पेट्रोल में एथेनॉल: सस्ते ईंधन का सपना या गाड़ियों के लिए खतरा? लोगों में बढ़ता डर

एथेनॉल क्यों बढ़ाया जा रहा है? आर्थिक कारण - भारत हर साल 85% कच्चा तेल आयात करता है। 2024 में इस पर $180 बिलियन खर्च हुए। ई-20 से हर साल 4-5 बिलियन डॉलर की बचत का अनुमान है।

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राजीव शुक्ल-संपादक 

कानपुर। 2020 से सरकार ने E20 यानी 20% एथेनॉल वाला पेट्रोल पूरे देश में लागू करने का लक्ष्य रखा है। 2025 तक ज्यादातर शहरों में यही पेट्रोल मिल रहा है। मकसद साफ है: तेल आयात कम करना, किसानों को फायदा पहुंचाना और प्रदूषण घटाना। लेकिन सड़कों पर एक अलग बहस चल रही है - "क्या एथेनॉल मेरी गाड़ी का इंजन खराब कर देगा?" अभी तक ईरान - इजरायल युद्ध से पहले पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिला कर बेचा जा रहा था।

एक्सपर्ट बताते हैं कि दस फीसदी मिलावट को भारत की सभी गाड़ियां सह लेंगी लेकिन जैसे ही ईरान - इजरायल युद्ध शुरू हुआ और देश में पेट्रोल की कमी हुई सरकार ने ई- 20 पेट्रोल सभी पेट्रोल पंप पर बेचना शुरू कर दिया। सरकार की इस नीति से लोगों में एक नई बहस छिड़ गई है। बहुत से एक्स्पर्ट बताते हैं कि ई-20 पेट्रोल 2023 से पहले की गाड़ियों के लिए ठीक नहीं है एक तो इससे माइलेज पर असल पड़ रहा है और दूसरा यह इंजन के कई पार्ट्स को भी ख़राब कर देगा।

केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने लोगों की इस बात को गलत बताया है और कहा है कि ऐसी कोई शिकायत नहीं मिली है। ई-20 के बाद, केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ई-85 और इसके बाद 100 फीसदी एथेनॉल को भी मंजूरी दे दी। सरकार का मानना है कि इससे करोड़ों डालर का फायदा होगा जिसे हम अन्य विकास कार्यों में लगा सकते हैं।


एथेनॉल क्यों बढ़ाया जा रहा है? आर्थिक कारण - भारत हर साल 85% कच्चा तेल आयात करता है। 2024 में इस पर 0 बिलियन खर्च हुए। ई-20 से हर साल 4-5 बिलियन डॉलर की बचत का अनुमान है। किसान हित- एथेनॉल गन्ना, मक्का और अनाज से बनता है। इससे चीनी मिलों और किसानों को नया बाजार मिला है। पर्यावरण-  एथेनॉल जलने पर CO और CO2 कम निकलता है। सरकार का दावा है कि ई20 से सालाना 50 लाख टन CO2 कम होगी।

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           लोगों का डर कहां से आ रहा है? सोशल मीडिया और मैकेनिकों की दुकानों पर 4 बातें सबसे ज्यादा सुनाई देती हैं: माइलेज घट रहा है- एथेनॉल की कैलोरी वैल्यू पेट्रोल से 30% कम होती है। यानी ई-20 पर गाड़ी को उतनी ही पावर के लिए ज्यादा ईंधन जलाना पड़ता है। टेस्ट में 3-6% तक माइलेज ड्रॉप दिखा है। रोज 50 km चलने वाले के लिए महीने का खर्च 200-400 रु बढ़ सकता है।
 रबर और प्लास्टिक पार्ट्स का खराब होना- पुरानी गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले रबर होज, सील और गैस्केट एथेनॉल से जल्दी घिसते हैं। 2010 से पहले की गाड़ियां ई-10 के लिए भी डिजाइन नहीं थीं। अगर टैंक में पानी चला गया तो एथेनॉल उसे एब्जॉर्ब कर लेता है और इंजन में जंग लग सकती है। स्टार्टिंग और परफॉर्मेंस इश्यू- ठंड में एथेनॉल ब्लेंड स्टार्ट होने में दिक्कत करता है। कुछ लोग कहते हैं कि गाड़ी "खींचती" नहीं है, खासकर पहाड़ों और हाईवे पर।

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पारदर्शिता की कमी-  पंप पर अक्सर ये नहीं लिखा होता कि टैंक में E10 है या E20। लोग अनजाने में भरवा लेते हैं और बाद में दिक्कत होने पर एथेनॉल को दोष देते हैं। सरकार और ऑटो कंपनियां क्या कहती हैं? सड़क परिवहन मंत्रालय और IOC का कहना है कि 2023 के बाद बनी सभी गाड़ियां E20 कम्पैटिबल हैं। Maruti, Hyundai, Tata, Mahindra ने अपनी नई गाड़ियों को E20 Ready बताया है। पुरानी गाड़ियों के लिए सरकार ने "E20 मैटेरियल कम्पैटिबल" किट का ऑप्शन दिया है, जिसमें रबर पार्ट्स बदलने पड़ते हैं। खर्च 3,000-8,000 रु तक आ सकता है। तकनीकी हकीकत क्या है? इंजन- अगर गाड़ी E20 कम्पैटिबल है तो इंजन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ECU सॉफ्टवेयर एथेनॉल के हिसाब से फ्यूल मिक्स एडजस्ट कर देता है। फ्यूल सिस्टम- पुरानी गाड़ियों में नायलॉन और स्टेनलेस स्टील पार्ट्स होते हैं जो ठीक रहते हैं। लेकिन पुराने रबर वाले पार्ट्स 2-3 साल में बदलने पड़ सकते हैं।

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लॉन्ग टर्म इफेक्ट- अभी E20 देश में सिर्फ 2-3 साल हुआ है। 10 साल बाद इंजन पर क्या असर होगा, इसका बड़ा डेटा उपलब्ध नहीं है। दुनिया में क्या हो रहा है? ब्राजील 40 साल से E27 चला रहा है। वहां 90% गाड़ियां Flex Fuel हैं जो E0 से E100 तक चलती हैं। अमेरिका में E10 स्टैंडर्ड है। भारत ने सीधे E10 से E20 पर छलांग लगाई, इसलिए लोगों को झटका लगा। आम आदमी क्या करे? गाड़ी के फ्यूल लिड या मैनुअल पर लिखा होता है - E10, E20 या E20 Compatible। पुरानी गाड़ी है तो- अगर गाड़ी 2015 से पुरानी है और रोज 80-100 km चलती है, तो रबर पार्ट्स की जांच करवा लो। जरूरत लगे तो बदल दो। पंप पर पूछो भरवाने से पहले पूछ लो कि E10 है या E20।


पैनिक मत करो- 2-3% माइलेज ड्रॉप और थोड़ी मेंटेनेंस के अलावा ज्यादातर नई गाड़ियों में दिक्कत नहीं आ रही। एथेनॉल नीति देश के लिए जरूरी है - विदेशी मुद्रा बचती है, किसान को फायदा होता है, प्रदूषण घटता है। लेकिन सरकार ने कम्युनिकेशन में कमी रखी। लोगों को लगा कि उनकी 5 साल पुरानी गाड़ी एक दिन में "आउटडेटेड" हो गई। अगर ऑटो कंपनियां फ्री सर्विस कैंप लगाकर पुरानी गाड़ियों की जांच करें और पंप पर क्लियर लेबलिंग हो, तो ये डर काफी हद तक कम हो सकता है। अभी समस्या तकनीक से ज्यादा भरोसे की है।

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