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वैलेंटाइन: प्रदर्शन बनाम आत्मिक संवेदना
वर्तमान समय में वैलेंटाइन दिवस भारतीय समाज में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि विमर्श और विवाद का एक द्वंद्व बन चुका है। प्रतिवर्ष फरवरी के इस पखवाड़े में प्रेम की चर्चा जितनी तीव्र होती है, उसका विरोध भी उतना ही मुखर होता है। किंतु इस शोर के बीच हम अक्सर उस मूल प्रश्न को भूल जाते हैं कि प्रेम का वास्तविक स्वरूप क्या है? क्या यह केवल सार्वजनिक प्रदर्शन और उपहारों के आदान-प्रदान तक सीमित है, अथवा यह एक गहरी आत्मिक संवेदना है जिसे आज के बाजारवाद ने जकड़ लिया है?
भाषाई दृष्टि से देखें तो 'वैलेंटाइन' शब्द लैटिन के 'वेलनटिनस' से उपजा है, जिसका अर्थ है-शक्तिशाली, साहसी और दृढ़ हृदय वाला। यह परिभाषा प्रेम के उस प्रचलित स्वरूप को चुनौती देती है जिसे हम आज केवल कोमल भावनाओं या क्षणिक आकर्षण के रूप में देखते हैं। ऐतिहासिक रूप से संत वैलेंटाइन ने दमनकारी सत्ता के विरुद्ध खड़े होकर मानवीय संबंधों की गरिमा की रक्षा की थी। अतः वैलेंटाइन का मूल भाव दुर्बल भावुकता नहीं,
बल्कि वह आत्मिक शक्ति है जो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस प्रदान करती है।
आज वैलेंटाइन का अर्थ बदलकर गुलाब, महँगे उपहार और सोशल मीडिया तथा सार्वजनिक स्थानों पर किए जाने वाले प्रदर्शन तक सिमट गया है। बाजार ने इस मानवीय संवेदना को एक 'उत्पाद' में बदल दिया है। जब प्रेम का पैमाना 'उपभोग' बन जाता है, तब उसकी पवित्रता का क्षरण निश्चित है। आज की युवा पीढ़ी जिसे प्रेम समझ रही है, वह अक्सर केवल बाह्य आकर्षण और सार्वजनिक प्रदर्शन की होड़ है। यही वह बिंदु है जहाँ सांस्कृतिक विरोध के स्वर जन्म लेते हैं। विरोध प्रेम का नहीं, बल्कि उसके उस विकृत और बाजारी स्वरूप का है जो मर्यादाओं की सीमा लांघता प्रतीत होता है।
भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में प्रेम कोई नई या आयातित अवधारणा नहीं है। हमारे यहाँ प्रेम को 'काम' से ऊपर उठाकर 'राम' तक ले जाने की परंपरा रही है। जहाँ पश्चिमी बाजारवाद प्रेम को 'अधिकार' की तरह देखता है, वहीं भारतीय मनीषा इसे 'कर्तव्य' और 'त्याग' के रूप में परिभाषित करती है। राम-सीता का संबंध केवल दांपत्य नहीं, बल्कि लोक-मर्यादा की स्थापना है। कृष्ण का प्रेम वात्सल्य, सखा-भाव और अटूट श्रद्धा का विस्तार है। बुद्ध की करुणा और कबीर की प्रेम-साधना यह बताती है कि प्रेम जब परिपक्व होता है, तो वह केवल दो व्यक्तियों तक सीमित न रहकर संपूर्ण सृष्टि के लिए 'संवेदना' बन जाता है।
समस्या वैलेंटाइन दिवस मनाने में नहीं, बल्कि उसे मनाने के 'तरीके' और 'दृष्टिकोण' में है। यदि हमारे संबंधों में एक-दूसरे के प्रति सम्मान, संवाद में शालीनता और व्यवहार में मर्यादा है, तो वह प्रेम वंदनीय है। किंतु यदि यह केवल एक दिन का दिखावा, प्रदर्शन है और शेष वर्ष उपेक्षा है, तो यह प्रेम के मूल विचार के साथ छल है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम 'प्रदर्शन' की चकाचौंध से बाहर निकलकर 'संवेदना' के धरातल पर लौटें। प्रेम को 'वस्तु' मानने के बजाय उसे 'मूल्य' के रूप में स्वीकार करें।
वैलेंटाइन दिवस को न तो अंध-विरोध की कसौटी पर कसना चाहिए और न ही इसके वैश्विक बाजारीकरण में बह जाना चाहिए। यह आत्ममंथन का अवसर है कि क्या हम अपने संबंधों में उस 'वेलनटिनस' अर्थात् साहस और दृढ़ता को समाहित कर पा रहे हैं? जिस दिन हमारे आचरण में मर्यादा और हृदय में निस्वार्थ करुणा का वास होगा, उस दिन कैलेंडर की हर तारीख 'प्रेम पर्व' बन जाएगी। प्रेम जब प्रदर्शन की बेड़ियाँ तोड़कर आत्मिक संवेदना का मार्ग अपनाता है, तभी वह शाश्वत होता है।

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