विश्व क्षमा दिवस आत्मशुद्धि और मानवता का अमृत पर्व

क्षमा से ही खिलता है जीवन का सच्चा सौंदर्य

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हर वर्ष 7 जुलाई को विश्व क्षमा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को पुराने मतभेदों, कटु स्मृतियों और वैरभाव को भुलाकर स्वयं तथा दूसरों को क्षमा करने के लिए प्रेरित करना है। वर्ष 1994 में कनाडा में क्राइस्ट्स एंबेसडर्स क्रिश्चियन एंबेसी द्वारा इस दिवस की शुरुआत की गई थी। आज यह दिन केवल किसी एक देश या समुदाय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया में शांति, प्रेम, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का संदेश देने वाला अवसर बन चुका है। आधुनिक जीवन की भागदौड़, तनाव, प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ के बीच क्षमा का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। यह केवल एक शब्द नहीं बल्कि जीवन को प्रकाशमान करने वाली ऐसी साधना है, जो व्यक्ति के भीतर के अंधकार को समाप्त कर देती है।
 
क्षमा का अर्थ केवल किसी से औपचारिक रूप से यह कह देना नहीं कि "मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ।" वास्तविक क्षमा हृदय की अनुभूति है। जब मन से क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध का भाव समाप्त हो जाता है, तभी सच्ची क्षमा जन्म लेती है। क्षमा अंतरात्मा का वह प्रकाश है जो मनुष्य को भीतर से निर्मल और शांत बनाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में क्षमा को धर्म, तप और महानता का प्रतीक माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि "क्षमा वीरस्य भूषणम्", अर्थात क्षमा वीरों का आभूषण है। जो स्वयं पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही वास्तव में दूसरों को क्षमा करने की क्षमता रखता है।
 
विश्व क्षमा दिवस का महत्व केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक स्वास्थ्य अध्ययनों में यह प्रमाणित हो चुका है कि क्षमा करने वाला व्यक्ति तनाव, चिंता और अवसाद से अपेक्षाकृत जल्दी मुक्त हो जाता है। जब मन में कटुता रहती है तो उसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। रक्तचाप बढ़ता है, नींद प्रभावित होती है और मन अशांत बना रहता है। इसके विपरीत क्षमा का भाव मानसिक शांति, सकारात्मक सोच और भावनात्मक संतुलन प्रदान करता है। इसलिए क्षमा केवल दूसरों के लिए नहीं बल्कि स्वयं के लिए भी सबसे बड़ा उपहार है।
 
भारतीय संस्कृति में क्षमा की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है। विशेष रूप से जैन धर्म में क्षमा को आत्मशुद्धि का सर्वोच्च साधन माना गया है। चातुर्मास के दौरान आने वाले पर्यूषण पर्व के समापन पर संवत्सरी महापर्व मनाया जाता है। इस दिन प्रत्येक जैन श्रद्धालु अपने द्वारा जाने-अनजाने में हुई सभी भूलों के लिए सभी प्राणियों से क्षमा याचना करता है। वह विनम्र भाव से कहता है— "मिच्छामि दुक्कडम्", अर्थात यदि मुझसे मन, वचन या कर्म से कोई भूल हुई हो तो मुझे क्षमा करें। इसी भावना को प्राकृत गाथा में व्यक्त किया गया है—
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा वि खमंतु में। मित्ति में सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणइ॥
इसका भावार्थ है कि मैं सभी जीवों से क्षमा मांगता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सभी प्राणियों के साथ मैत्रीभाव है और किसी के प्रति कोई वैर नहीं है। यह संदेश केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए शांति का सूत्र है।
 
क्षमा का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होता है जब हम केवल अपने प्रियजनों से ही नहीं बल्कि उन लोगों से भी क्षमा मांगें या उन्हें क्षमा करें जिनसे हमारे संबंधों में कटुता आ गई हो। अक्सर देखा जाता है कि लोग औपचारिक रूप से क्षमायाचना का संदेश भेज देते हैं, लेकिन मन में द्वेष बनाए रखते हैं। ऐसी क्षमा केवल शब्दों तक सीमित रहती है। सच्ची क्षमा वही है जो हृदय की गहराइयों से निकले और संबंधों में नई मधुरता का संचार करे। यदि हम अपने विरोधी के प्रति भी मैत्रीभाव रख सकें, तभी क्षमा का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।
 
जीवन में कषाय अर्थात क्रोध, मान, माया और लोभ ही अधिकांश दुखों का कारण बनते हैं। जैन आगमों में कहा गया है कि कषाय ही कर्मों का मूल कारण है। इसलिए मनुष्य को अपने भीतर उठने वाले क्रोध और अहंकार को शीघ्र समाप्त कर देना चाहिए। परिवार और समाज में अधिकांश विवाद छोटी-छोटी बातों से प्रारंभ होते हैं, लेकिन यदि समय रहते क्षमा और संवाद का मार्ग अपनाया जाए तो बड़े से बड़ा विवाद भी समाप्त हो सकता है। क्षमा संबंधों को जोड़ती है, जबकि अहंकार उन्हें तोड़ देता है।
 
इतिहास और धर्मग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ क्षमा ने असंभव प्रतीत होने वाली परिस्थितियों को भी बदल दिया। भगवान महावीर ने अपने विरोधियों के प्रति भी करुणा और क्षमा का भाव रखा। भगवान राम ने अपने धैर्य और विनम्रता से अनेक कठोर परिस्थितियों को सहज बना दिया। भगवान विष्णु ने भृगु ऋषि के पदाघात को भी सहजता से स्वीकार किया। भगवान बुद्ध ने अपमान और कटु वचनों का उत्तर भी शांत मुस्कान से दिया। महात्मा गांधी ने भी सत्य और अहिंसा के साथ क्षमा को अपने जीवन का आधार बनाया। इन सभी महापुरुषों ने सिद्ध किया कि क्षमा दुर्बलता नहीं बल्कि आत्मबल और आध्यात्मिक शक्ति का सर्वोच्च स्वरूप है।
 
आज का समाज अनेक प्रकार के तनाव, पारिवारिक विघटन, सामाजिक संघर्ष और मानसिक अशांति से जूझ रहा है। ऐसे समय में विश्व क्षमा दिवस हमें आत्मचिंतन का अवसर देता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन बहुत छोटा है। यदि हम क्रोध, ईर्ष्या और द्वेष को अपने भीतर स्थान देते रहेंगे तो सबसे अधिक नुकसान हमारा ही होगा। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने मन को शुद्ध करें, दूसरों की भूलों को क्षमा करें और अपनी भूलों के लिए विनम्रता से क्षमा मांगें। यही आत्मविकास का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग है।
 
विश्व क्षमा दिवस केवल एक तिथि नहीं बल्कि मानवता का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि प्रेम, करुणा, मैत्री और क्षमा ही स्थायी सुख के आधार हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में क्षमा का भाव विकसित कर ले तो परिवारों में प्रेम बढ़ेगा, समाज में सौहार्द स्थापित होगा और विश्व में शांति का वातावरण बनेगा। यही इस दिवस का वास्तविक संदेश है कि हम अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर प्रेम और सद्भाव के दीप जलाएँ।
 
आइए, इस विश्व क्षमा दिवस पर हम संकल्प लें कि किसी भी व्यक्ति के प्रति मन में वैरभाव नहीं रखेंगे। यदि हमसे किसी के प्रति कोई भूल हुई है तो विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगेंगे और जिसने हमें कष्ट पहुँचाया है, उसे भी खुले मन से क्षमा करेंगे। यही आत्मशुद्धि का मार्ग है, यही धर्म का सार है और यही मानव जीवन की सबसे बड़ी विजय है। सच ही कहा गया है—
प्रेम क्षमा सद्भाव का संवत्सर दिन खासआतप घटे कषाय का बढ़े धर्म की प्यास।
 
कांतिलाल मांडोत
 
 

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