सोनभद्र बिल्ली मारकुंडी में खनन प्रस्ताव पर सरकारी लोक सुनवाई, ग्रामीणों ने लगाया भारी धांधली का आरोप

ग्रामीणों ने लगाया संबंधित अधिकारियों पर खानापूर्ति करने का आरोप, सुनवाई महज दिखावा

अजित सिंह / राजेश तिवारी Picture
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ब्यूरो रिपोर्ट

ओबरा /सोनभद्र-

 खनन के लिए विख्यात सोनभद्र का बिल्ली मारकुंडी क्षेत्र एक बार फिर प्रशासनिक खींचतान का केंद्र बन गया है। शुक्रवार को प्राथमिक विद्यालय, कोटा टोला के परिसर में आयोजित लोक सुनवाई चर्चा के बजाय विवादों की भेंट चढ़ गई। स्थानीय ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर प्रक्रियाओं की महज़ खानापूर्ति और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के गंभीर आरोप लगाए हैं।

जनसुनवाई में मौजूद प्रदर्शनकारियों का सबसे बड़ा प्रहार अपर जिला अधिकारी (ADM) की कार्यप्रणाली पर रहा। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि सुनवाई का आयोजन केवल कागजों पर कोरम पूरा करने के लिए किया गया था। स्थानीय निवासी अभिषेक अग्रहरि का दावा है कि वास्तविक प्रभावित ग्रामीणों को दरकिनार कर, प्रशासन द्वारा कुछ खास लोगों को ही भीड़ के रूप में पेश किया गया, ताकि बिना किसी शोर-शराबे के प्रस्तावों को हरी झंडी मिल सके।

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आरोप है कि अधिकारियों ने पहले से तैयार दस्तावेजों पर चुनिंदा लोगों के हस्ताक्षर लेकर कार्यवाही को आनन-फानन में संपन्न कर दिया। नियमों के अनुसार, जनसुनवाई का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार निम्नलिखित ज्वलंत मुद्दों पर कोई बात नहीं हुई।खनन से उड़ती धूल और धमाकों का प्रभाव। भूजल स्तर में भारी गिरावट और स्वच्छ पानी की अनुपलब्धता।

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खनन क्षेत्र के पास मेडिकल कैंप और बुनियादी इलाज की कमी। जब हमें अपनी बात रखने का मौका ही नहीं दिया गया और सवाल पूछने पर अनसुना कर दिया गया, तो इसे लोक सुनवाई कैसे कहें? यह सीधे तौर पर हमारे स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा आयोजित इस सुनवाई में चार आवेदकों के पट्टों की पर्यावरणीय स्वीकृति पर चर्चा होनी थी।

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केशरी देवी (पत्नी हरिराम प्रसाद) मंजीत कुमार (पुत्र स्व. उपेन्द्र नाथ सिंह) चन्द्र शेखर (पुत्र स्व. पंचानन) बेबी गुप्ता (पत्नी कृष्णानन्द गुप्ता) ग्रामीणों ने अब इन चारों प्रस्तावों के लिए ली गई तथाकथित सहमति को सिरे से खारिज करते हुए इसे अवैध घोषित कर दिया है।

पर्यावरण नियमों के तहत, खनन की अनुमति तभी मिलती है जब आवेदक धूल और शोर नियंत्रण की आधुनिक तकनीक, सघन वृक्षारोपण और स्थानीय विकास का स्पष्ट खाका पेश करे। लेकिन कोटा टोला में हुई इस सुनवाई में जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों और नियमों से कोसों दूर नजर आई।

क्षेत्र के प्रभावित परिवारों ने इस पूरी प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है। ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है कि जब तक पारदर्शी और निष्पक्ष जनसुनवाई दोबारा आयोजित नहीं की जाती, तब तक इन खनन पट्टों को पर्यावरणीय स्वीकृति देना गैर-कानूनी और जनविरोधी कदम होगा।

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