रिश्तों की नींव में दरार

जब विश्वास की जगह हिंसा ले लेती है, तब परिवार ही सबसे असुरक्षित हो जाता है

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हाल ही में आगरा में सामने आए उस हृदयविदारक मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया, जिसमें एक महिला पर अपने पति की हत्या कर शव को बाथरूम के फर्श के नीचे दफनाने का आरोप है। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं है, बल्कि हमारे समाज के बदलते मनोविज्ञान, पारिवारिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों में बढ़ती कटुता का गंभीर संकेत भी है। जिस घर को सुरक्षा, स्नेह और विश्वास का प्रतीक माना जाता है, वही यदि भय और हिंसा का केंद्र बन जाए तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है।
 
आज का समय अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति, आर्थिक अवसरों और आधुनिक जीवनशैली का दौर है, लेकिन दूसरी ओर मानवीय संवेदनाएं और रिश्तों की गर्माहट लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही हैं। पति-पत्नी का संबंध भारतीय संस्कृति में सबसे पवित्र और विश्वासपूर्ण माना गया है। यह रिश्ता केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और अनेक भावनाओं का संगम होता है। जब इसी रिश्ते में अविश्वास, क्रोध, स्वार्थ और हिंसा प्रवेश कर जाते हैं, तब उसका परिणाम केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की आत्मा को भी घायल करता है।
 
पिछले कुछ महीनों में देश के विभिन्न हिस्सों से पति या पत्नी द्वारा अपने जीवनसाथी की हत्या के कई मामले सामने आए हैं। कहीं अवैध संबंधों के कारण हत्या हुई, कहीं संपत्ति के विवाद ने रिश्ते खत्म कर दिए, तो कहीं लंबे समय से चले आ रहे घरेलू विवाद हिंसक रूप ले बैठे। इन घटनाओं ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि जिन लोगों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाईं, वे एक-दूसरे के प्राण लेने तक पहुंच रहे हैं।
 
यह भी सच है कि ऐसे अपराध समाज के अधिकांश परिवारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। देश में करोड़ों परिवार आज भी प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं। लेकिन जब इस प्रकार की घटनाएं बार-बार सामने आती हैं, तो वे समाज के सामने गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करती हैं। क्या हमारी सहनशीलता कम हो रही है? क्या संवाद की जगह आक्रोश ने ले ली है? क्या छोटी-छोटी बातों का समाधान बातचीत से निकालने की बजाय हिंसा को आसान रास्ता समझा जाने लगा है?
 
आधुनिक जीवन की भागदौड़, आर्थिक दबाव, बढ़ती अपेक्षाएं, मानसिक तनाव और सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने पारिवारिक जीवन को प्रभावित किया है। पति-पत्नी दोनों कामकाजी हों या एक ही व्यक्ति परिवार की जिम्मेदारी निभा रहा हो, हर स्थिति में मानसिक दबाव पहले की तुलना में कहीं अधिक है। यदि इन परिस्थितियों में संवाद समाप्त हो जाए, एक-दूसरे को समझने का प्रयास खत्म हो जाए और अहंकार रिश्तों पर हावी हो जाए, तो विवाद गहराते चले जाते हैं। ऐसे विवादों का समाधान कानून, परिवार, परामर्श या आपसी बातचीत से निकल सकता है, लेकिन हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती।
 
आगरा की घटना में जिस तरह शव को छिपाने का प्रयास किया गया, उसने लोगों को स्तब्ध कर दिया। यह घटना केवल हत्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके बाद किए गए कथित प्रयासों ने भी समाज को विचलित किया। ऐसे मामलों में कानून अपना कार्य करता है और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दोषी या निर्दोष का निर्णय होता है। इसलिए किसी भी आरोपी को अंतिम रूप से दोषी मानना न्यायालय के निर्णय के बाद ही उचित होता है। फिर भी ऐसी घटनाएं यह अवश्य बताती हैं कि अपराध की मानसिकता कितनी भयावह हो सकती है।
 
आज परिवारों में रिश्ते कभी-कभी सूत के धागे जैसे नाजुक प्रतीत होते हैं। छोटी-सी गलतफहमी, आर्थिक विवाद, संदेह या अहंकार वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ देता है। पहले परिवार के बड़े-बुजुर्ग विवादों को बैठकर सुलझाते थे। संयुक्त परिवारों में संवाद के अधिक अवसर होते थे। अब एकल परिवारों के बढ़ने, सामाजिक दूरी और व्यस्त जीवनशैली के कारण कई लोग अपनी मानसिक परेशानियां भीतर ही भीतर दबाए रहते हैं। जब भावनाएं लंबे समय तक दबती रहती हैं, तो कभी-कभी उनका विस्फोट अत्यंत दुखद रूप में सामने आता है।
 
यह भी आवश्यक है कि समाज किसी एक वर्ग या लिंग को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति से बचे। अपराध करने वाला व्यक्ति पुरुष भी हो सकता है और महिला भी। कानून की दृष्टि में अपराधी केवल अपराधी होता है। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर पूरे समाज, किसी पीढ़ी या किसी लिंग के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपराध के कारणों को समझें और उन्हें रोकने के उपाय खोजें।
 
आज मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। तनाव, अवसाद, गुस्सा और संबंधों में बढ़ती दूरी को समय रहते पहचानना और उनका समाधान करना अत्यंत आवश्यक है। यदि पति-पत्नी के बीच मतभेद हैं, तो परिवार, मित्र, विवाह परामर्शदाता या कानूनी प्रक्रिया की सहायता ली जा सकती है। अलग होना पड़े तो वह भी कानून के दायरे में और गरिमा के साथ होना चाहिए। तलाक एक वैधानिक प्रक्रिया है, जबकि हत्या मानवता और कानून—दोनों के विरुद्ध जघन्य अपराध है।
 
मीडिया और सोशल मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अपराधों की जानकारी समाज तक पहुंचाना आवश्यक है, लेकिन उनके सनसनीखेज चित्रण की बजाय यह भी बताया जाना चाहिए कि ऐसे अपराधों के पीछे कौन-से सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण काम करते हैं तथा उनसे बचाव कैसे किया जा सकता है। समाज को भय और सनसनी नहीं, बल्कि जागरूकता और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।
 
बच्चों और युवाओं को बचपन से ही संवाद, सहनशीलता, नैतिकता और सम्मानजनक व्यवहार की शिक्षा देना समय की मांग है। परिवार केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का आधार होता है। यदि घरों में प्रेम, विश्वास और धैर्य का वातावरण बनेगा, तो समाज भी अधिक सुरक्षित और संवेदनशील बनेगा।
 
हर दिन दर्ज होने वाले हत्या, मारपीट, अपहरण और अन्य गंभीर अपराध निश्चित रूप से चिंता पैदा करते हैं। लेकिन इन घटनाओं के बीच यह याद रखना भी जरूरी है कि समाज में आज भी असंख्य लोग ईमानदारी, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों के साथ जीवन जी रहे हैं। हमें उन्हीं सकारात्मक मूल्यों को मजबूत करना होगा, ताकि हिंसा की प्रवृत्ति को रोका जा सके।
 
रिश्ते विश्वास से बनते हैं और विश्वास टूटने पर सबसे बड़ी क्षति केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की होती है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित, संवेदनशील और संस्कारित वातावरण में जीवन जीएं, तो हमें संवाद, धैर्य, परस्पर सम्मान और नैतिक मूल्यों को फिर से अपने पारिवारिक जीवन का आधार बनाना होगा। यही वह मार्ग है जो समाज को हिंसा से दूर और मानवीयता के निकट ले जा सकता है।
 
कांतिलाल मांडोत

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