स्वतंत्र प्रभात श्पेशल :  डिजिटल क्रांति के बीच मंडराया साइबर ठगी का साया

​डिजिटल भारत में बढ़ता साईबर फ्रॉड और उपभोक्ता अधिकारों का संकट

BIHAR SWATANTRA PRABHAT Picture
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बिहार में 43% बढ़ी साइबर अपराध की रफ्तार

​पटना ,स्वतंत प्रभात ब्यूरो ,एम पी रोशन 

भारत आज तेजी से 'डिजिटल इंडिया' की ओर कदम बढ़ा रहा है। यूपीआई , ऑनलाइन बैंकिंग, ई-कॉमर्स, रेलवे बुकिंग और डिजिटल वॉलेट ने आम नागरिकों की जिंदगी को  आसान बना दिया है। घर बैठे एक क्लिक पर पैसे ट्रांसफर करने से लेकर खरीदारी और सरकारी सेवाओं का लाभ  अब आम बात हो चुकी है। लेकिन, तकनीक की इस सुनहरी तस्वीर के पीछे एक डरावना सच भी छिपा है। डिजिटल सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ देश में साइबर फ्रॉड, ऑनलाइन स्कैम और उपभोक्ता शोषण के मामलों में भी काफी तेजी  आ गई है। तकनीक ने जहां आम जनता को सहूलियत दी है, वहीं अपराधियों को लोगों की जेब और बैंक खातों तक पहुंचने का नया और आसान जरिया थमा दिया है।

​मिनटों में साफ हो रही जीवनभर की गाढ़ी कमाई

कमोबेश ​आज स्थिति यह हो गई है कि  रोजाना सेकड़ो लोग ओटीपी फ्रॉड, यूपीआई स्कैम, फेक लोन ऐप्स, व्हाट्सएप हैकिंग, फर्जी कस्टमर केयर और अनधिकृत बैंकिंग लेनदेन  काधड़ल्ले से शिकार हो रहे हैं। शातिर साइबर अपराधी पलक झपकते ही लोगों की जीवनभर की जमा-पूंजी उड़ा रहे हैं।

​साइबर अपराधियों के रडार पर बिहार; सुपौल कनेक्शन से बढ़ी चिंता
​साइबर अपराध के मामले में बिहार अब देश के सबसे संवेदनशील राज्यों में शुमार हो गया है।  राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरोNCRB एनसीआरबी और विभिन्न हालिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2024 में बिहार में साइबर अपराध के मामलों में लगभग 43 प्रतिशत की चौंकाने वाली वृद्धि दर्ज की गई है। दर्ज होने वाले अधिकांश मामले आर्थिक धोखाधड़ी से जुड़े हैं।

सबसे ​चिंताजनक बात यह है कि अब बिहार के ग्रामीण और सीमावर्ती जिले भी इस नेटवर्क की चपेट में हैं। हाल के वर्षों में सुपौल जिला भी साइबर फ्रॉड और डिजिटल स्कैम की गतिविधियों के कारण सुर्खियों में रहा है। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) की जांच में कई ऐसे मामलों का खुलासा हुआ है, जिनके तार अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड सिंडिकेट से जुड़े थे और उनका कनेक्शन सुपौल क्षेत्र में पाया गया।

​क्यों आसान शिकार बन रहे हैं ग्रामीण इलाके?

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1 सुदूर गांवों तक मोबाइल और इंटरनेट की पहुंच।
   2 ​सीमित डिजिटल साक्षरता: लोग तकनीक का इस्तेमाल तो कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा मानकों से अनजान हैं।
3  ​बेरोजगारी: स्थानीय युवाओं का भटककर अपराधियों के झांसे में आना या खुद इस दलदल में शामिल होना।
  4 ​बुजुर्ग और छात्र निशाने पर: डिजिटल तकनीक की कम समझ रखने वाले बुजुर्ग और नौकरी-सस्ते लोन के चक्कर में छात्र आसानी से फंस रहे हैं।

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​कानूनी अधिकारों की  अनभिज्ञता बनी सबसे बड़ी कमजोरी

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सुरसा के मुँह की तरह बढ़ रहे ​इस संकट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि अधिकांश पीड़ितों को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी ही नहीं होती। जागरूकता की कमी के कारण लोग समय पर शिकायत दर्ज नहीं करा पाते, जिससे अपराधियों पर नकेल कसना और डूबे हुए पैसे की रिकवरी करना बेहद मुश्किल हो जाता है। साइबर फ्रॉड अब सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि पीड़ितों के लिए गहरा मानसिक और सामाजिक संकट बनता जा रहा है।

जानें अपनी कानूनी अधिकार

​देश का कानून डिजिटल लेनदेन में नागरिकों को मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करता है। 'इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट' 'उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम  और भारतीय रिजर्व बैंक  के दिशानिर्देश उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा करते हैं।

​हेल्पलाइन 1930 है रामबाण: यदि आप किसी ऑनलाइन फ्रॉड के शिकार होते हैं, तो तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें। समय पर (गोल्डन ऑवर में) शिकायत दर्ज होने से फ्रॉड की गई राशि फ्रीज होने और रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है।

​कंज्यूमर फोरम की शरण: ऑनलाइन शॉपिंग फ्रॉड, डिफेक्टिव प्रोडक्ट, भ्रामक विज्ञापन या सेवा में कमी होने पर उपभोक्ता आयोग  में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

​बैंकों की जवाबदेही: डिजिटल पेमेंट फेल होने या अनधिकृत ट्रांजैक्शन की स्थिति में यदि उपभोक्ता की गलती नहीं है, तो बैंक और सर्विस प्रोवाइडर हर्जाने के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। ​रेलवे व अन्य सेवाएं: रेलवे या अन्य ऑनलाइन सेवाओं में कन्फर्म टिकट होने के बावजूद सीट न मिलना या सेवा में गंभीर लापरवाही बरतने पर मुआवजे  का प्रावधान है।

कहते हैं कानून के जानकार

कानूनी जागरूकता , साइबर पीड़ितों को सही मार्गदर्शन देना और उपभोक्ता अधिकारों के लिए आवाज उठाना समाज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है। जब तक समाज कानूनी रूप से जागरूक नहीं होगा, तब तक इस डिजिटल महामारी पर लगाम लगाना नामुमकिन है।

-भास्कर सिंह ,अधिवक्ता
 पटना न्यायालय
​चुनौती बड़ी है, मिलकर लड़ना होगा
​आज आवश्यकता सिर्फ नए और कड़े कानून बनाने की नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति को जागरूक करने की है। सरकार, न्यायपालिका, पुलिस प्रशासन, बैंकिंग संस्थानों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को मिलकर एक ऐसा सुरक्षित इकोसिस्टम बनाना होगा, जहां तकनीकी विकास के साथ-साथ नागरिकों की सुरक्षा भी शत-प्रतिशत सुनिश्चित हो। यदि समय रहते देश और समाज इस खतरे के प्रति सचेत नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में साइबर फ्रॉड और उपभोक्ता शोषण भारत के सामने एक बहुत बड़ा सामाजिक और आर्थिक संकट बनकर खड़ा हो जाएगा।

​ ​बिहार में साइबर अपराध का बढ़ता जाल 

बिहार में साइबर अपराध की स्थिति (वर्ष 2024-25)                    
 • कुल दर्ज मामले: 5,624 मामले (सबसे अधिक ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े) 
 • कुल शिकायतें मिलीं: 11,764                              
 • निस्तारित मामले: 917 
 • फ्रीज की गई राशि: 106 करोड़ रुपये              |
• पीड़ितों को वापसी: 7.36 करोड़ रुपये  
अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क का भंडाफोड़]
  सुपौल बना अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी का केंद्र!                     
 • हॉटस्पॉट: सुपौल जिले के गनौड़ा और गौसपुर गांव।              
 • EOU की बड़ी कार्रवाई: आर्थिक अपराध इकाई ने 20 जुलाई 2025 को गौसपुर में हर्षित कुमार के घर  छापेमारी कर एक अवैध सिम बॉक्स  बरामद किया।सिम बॉक्स में 231 सक्रिय सिम कार्ड लगे हुए थे।  फर्जी सिम कार्डों के जरिए वीओआईपी (VoIP) कॉल्स को लोकल कॉल्स में बदला जाता था।                                        
| • कॉल डेटा: महज 3 दिनों (30 जून से 2 जुलाई 2025) के भीतर  51 हजार से अधिक स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कॉल्स की गईं। |
​[ग्लोबल सिंडिकेट: इन देशों से जुड़े हैं तार                        |
जांच एजेंसियों के अनुसार, बिहार के इस नेटवर्क के तार सीधे तौर पर वियतनाम, चीन और कंबोडिया जैसे देशों में सक्रिय साइबर ठगी गिरोहों से जुड़े हैं। यह राज्य में साइबर अपराध के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप और उससे निपटने की बड़ी चुनौती को रेखांकित करता है।

बोले अधिकारी
हाल के बर्षो में बढ़ते साइबर अपराध को रोकने के लिए राज्य के सभी जिलों में साइबर सेल थाना स्थापित किया गया है।जहाँ त्वरित कार्यवाही की जाती है।
शुशील कुमार,आईपीएस   अधीक्षक सह नोडल अधिकारी
साइबर सेल सह  आर्थिक अपराध इकाई ,पटना

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