती है तो तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल के साथ-साथ विमान ईंधन, परिवहन और औद्योगिक उत्पादन की लागत पर पड़ेगा।
 
होर्मुज का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि इस रास्ते से केवल कच्चा तेल ही नहीं गुजरता। रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों, तरलीकृत पेट्रोलियम गैस, तरलीकृत प्राकृतिक गैस और विभिन्न प्रकार के माल की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही भी इस मार्ग पर निर्भर है। युद्ध से पहले दुनिया के रिफाइंड तेल उत्पादों का लगभग पांचवां हिस्सा और वैश्विक एलपीजी व्यापार का बड़ा हिस्सा इस समुद्री मार्ग से गुजरता था।
 
कंटेनर माल, कोयला, अनाज और लौह अयस्क जैसे थोक माल की आवाजाही भी इससे प्रभावित होती है। ऐसे में जहाजों की संख्या में भारी गिरावट का मतलब है कि आने वाले समय में ऊर्जा के साथ-साथ खाद्य पदार्थों, उर्वरकों, औद्योगिक कच्चे माल और तैयार सामान की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
 
खाड़ी के कई बंदरगाहों पर समुद्री गतिविधियां अचानक कम हुई हैं। कुवैत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां जहाजों की औसत दैनिक आवाजाही में करीब 85 प्रतिशत की कमी आई है। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, इराक और बहरीन के बंदरगाहों पर भी आवाजाही में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
 
सऊदी अरब की स्थिति इन देशों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर है। इसका एक कारण उसकी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन और लाल सागर के बंदरगाह हैं, जो होर्मुज पर निर्भरता कम करने में मदद करते हैं। यही अंतर बताता है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक पाइपलाइन और समुद्री मार्ग कितने महत्वपूर्ण हैं।
 
युद्ध का असर अब पेट्रोल पंपों तक पहुंच चुका है। 28 फरवरी के बाद दुनिया के करीब 145 देशों में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। म्यांमार और भूटान जैसे देशों में कीमतों में वृद्धि 55 प्रतिशत से भी अधिक रही है। इसका सबसे बड़ा कारण केवल कच्चे तेल की महंगाई नहीं है, बल्कि परिवहन लागत, बीमा खर्च और आपूर्ति मार्गों में बढ़ती अनिश्चितता भी है।
तेल महंगा होने का असर अर्थव्यवस्था में कई स्तरों पर पड़ता है। परिवहन महंगा होता है तो सामान की ढुलाई की लागत बढ़ती है। इससे खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक की कीमतें प्रभावित होती हैं। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने से महंगाई का दबाव और व्यापक हो सकता है।
 
भारत के लिए होर्मुज संकट विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश लंबे समय से पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में ऊर्जा और एलपीजी आयात करता रहा है। वर्ष 2025 में भारत ने करीब 2.18 करोड़ टन एलपीजी आयात की थी और इसका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से आया था।संकट के बाद भारत ने अपनी आपूर्ति व्यवस्था में विविधता लाने की कोशिश तेज कर दी है। एलपीजी के मामले में अमेरिका की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है। इसके अलावा कच्चे तेल और गैस के लिए अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों की ओर भी रुख किया गया है।
 
भारत ने अमेरिका, नाइजीरिया, ओमान और अंगोला से एलएनजी आपूर्ति बढ़ाई है। कच्चे तेल के क्षेत्र में वेनेजुएला, ब्राजील और अंगोला जैसे देशों से आयात बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। मई से जुलाई के बीच भारत ने अमेरिका से करीब 21.9 लाख टन एलएनजी प्राप्त किया। यह बदलाव बताता है कि संकट ने भारत को ऊर्जा आयात के पारंपरिक स्रोतों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है।
 
होर्मुज के विकल्प की तलाश
मौजूदा परिस्थितियों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि होर्मुज लंबे समय तक बाधित रहा तो दुनिया उसकी भरपाई कैसे करेगी। सऊदी अरब जैसे देशों के पास वैकल्पिक पाइपलाइन और बंदरगाह मौजूद हैं, लेकिन पूरी वैश्विक मांग को अचानक दूसरे रास्तों पर स्थानांतरित करना आसान नहीं है।
 
वेनेजुएला को लेकर अमेरिका की नई ऊर्जा कूटनीति भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि वहां तेल उत्पादन और निर्यात बढ़ता है तो वैश्विक बाजार में पश्चिमी गोलार्ध से अतिरिक्त आपूर्ति आ सकती है। इससे खाड़ी क्षेत्र और रूस पर दुनिया की निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है। हालांकि किसी एक नए स्रोत से होर्मुज की पूरी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
 
खाड़ी देश भी भविष्य की अर्थव्यवस्था तैयार कर रहे
तेल पर लंबे समय तक निर्भर रहने के जोखिम को खाड़ी देश पहले से समझ रहे हैं। ऊर्जा संक्रमण और इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देश तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ा रहे हैं।
 
सऊदी अरब उन्नत चिप निर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े डेटा सेंटर विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। संयुक्त अरब अमीरात में बड़े एआई परिसर की योजना बनाई जा रही है, जबकि कतर भी डेटा सेंटर और डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश कर रहा है। इसका उद्देश्य साफ है—तेल के बाद की अर्थव्यवस्था के लिए अभी से नए आय के स्रोत तैयार करना।
 
होर्मुज संकट का सबसे बड़ा खतरा इसकी अवधि को लेकर है। यदि समुद्री यातायात जल्दी सामान्य होता है तो बाजार धीरे-धीरे स्थिर हो सकते हैं। लेकिन यदि तनाव अगले कई महीनों तक बना रहा तो दुनिया को तेल और गैस की कीमतों, महंगाई, समुद्री बीमा, माल ढुलाई और औद्योगिक आपूर्ति में लंबे समय तक अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है।
 
यह संकट एक बार फिर साबित करता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था ऊर्जा आपूर्ति के कुछ महत्वपूर्ण मार्गों पर कितनी निर्भर है। होर्मुज केवल एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था की जीवनरेखा है। यहां पैदा हुआ संकट पेट्रोल पंप से लेकर कारखाने, बिजलीघर, रसोई और बाजार तक पहुंच सकता है। इसलिए आने वाले छह महीने केवल खाड़ी देशों के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
 
कांतिलाल मांडोत

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