अमेरिकी करों का बदलता स्वरूप और भारत की रणनीति

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

महेन्द्र तिवारी

 

ट्रंप प्रशासन द्वारा वैश्विक आयात पर लगाए गए नए करों ने अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जगत में एक अभूतपूर्व हलचल पैदा कर दी है। वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में अमेरिकी शासन और न्यायपालिका के बीच जो खींचतान देखने को मिली है, उसने भारत जैसे बड़े व्यापारिक साझेदारों के लिए अनिश्चितता और अवसर दोनों की स्थिति उत्पन्न की है। 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति द्वारा पूर्व में लगाए गए कुछ विशेष शुल्कों को अवैध ठहराते हुए यह स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम के तहत दी गई शक्तियों का असीमित उपयोग नहीं किया जा सकता। इस न्यायिक निर्णय ने भारत के लिए कुछ समय के लिए राहत की स्थिति उत्पन्न की थी क्योंकि इससे पारस्परिक करों की दर जो अठारह से पच्चीस प्रतिशत तक जा सकती थी, वह घटकर न्यूनतम व्यापारिक दरों पर आने की संभावना बन गई थी। किंतु इसके तुरंत बाद अमेरिकी नेतृत्व ने व्यापार अधिनियम 1974 की धारा 122 का प्रयोग करते हुए वैश्विक स्तर पर पहले दस प्रतिशत और फिर पंद्रह प्रतिशत के नए शुल्कों की घोषणा कर दी। यह नए शुल्क 150 दिनों की अवधि के लिए लागू किए गए हैं, जिसका मुख्य आधार भुगतान संतुलन की समस्या को बताया गया है।

भारत के दृष्टिकोण से देखें तो अमेरिका उसका सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है, जहाँ वह प्रतिवर्ष लगभग अठारह प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ अठहत्तर अरब डॉलर से अधिक का माल भेजता है। अमेरिकी प्रशासन का यह तर्क कि अन्य देश दशकों से उनका शोषण कर रहे हैं और व्यापार घाटे को कम करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है, भारत के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करता है। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने इन परिस्थितियों का सूक्ष्मता से आकलन करना आरंभ कर दिया है। 25 फरवरी 2026 से प्रभावी होने वाले इन पंद्रह प्रतिशत के शुल्कों का सीधा प्रहार भारत के औषधीय निर्माण, वस्त्र उद्योग और अभियांत्रिकी वस्तुओं पर पड़ेगा। भारतीय औषधीय क्षेत्र का लगभग बीस प्रतिशत निर्यात केवल अमेरिका को होता है, जो अब महंगा हो जाएगा। इसी प्रकार वस्त्र उद्योग में दस प्रतिशत की हिस्सेदारी और अभियांत्रिकी वस्तुओं की व्यापक पहुंच पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अमेरिकी वित्त विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि यद्यपि यह कदम वर्तमान में अस्थायी हैं, परंतु आने वाले समय में राष्ट्रीय सुरक्षा और अनुचित व्यापार प्रथाओं से संबंधित अन्य धाराओं के अंतर्गत इन्हें स्थायी रूप से भी लागू किया जा सकता है।

माँ काली के भक्त से परमहंस तक का सफर Read More माँ काली के भक्त से परमहंस तक का सफर

भारत की प्रतिक्रिया इस पूरे विवाद में बहुत ही संतुलित और परिपक्व रही है। भारत सरकार ने नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था पर जोर देते हुए यह स्पष्ट किया है कि वह बातचीत के माध्यम से समाधान निकालने की पक्षधर है। 7 फरवरी 2026 को जारी किए गए संयुक्त वक्तव्य में भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा बदलाव करते हुए रूस से कच्चा तेल खरीदने की मात्रा कम करने और उसके बदले अमेरिका से ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी और कोयले की खरीद बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। यह अनुमान लगाया गया है कि भारत आने वाले समय में अमेरिका से लगभग पांच सौ अरब डॉलर की खरीद कर सकता है, जो दोनों देशों के बीच व्यापारिक संतुलन को बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध होगा। भारत का मानना है कि यदि द्विपक्षीय व्यापार समझौता सफलतापूर्वक संपन्न होता है, तो वह इन अतिरिक्त शुल्कों से मुक्ति पा सकता है। भारतीय संघ बजट 2026 में भी इस दिशा में दूरदर्शिता दिखाई गई है, जहाँ निर्यातकों को राहत देने के लिए सीमा शुल्क में कटौती की गई है। व्यक्तिगत आयात पर करों को बीस प्रतिशत से घटाकर दस प्रतिशत करना इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि घरेलू विनिर्माण को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जा सके।

प्रगतिशील ज्ञान और शिक्षा राष्ट्र के उत्थान की बुनियाद Read More प्रगतिशील ज्ञान और शिक्षा राष्ट्र के उत्थान की बुनियाद

भारत की आगामी रणनीति बहुआयामी होनी चाहिए ताकि अमेरिकी बाजार पर उसकी निर्भरता कम हो और वह एक स्वावलंबी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर सके। सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ निर्यात का विविधीकरण है। भारत को अब केवल अमेरिका पर केंद्रित न रहकर यूरोपीय संघ, दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के संगठन और अफ्रीकी महाद्वीप के उभरते बाजारों की ओर देखना होगा। उन देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर पुनः विचार करना आवश्यक है जहाँ भारतीय वस्तुओं की मांग बढ़ सकती है। दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष घरेलू विनिर्माण क्षमता को सुदृढ़ करना है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से भारत ने पहले ही स्मार्टफोन और विद्युत चालित वाहनों के क्षेत्र में सफलता प्राप्त की है, जिसे अब अन्य क्षेत्रों में भी दोहराने की आवश्यकता है। मूल्य संवर्धन की श्रृंखला में ऊपर की ओर बढ़ना भारत के लिए अनिवार्य है ताकि वह केवल कच्चे माल का निर्यातक न रहकर उच्च तकनीक वाली वस्तुओं का निर्माता बने।

जगमगाते महानगरों के भीतर पनपती खामोश महामारी Read More जगमगाते महानगरों के भीतर पनपती खामोश महामारी

इस व्यापारिक विवाद ने 'मित्र-तटीयकरण' की अवधारणा को भी जन्म दिया है, जिसका अर्थ है कि अमेरिकी कंपनियां चीन जैसे देशों से अपना उत्पादन हटाकर भारत जैसे मित्र राष्ट्रों में स्थानांतरित करें। यह लंबी अवधि में भारत के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। यदि अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश करती हैं और यहाँ से वैश्विक आपूर्ति सुनिश्चित करती हैं, तो टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, भारत को विश्व व्यापार संगठन जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भी अपनी आवाज बुलंद रखनी होगी। यदि अमेरिकी प्रशासन धारा 122 का दुरुपयोग करता है, तो भारत को अन्य प्रभावित राष्ट्रों के साथ मिलकर एक सामूहिक मोर्चा बनाना चाहिए। जी-20 और क्वाड जैसे समूह भी इस दिशा में कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। जवाबी कर लगाना एक अंतिम विकल्प होना चाहिए, क्योंकि इससे व्यापार युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होगी, जैसा कि हमने 2018 में देखा था।

डिजिटल सेवाओं और सॉफ्टवेयर निर्यात के क्षेत्र में भारत की स्थिति अधिक सुरक्षित है क्योंकि ये क्षेत्र भौतिक वस्तुओं पर लगने वाले सीमा शुल्कों से कम प्रभावित होते हैं। भारत को अपनी इस शक्ति का लाभ उठाना चाहिए। साथ ही, निर्यातकों के लिए बीमा योजनाओं और धन वापसी की प्रक्रियाओं को सरल बनाना होगा ताकि उनकी कार्यशील पूंजी अवरुद्ध न हो। अमेरिकी न्यायालय के निर्णय ने यह सिद्ध कर दिया है कि वहां की लोकतांत्रिक संस्थाएं राष्ट्रपति की शक्तियों पर अंकुश लगा सकती हैं, और भारत को अपनी कानूनी दलीलों और कूटनीतिक वार्ताओं में इस पक्ष का लाभ उठाना चाहिए। 150 दिनों की समय सीमा भारत के लिए एक अवसर की खिड़की है जिसमें वह अपनी मोलभाव करने की शक्ति का प्रदर्शन कर सकता है। प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच होने वाली उच्च स्तरीय वार्ताएं इस गतिरोध को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

अंततः, ट्रंप प्रशासन की आक्रामक व्यापारिक नीतियां भारत को अपनी आर्थिक नीतियों के पुनर्मूल्यांकन का संदेश दे रही हैं। यह विवाद न केवल एक चुनौती है, बल्कि भारत के लिए अपनी विनिर्माण शक्ति को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने का एक संकेत भी है। यदि भारत चतुराई और दृढ़ता के साथ अपनी रणनीति पर चलता है, तो वह इस संकट को एक ऐसे अवसर में बदल सकता है जहाँ उसकी अर्थव्यवस्था और अधिक लचीली, विविध और स्वतंत्र होकर उभरेगी। वैश्विक व्यापार के इस संक्रमण काल में भारत की भूमिका एक तटस्थ और नियम-पालक राष्ट्र की होनी चाहिए जो अपने हितों की रक्षा के साथ-साथ वैश्विक आर्थिक स्थिरता का भी सम्मान करे। संतुलित मार्ग ही वह एकमात्र रास्ता है जो भारत को एक विकसित राष्ट्र की ओर ले जाएगा और उसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का एक विश्वसनीय केंद्र बनाएगा।

About The Author

Post Comments

Comments

संबंधित खबरें