पर्याप्त संसाधनों के बाद भी बाढ़ (अतिवृष्टि) और सूखे(अनावृष्टि) स्थिति हर वर्ष क्यों

आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल राहत सामग्री बाँटना नहीं है।

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भारत भौगोलिक तौर पर बड़ा विशाल का देश है। जहां एक ओर हमारे पास विश्वस्तरीय वैज्ञानिक संस्थान, मौसम पूर्वानुमान प्रणाली, उपग्रह तकनीक, विशाल प्रशासनिक तंत्र और आपदा प्रबंधन के लिए अलग मंत्रालय है, तो दूसरी ओर हर वर्ष भीषण गर्मी, सूखा, अतिवृष्टि और बाढ़ लाखों लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त कर देते हैं। जब संसाधनों की कमी नहीं है, तब तैयारी में कमी और इतनी जानमाल का नुकसान क्यों क्यों दिखाई देता है?

यह समस्या किसी एक शहर, राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और उत्तर भारत के अनेक हिस्से भीषण लू और सूखे से जूझते हैं, वहीं असम, बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, केरल तथा महानगरों में कुछ घंटों की बारिश भी बाढ़ का रूप ले लेती है। हाल के दिनों में हिमाचल प्रदेश में बादल फटने और अचानक आई बाढ़ ने सड़कें, पुल और गांवों को भारी नुकसान पहुँचाया। इसी समय देश के कई भागों में भीषण गर्मी और लू का प्रकोप भी देखने को मिला।

यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हमारी विकास नीति, प्रशासनिक तैयारी और दीर्घकालिक योजना की परीक्षा भी है जब मौसम विभाग कई दिन पहले भारी वर्षा, लू और चक्रवात की चेतावनी जारी करता रहता है, तब स्थानीय प्रशासन समय रहते पर्याप्त तैयारी में क्यों नहीं जुट पाता है? अक्सर राहत कार्य आपदा आने के बाद शुरू होते हैं। यदि पहले से जल निकासी की व्यवस्था, सुरक्षित आश्रय, पेयजल, चिकित्सा दल और आवश्यक सामग्री उपलब्ध करा दी जाए, तो जन-धन की हानि काफी कम की जा सकती है।

दूसरी बड़ी समस्या हमारी अनियोजित शहरीकरण की है। शहरों के तालाब, नाले और जलग्रहण क्षेत्र पाटकर भवन खड़े कर दिए गए। नदियों के प्राकृतिक मार्ग पर अतिक्रमण हुआ परिणामस्वरूप कुछ घंटों की तेज बारिश भी शहरों को जलमग्न कर देती है। दूसरी ओर वर्षा का वही पानी भूजल में नहीं समा पाता और कुछ ही महीनों बाद वही क्षेत्र जल संकट से जूझने लगता है। विडंबना यह है कि जिस पानी को बाढ़ के समय हम अभिशाप मानते हैं, उसी पानी की एक-एक बूंद के लिए गर्मियों में तरसते हैं। यदि बड़े पैमाने पर वर्षा जल संचयन, छोटे बाँध, तालाबों का पुनर्जीवन, चेक डैम और जल संरक्षण के कार्य निरंतर किए जाएँ तो बाढ़ का पानी भी भविष्य का अमृत बन सकता है।

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जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अब वर्षा कम दिनों में अधिक तीव्रता से होती है और गर्मी की अवधि अधिक लंबी तथा अधिक प्रचंड होती जा रही है। यही कारण है कि कभी तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है तो कहीं कुछ ही घंटों में महीनों जितनी वर्षा हो जाती है। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि चरम मौसम की घटनाएँ अब नई सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं।इसके बावजूद हमारी अधिकांश योजनाएँ अभी भी पुराने मौसम चक्र को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। शहरों की जल निकासी व्यवस्था दशकों पुरानी है, ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के कार्य पर्याप्त नहीं हैं और नदी तटों पर निर्माण आज भी जारी है।

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आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल राहत सामग्री बाँटना नहीं है। वास्तविक आपदा प्रबंधन वह है जिसमें आपदा आने से पहले जोखिम कम कर दिया जाए। विकसित देशों में पूर्व चेतावनी, सामुदायिक प्रशिक्षण, नियमित मॉक ड्रिल, आधुनिक संचार व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर त्वरित निर्णय प्रणाली पर विशेष बल दिया जाता है। भारत में भी इन व्यवस्थाओं को गाँव-गाँव और वार्ड स्तर तक पहुँचाने की आवश्यकता है। सरकारों की जवाबदेही जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही समाज की भी। जल स्रोतों को बचाना, वृक्षारोपण करना, प्लास्टिक और कचरे से नालियाँ न भरना, वर्षा जल संचयन अपनाना तथा स्थानीय जलाशयों का संरक्षण करना नागरिकों का भी कर्तव्य है। यदि समाज और शासन मिलकर कार्य करें, तभी स्थायी समाधान संभव है।

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विशेषज्ञ बार-बार यह भी कहते हैं कि हर जिले का अलग जलवायु अनुकूलन योजना तैयार होना चाहिए। जिन क्षेत्रों में सूखा अधिक पड़ता है वहाँ जल संरक्षण और सूखा-रोधी खेती को बढ़ावा मिले, जबकि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नदी प्रबंधन, तटबंधों का वैज्ञानिक रखरखाव, जल निकासी और सुरक्षित पुनर्वास की स्थायी व्यवस्था हो।हाल के वर्षों में यह भी स्पष्ट हुआ है कि केवल राहत कोष बढ़ाने से समस्या समाप्त नहीं होगी। आवश्यकता ऐसी विकास नीति की है जिसमें सड़क, पुल, भवन, कॉलोनियाँ और औद्योगिक क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को ध्यान में रखकर बनाए जाएँ। अस्पताल, विद्यालय, बिजली व्यवस्था और संचार तंत्र भी आपदा सहनशील होने चाहिए।

अंततः प्रश्न संसाधनों का नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, इच्छाशक्ति और प्रभावी क्रियान्वयन का है। यदि हम हर वर्ष बाढ़ और सूखे के बाद केवल नुकसान का आकलन करते रहेंगे, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और विकराल होगा। लेकिन यदि हम आज से जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक योजना, स्थानीय भागीदारी और पूर्व तैयारी को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना लें, तो आपदाओं की विभीषिका को काफी हद तक कम किया जा सकता है।प्रकृति हमें हर वर्ष चेतावनी दे रही है। अब निर्णय हमें करना है कि हम केवल राहत बाँटने वाला राष्ट्र बनना चाहते हैं या आपदाओं से पहले तैयारी करने वाला दूरदर्शी राष्ट्र। समय की यही सबसे बड़ी पुकार है।

संजीव ठाकुर

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