एक ऐसी दुनिया जहाँ सब उपलब्ध हैं, पर कोई उपस्थित नहीं

रील्स की नदी में बहते-बहते किनारे पर बैठे रिश्ते सूख गए, इंसानियत का ‘लास्ट सीन’ देख लिया… अब रील्स ही रील्स हैं

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प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

सभ्यता का सबसे गहरा घाव किसी युद्धमहामारी या आर्थिक संकट ने नहींउस चमकती स्क्रीन ने दिया है जिसे हमने सुविधा समझकर जीवन का केंद्र बना लिया। इतिहास में पहली बार संवाद के साधन सबसे अधिक हैंपर संवाद सबसे कम है। आवाज़ें हैंपर महत्व नहीं। हर चेहरा ऑनलाइन हैपर हर मन ऑफलाइन हो रहा है। रिश्तेदफ्तरलोकतंत्र और अंतर्मन तक 'म्यूटहोने लगे हैं। उँगलियाँ सक्रिय हैंपर संवेदनाएँ निष्क्रिय। उत्तर तुरंत मिल रहे हैंलेकिन किसी को समझने में पहले से अधिक समय लग रहा है। यह तकनीक की विजय नहींमानवीय उपस्थिति के मौन विस्थापन की कथा है। जिसने दुनिया को जोड़ने का दावा कियाउसी ने मनुष्य को उसके सबसे निकट बैठे व्यक्ति से सबसे अधिक दूर कर दिया। यही हमारे समय का सबसे मौनव्यापक और सबसे कम समझा गया सामाजिक पतन है।

परिवारों का विघटन अब खामोशी में हो रहा है। घर दीवारों से नहींस्क्रीन से संचालित हैं। एक ही छत के नीचे लोग अलग-अलग डिजिटल दुनियाओं में जी रहे हैं। भारत में औसत व्यक्ति प्रतिदिन सात घंटे से अधिक स्क्रीन पर बिताता है। माता-पिता पाँच घंटे से अधिक और बच्चे चार घंटे से अधिक समय स्मार्टफोन पर बिताते हैं। अध्ययनों में दो-तिहाई माता-पिता और आधे से अधिक बच्चों ने माना कि मोबाइल ने रिश्तों की ऊष्मा घटा दी है। भोजन की मेज़जो कभी संवाद का केंद्र थीअब रील्स का मंच है। बच्चे बोलना चाहते हैंपर माता-पिता स्क्रीन पर हैंमाता-पिता संवाद चाहते हैंतब बच्चे स्क्रॉल करते हैं। सामने बैठे व्यक्ति की उपेक्षा कर मोबाइल में डूबे रहने की आदत—'फुबिंग'—सामान्य हो रही है। रिश्ते अचानक नहीं टूटतेवे पहले सुननाफिर महसूस करना छोड़ते हैं। अंततः केवल औपचारिक संपर्क बचता है। घर अब भी हैंपर आत्मीयता साइलेंट मोड में है।

कार्यस्थलों की सबसे बड़ी दूरी अब किलोमीटरों में नहींमनुष्यों के बीच मापी जाती है। कार्यालयों की नई वास्तुकला ईंट-पत्थर नहींबैंडविड्थ से बनती है। वर्क फ्रॉम होम ने काम घर तक पहुँचायापर अदृश्य दूरियाँ खड़ी कर दीं। कमरे पासमन दूर। शोध बताते हैं कि दूरस्थ कर्मचारी अधिक अकेलापन और मानसिक तनाव महसूस करते हैं। डिजिटल बैठकों में कैमरे बंदमाइक्रोफोन म्यूटउपस्थिति दर्जसहभागिता नहीं। कर्मचारी का मूल्य विचारों से अधिक ऑनलाइन सक्रियता से आँका जाता है। प्रमोशन चेहरों से नहींस्क्रीन पर दर्ज गतिविधियों से जुड़ने लगा है। कभी दफ्तर बातचीत से चलते थेआज वह काम के बीच बची है। तकनीक ने गति बढ़ाईपर सहयोग का ताप घटा दिया। कार्यस्थल संवाद नहींडिजिटल प्रक्रियाओं के केंद्र हैं।

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किसी लोकतंत्र का पतन तब नहीं शुरू होताजब लोग बोलना छोड़ देते हैंवह तब शुरू होता हैजब वे सुनना छोड़ देते हैं। जनचर्चा की चौपाल अब एल्गोरिदम के दरबार में बदल चुकी है। कभी राजनीति जनसभाओंबहसों और प्रत्यक्ष संवाद से चलती थीआज स्क्रीन पर सिमट गई है। सोशल मीडिया पर राजनीतिक सामग्री का उपभोग बढ़ रहा हैपर विचार की गहराई घट रही है। युवा समाचार रील्स में देखते हैंनारे शॉर्ट्स में सुनते हैं और आक्रोश इमोजी से जताते हैं। संवाद की जगह प्रतिक्रिया ने ले ली है—लाइकशेयरएंग्री फेस। सत्ता जनता की आँखों में कमट्रेंडिंग सूची में अधिक झाँकती है। जनता सड़क पर कमफीड में अधिक दिखती है। कुछ सेकंड के विमर्श में जटिल प्रश्न मनोरंजन बन जाते हैं। लोकतंत्र की आवाज़ म्यूट होती हैतो केवल चुनाव नहींनागरिकता भी कमजोर पड़ती है।

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मनुष्य की सबसे लंबी दूरी अब स्वयं से है। भावनाएँ अनुभव नहींनोटिफिकेशन बनती जा रही हैं। प्रेम स्टोरी में सिमट गया हैदोस्ती वर्चुअल समूहों में कैद है और अपनापन ऑनलाइन उपस्थिति से मापा जाता है। अध्ययन बताते हैं कि केवल आभासी संपर्क रखने वाले लोग मित्रताओं से कम संतुष्ट रहते हैं। विडंबना यह है कि संपर्क सूची बढ़ती जाती हैपर अकेलापन भी गहराता जाता है। स्क्रीन ने दुनिया से जोड़ापर स्वयं से दूर कर दिया। अब हम उपलब्धियों का मूल्य अनुभवों से नहींदूसरों की रील्स से तय करते हैं। निरंतर तुलना आत्मसम्मान को क्षीण करती है। चेहरे मुस्कुराते हैंप्रोफाइल चमकती हैंपर मन का एकांत और गहरा हो जाता है। भीड़ में जन्मा यही अकेलापन हमारे समय की नई सामाजिक बीमारी है।

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सभ्यताएँ एक दिन में नहीं बदलतींवे आदतों में बदलती हैं। पहले पत्रों की जगह संदेश आएफिर संदेशों की जगह इमोजी ने भावनाएँ ले लीं। बातचीत स्टेटस में सिमट गई और साथ होने की जगह ऑनलाइन दिखना पर्याप्त हो गया। हर सुविधा के साथ संवाद घटा। हर नई तकनीक ने समय बचायापर थोड़ा-सा मनुष्य भी छीन लिया। अब असहमति को समझाने से आसान उसे म्यूट करनादुःख बाँटने से आसान उसे छिपाना और प्रेम निभाने से आसान उसे पोस्ट करना है। सुविधा धीरे-धीरे संवेदना पर भारी पड़ गई। आधुनिक जीवन ने नियंत्रण दियापर मानवीय स्पर्श छीन लिया। यही इस युग का सबसे अदृश्य सौदा है।

सौभाग्य सेनिर्णय हमारे हाथ में है। परिवार फोन-फ्री डिनर का नियम बना सकते हैं। दफ्तर कैमरा-ऑन संवाद को औपचारिकता नहींसहभागिता बना सकते हैं। नागरिक सोशल मीडिया से निकलकर प्रत्यक्ष संवाद की संस्कृति जीवित कर सकते हैं। तकनीक शत्रु नहींविवेकहीन उपयोग संकट है। सुविधा के बदले संवेदना गिरवी रखी गईतो आने वाली पीढ़ियाँ ऐसे समय को याद करेंगीजब हर हाथ में स्मार्टफोन थापर किसी का हाथ थामने का समय नहीं। तब इंसानियत का 'लास्ट सीनहोगा—चलती उँगलियाँथकी आँखेंमौन होंठ। रील्स चलती रहेंगीजीवन ठहर जाएगा। इसलिए सबसे पहले रिश्तोंकार्यस्थलोंलोकतंत्र और भीतर का 'म्यूटहटाना होगा। भविष्य हमारे समय का मूल्य तकनीक नहींबचाए गए संवाद से तय करेगा।

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