किम सत्ता का उत्तराधिकार परिवार शक्ति और भविष्य की राजनीति

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उत्तर कोरिया की राजनीति एक बार फिर उत्तराधिकार के सवाल पर केंद्रित हो गई है। 42 वर्षीय नेता किम जोंग-उन की सेहत को लेकर समय-समय पर उठने वाले प्रश्नों और उनकी 13 वर्षीय बेटी किम जू-ऐ की बढ़ती सार्वजनिक उपस्थिति ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है। साथ ही उनकी छोटी बहन किम यो-जोंग भी सत्ता समीकरण में एक मजबूत दावेदार मानी जाती हैं। ऐसे में यह बहस तेज है कि यदि अचानक सत्ता परिवर्तन की स्थिति बनती है तो उत्तर कोरिया की बागडोर किसके हाथ में जाएगी।
 
उत्तर कोरिया में सत्ता हस्तांतरण की परंपरा कोई नई नहीं है। देश के संस्थापक किम इल-सुंग के बाद उनके पुत्र किम जोंग-इल और फिर उनसे आगे किम जोंग-उन ने नेतृत्व संभाला। इस वंशानुगत व्यवस्था ने कम्युनिस्ट ढांचे के भीतर भी एक राजवंशीय मॉडल स्थापित कर दिया। इसलिए जब किम जोंग-उन अपनी बेटी को सैन्य परेडों और रणनीतिक कार्यक्रमों में साथ लाने लगे तो इसे एक प्रतीकात्मक संदेश के रूप में देखा गया।
 
किम जू-ऐ पहली बार 2022 में अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण के दौरान सार्वजनिक रूप से सामने आई थीं। इसके बाद वह कई महत्वपूर्ण सैन्य और राजनीतिक आयोजनों में दिखाई दीं। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी कम उम्र में इस तरह की मौजूदगी केवल पारिवारिक प्रदर्शन नहीं बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक संकेत हो सकता है। हालांकि उनकी उम्र और अनुभव को देखते हुए तत्काल नेतृत्व संभालना व्यावहारिक रूप से कठिन माना जाता है।
 
दूसरी ओर किम यो-जोंग लंबे समय से सत्ता के केंद्र में सक्रिय हैं। वे कोरियाई वर्कर्स पार्टी के संगठन और मार्गदर्शन विभाग में प्रभावशाली भूमिका निभा चुकी हैं और देश की नीतिगत घोषणाओं में प्रमुख चेहरा रही हैं। 2018 के शीतकालीन ओलंपिक के दौरान दक्षिण कोरिया में उनकी उपस्थिति और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ शिखर कूटनीति की पृष्ठभूमि में उनकी भूमिका ने उनकी राजनीतिक हैसियत को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। उन्हें अक्सर अपने भाई की रणनीतिक सलाहकार और छवि प्रबंधक के रूप में देखा जाता है।
 
दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसी ने संकेत दिया है कि यदि तत्काल सत्ता खाली होती है तो सबसे तैयार चेहरा किम यो-जोंग हो सकती हैं। उनकी उम्र अनुभव और पार्टी तथा सेना पर पकड़ उन्हें स्वाभाविक दावेदार बनाती है। विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर कोरिया की सत्ता संरचना अत्यंत केंद्रीकृत है और शीर्ष नेता के इर्द-गिर्द ही निर्णय प्रक्रिया चलती है। ऐसे में सत्ता संघर्ष की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
 
उत्तर कोरिया की राजनीतिक प्रणाली में परिवार की भूमिका सर्वोपरि रही है। सत्ता केवल प्रशासनिक नियंत्रण नहीं बल्कि वैचारिक प्रतीक भी है। किम परिवार को राष्ट्र की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी कारण उत्तराधिकार का प्रश्न केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि शासन की स्थिरता से भी जुड़ा है। यदि बेटी को भविष्य के नेता के रूप में तैयार किया जाता है तो संभव है कि प्रारंभिक वर्षों में एक सामूहिक नेतृत्व मॉडल अपनाया जाए जिसमें किम यो-जोंग जैसी वरिष्ठ हस्तियां मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं।
 
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ भी इस बहस को प्रभावित करता है। 2018 में सिंगापुर और हनोई में हुई शिखर वार्ताओं ने उत्तर कोरिया और अमेरिका के रिश्तों में नई दिशा दी थी। ट्रम्प और किम जोंग-उन की मुलाकातों ने दशकों पुराने तनाव को कुछ हद तक कम किया। हालांकि परमाणु निरस्त्रीकरण पर ठोस प्रगति नहीं हुई, फिर भी संवाद की राह खुली। कोविड-19 महामारी के बाद उत्तर कोरिया ने अपनी सीमाएं लगभग बंद कर लीं जिससे देश और अधिक अलग-थलग हो गया।
 
अमेरिका में प्रशासन परिवर्तन के बाद संबंधों में उतार-चढ़ाव आया। लेकिन क्षेत्रीय भू-राजनीति विशेषकर चीन और रूस के साथ उत्तर कोरिया की निकटता ने उसे कूटनीतिक संतुलन बनाने का अवसर दिया। यदि भविष्य में किम जू-ऐ नेतृत्व संभालती हैं तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे सैन्य सख्ती और आर्थिक सुधारों के बीच संतुलन स्थापित करें। वहीं यदि किम यो-जोंग सत्ता में आती हैं तो संभव है कि वर्तमान नीतियों की निरंतरता अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
 
किम जोंग-उन की सेहत को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में समय-समय पर अटकलें लगती रही हैं। उनका बढ़ता वजन और जीवनशैली संबंधी खबरें चर्चा का विषय बनती हैं, हालांकि प्योंगयांग से आधिकारिक जानकारी बहुत सीमित आती है। उनके पिता किम जोंग-इल की मृत्यु भी दिल का दौरा पड़ने से हुई थी, इसलिए स्वास्थ्य संबंधी चर्चाएं राजनीतिक विश्लेषण से जुड़ जाती हैं।
 
उत्तराधिकार का प्रश्न केवल उत्तर कोरिया की आंतरिक राजनीति का विषय नहीं है। यह पूर्वी एशिया की सुरक्षा संरचना और वैश्विक शक्ति संतुलन से भी जुड़ा है। दक्षिण कोरिया, जापान, चीन और अमेरिका सभी इस संभावित परिवर्तन पर नजर रखे हुए हैं। पांच वर्षीय पार्टी सम्मेलन जैसे बड़े राजनीतिक आयोजनों में यदि किम जू-ऐ को औपचारिक भूमिका मिलती है तो यह स्पष्ट संकेत होगा कि दीर्घकालिक तैयारी शुरू हो चुकी है।
 
इतिहास बताता है कि उत्तर कोरिया में सत्ता परिवर्तन अचानक कम और योजनाबद्ध अधिक रहा है। किम जोंग-उन को भी अपने पिता के जीवनकाल में ही उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित किया गया था। इसलिए यदि वे अपनी बेटी को आगे लाना चाहते हैं तो आने वाले वर्षों में उनके सार्वजनिक कद और राजनीतिक जिम्मेदारियों में क्रमिक वृद्धि देखी जा सकती है।
 
फिलहाल स्थिति यह संकेत देती है कि तात्कालिक परिदृश्य में किम यो-जोंग सबसे सक्षम विकल्प हैं, जबकि दीर्घकाल में किम जू-ऐ को एक प्रतीकात्मक और संभावित उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया जा रहा है। उत्तर कोरिया की बंद राजनीतिक व्यवस्था में अंतिम निर्णय केवल शीर्ष नेतृत्व के हाथ में होता है। इसलिए दुनिया की निगाहें प्योंगयांग पर टिकी रहेंगी कि किम परिवार की अगली पीढ़ी सत्ता की इस विरासत को किस दिशा में ले जाती है।
 
कांतिलाल मांडोत

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