चाय की प्याली से सेवा का संकल्प आठ दोस्तों ने रचा गो सेवा का अद्भुत इतिहास

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राजस्थान की धरती पर सेवा, त्याग और श्रद्धा की कहानियाँ नई नहीं हैं, लेकिन कोटा जिले के सांगोद कस्बे से निकली यह कथा अपने आप में एक अनोखी मिसाल है। यह कहानी किसी बड़े उद्योगपति या सरकारी अनुदान से शुरू नहीं होती, बल्कि एक साधारण सी चाय की प्याली से जन्म लेती है। कोरोना महामारी के कठिन समय में जब दुनिया अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी, तब आठ मित्रों ने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने न केवल उनकी सोच बदली, बल्कि सैकड़ों निराश्रित और घायल गोवंशों के जीवन को भी नई दिशा दे दी।
 
यह आठ मित्र प्रतिदिन शाम को एक चाय की दुकान पर मिलते थे। रोज की 80 रुपए की चाय उनके लिए केवल पेय नहीं, बल्कि आपसी संवाद और मित्रता का माध्यम थी। महामारी के बाद जब जीवन धीरे-धीरे सामान्य होने लगा, तब उन्होंने तय किया कि अब यह 80 रुपए केवल चाय पर खर्च नहीं होंगे। उन्होंने सोचा कि क्यों न इन पैसों को किसी सार्थक कार्य में लगाया जाए। यही छोटा-सा संकल्प आगे चलकर “कृष्ण दरबार गो सेवा संस्थान” के रूप में साकार हुआ।
 
भारत में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। धार्मिक, सांस्कृतिक और कृषि जीवन में उसका विशेष महत्व रहा है। किंतु आधुनिक जीवन की आपाधापी में अक्सर सड़क किनारे घायल, बीमार और असहाय गोवंश देखने को मिल जाते हैं। कई स्थानों पर गोशालाएँ अवश्य हैं, लेकिन संसाधनों और सेवा की कमी के कारण हर पशु तक समय पर सहायता नहीं पहुँच पाती। ऐसे में सांगोद के इन मित्रों ने यह महसूस किया कि सेवा का वास्तविक अर्थ केवल भावनात्मक जुड़ाव नहीं, बल्कि ठोस व्यवस्था खड़ी करना है।
 
शुरुआत में उन्होंने चाय छोड़कर बचाए गए पैसों से जरूरतमंद लोगों की सहायता की। धीरे-धीरे उनके इस प्रयास से अन्य लोग भी जुड़ते गए। कोई 10 रुपये देता, कोई 20, कोई 50 और कभी-कभी 100 रुपये भी। छोटी-छोटी राशियाँ मिलकर हजारों में बदलने लगीं। यह केवल धन संग्रह नहीं था, बल्कि समाज की आस्था और विश्वास का संगम था।इसी विश्वास की नींव पर गोवंशों के लिए एक अस्पताल की स्थापना का विचार जन्मा। आज “कृष्ण दरबार गो सेवा संस्थान” केवल एक गोशाला नहीं, बल्कि आधुनिक सुविधाओं से युक्त एक सेवा केंद्र बन चुका है।
 
यहाँ आईसीयू और जनरल वार्ड की व्यवस्था है। जब कोई घायल या गंभीर रूप से बीमार गाय लाई जाती है तो उसे पहले आईसीयू में रखा जाता है, जहाँ उसकी विशेष देखभाल की जाती है। स्थिति सुधरने पर उसे जनरल वार्ड में स्थानांतरित कर दिया जाता है। साफ-सुथरे शेड, हरा-भरा चारा और प्रशिक्षित वेटरनरी डॉक्टरों की टीम इस सेवा को व्यवस्थित और प्रभावी बनाती है।इस संस्थान की सबसे बड़ी विशेषता है यहाँ कार्यरत लोगों का समर्पण। सात दिनों के लिए सात इंचार्ज नियुक्त किए गए हैं और 22 सहायक दिन-रात ड्यूटी देते हैं। यह पूरी सेवा निशुल्क है। रात के दो बजे भी यदि सूचना मिलती है कि कहीं कोई गाय घायल अवस्था में पड़ी है, तो तुरंत वाहन रवाना हो जाता है। स्वस्थ होने के बाद गोवंश को नगर पालिका की गोशाला में भेज दिया जाता है, जिससे उसकी आगे की देखभाल सुनिश्चित हो सके।
 
स्थानीय लोग इस स्थान को “जीवंत माता का मंदिर” कहते हैं। वास्तव में यह केवल अस्पताल नहीं, बल्कि करुणा और संवेदना का जीवंत उदाहरण है। यहाँ सेवा किसी दिखावे या प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि आंतरिक आस्था का परिणाम है। यह संदेश देता है कि यदि संकल्प सच्चा हो तो सीमित साधनों से भी असंभव प्रतीत होने वाले कार्य पूरे किए जा सकते हैं।
आज देश में गोशालाओं के निर्माण पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। गाय के नाम पर चंदा भी जुटाया जाता है। किंतु कई बार व्यवस्थाएँ अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पातीं। ऐसे समय में सांगोद के इन मित्रों का प्रयास यह सिद्ध करता है कि परिवर्तन केवल बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि बड़े हृदय से आता है। उन्होंने यह दिखाया कि चाय पर होने वाली चर्चा यदि सेवा के संकल्प में बदल जाए तो हजारों रुपये की बचत समाज के कल्याण में लग सकती है।
 
यह कहानी युवाओं के लिए विशेष प्रेरणा है। अक्सर यह कहा जाता है कि बड़े कार्य करने के लिए बड़ी पूँजी चाहिए। परंतु यहाँ पूँजी से अधिक महत्त्वपूर्ण था उद्देश्य। आठ मित्रों का छोटा-सा त्याग एक आंदोलन में बदल गया। उन्होंने यह साबित किया कि सामाजिक परिवर्तन का मार्ग किसी सरकारी योजना से ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत संकल्प से भी प्रशस्त हो सकता है।कोटा और सांगोद क्षेत्र में यह संस्थान अब आशा का प्रतीक बन चुका है। घायल गोवंशों को नया जीवन मिल रहा है और समाज में सेवा की भावना प्रबल हो रही है। यह पहल बताती है कि यदि हर व्यक्ति अपने दैनिक जीवन से थोड़ी-सी राशि बचाकर किसी सामाजिक उद्देश्य में लगाए, तो कितने ही अस्पताल, विद्यालय और आश्रय स्थल खड़े किए जा सकते हैं।
 
चाय की प्याली छोड़ने का यह निर्णय केवल आर्थिक बचत नहीं था, बल्कि आत्मानुशासन और त्याग का अभ्यास भी था। यह संदेश देता है कि छोटी-सी आदत में परिवर्तन भी बड़े सामाजिक बदलाव का कारण बन सकता है।सांगोद के इन आठ मित्रों ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची सेवा वही है जो बिना किसी अपेक्षा के की जाए। उनका यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक है। यह कहानी हमें सोचने पर विवश करती है कि हम अपने दैनिक जीवन में कौन-सा छोटा त्याग कर सकते हैं, जो समाज के लिए बड़ा योगदान बन सके।
 
अंततः यह केवल गोवंशों के उपचार की कथा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की विजय गाथा है। चाय की एक प्याली से शुरू हुआ यह सफर आज सैकड़ों जीवनों को बचाने का माध्यम बन चुका है। यही वह प्रेरणा है, जो किसी भी गोशाला या सेवा संस्थान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकती है और समाज को यह सिखा सकती है कि सच्ची श्रद्धा कर्म से सिद्ध होती है, शब्दों से नहीं।
 
कांतिलाल मांडोत

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