योग दिवस: सिर्फ इवेंट बनकर न रह जाए
विदेशों में भारतीय दूतावासों के कार्यक्रम, ये सब जरूरी है। इसने योग को ग्लोबल ब्रांड बनाया। 2014 से पहले योग को "हिंदू प्रैक्टिस" कहकर खारिज किया जाता था।
राजीव शुक्ल-संपादक
21 जून 2026 को 11वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस देशभर में मनाया गया। राजधानी दिल्ली के साथ साथ देश के हर शहर और कस्बों में हजारों जगहों पर कार्यक्रम हुए, प्रधानमंत्री मोदी कोलकाता में विशेष सत्र में शामिल हुए। तस्वीरें अच्छी आईं, बयानबाजी हुई, और अगले दिन सब सामान्य हो गया। अब सवाल ये है कि क्या योग दिवस सिर्फ एक दिन का इवेंट बनकर रह गया है या इसका जमीनी असर भी दिख रहा है? प्रतीकवाद: जो दिखता है- हर साल 21 जून को योग दिवस का मतलब हो जाता है: सरकारी अधिकारी मैट पर बैठे हुए फोटो, स्कूल-कॉलेज में अनिवार्य ड्रिल, सोशल मीडिया पर सेलेब्स के वीडियो
विदेशों में भारतीय दूतावासों के कार्यक्रम, ये सब जरूरी है। इसने योग को ग्लोबल ब्रांड बनाया। 2014 से पहले योग को "हिंदू प्रैक्टिस" कहकर खारिज किया जाता था। आज 190+ देश इसे मनाते हैं। यूएन ने 2014 में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया था। लेकिन प्रतीकवाद की सीमा यही है कि वो एक दिन में ही खत्म हो जाता है।
जमीनी हकीकत: आंकड़े क्या कहते हैं? सकारात्मक पक्ष- आयुष मंत्रालय के मुताबिक 2024 तक 1.2 लाख से ज्यादा योग इंस्ट्रक्टर ट्रेंड हो चुके हैं। अब योग को भी स्कूलों में शामिल किया जाने लगा है। सीबीएसई ने 6-12 क्लास में योग को पार्ट बनाया है।
मेडिकल टूरिज्म-, ऋषिकेश, केरल, मैसूर में योग-आयुर्वेद के लिए विदेशी आ रहे हैं। ये 8000 करोड़ का इंडस्ट्री बन गया है। इसका एक कमजोर पक्ष यह है कि ग्रामीण भारत में इसकी पहुंच बहुत कम या ना के बराबर है। एनसीआरबी का हेल्थ सर्वे कहता है कि 70% ग्रामीण लोग रोज योग नहीं करते। उनके लिए योग "शहरियों का शौक" है। क्वालिटी का सवाल- 15 दिन के सर्टिफिकेट कोर्स से बने इंस्ट्रक्टर स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। इससे गलत प्रैक्टिस का खतरा है। निरंतरता नहीं- 21 जून के बाद ज्यादातर लोग मैट समेट देते हैं। रोजाना योग करने वालों की संख्या 15% से ज्यादा नहीं बढ़ी। असर कहां दिखना चाहिए था?- योग को स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनना था, लेकिन हुआ नहीं। नॉन-कम्यूनिकेबल डिजीज पर रोक- भारत में डायबिटीज, हाई BP, स्ट्रेस के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। ICMR कहता है कि 2030 तक 13.4 करोड़ लोग डायबिटिक होंगे। योग प्रिवेंटिव हेल्थ में काम करता है, लेकिन आयुष बजट कुल हेल्थ बजट का सिर्फ 2.3% है। मानसिक स्वास्थ्य-
Read More सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी हर काम से नहीं हटती पीछेNIMHANS के डेटा के मुताबिक भारत में 15% लोग मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। योग और प्राणायाम का असर डिप्रेशन-एंग्जाइटी में साबित है। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में योग को मेनस्ट्रीम नहीं किया गया। स्कूलों में योग पीरियड है, लेकिन परीक्षा में नहीं पूछा जाता। बच्चे 45 मिनट करके भूल जाते हैं। अगर इसे फिजिकल एजुकेशन का ग्रेड हिस्सा बनाया जाए तो आदत बने। दूसरे देशों ने क्या किया?- अमेरिका में 20,000 से ज्यादा स्कूलों में "Yoga in Schools" प्रोग्राम चलता है। इंश्योरेंस कंपनियां योग करने वालों को प्रीमियम में छूट देती हैं। चीन में ताई-ची को नेशनल फिटनेस प्रोग्राम बनाया। हर पार्क में सुबह ग्रुप प्रैक्टिस होती है। भारत में हम इवेंट कर रहे हैं, लेकिन पब्लिक हेल्थ सिस्टम में योग को इंटीग्रेट नहीं किया। सवाल यह उठता है कि अब क्या करना चाहिए? प्रतीकवाद से हटकर पॉलिसी बनाओ। योग दिवस को सिर्फ इवेंट न रखो। हर जिला अस्पताल में योग थेरेपी सेंटर हो। आयुष्मान भारत में योग कवर हो। क्वालिटी कंट्रोल ऐसा हो जो भी योग सिखाए, उसकी ट्रेनिंग और सर्टिफिकेशन सख्त हो। गलत आसन से स्पाइन इंजरी के केस बढ़ रहे हैं। ग्रामीण फोकस- हर पंचायत में एक योग मित्र हो। जैसे आशा वर्कर है, वैसे ही योग वर्कर। उन्हें स्टाइपेंड मिले। डेटा पर काम करो- योग से कितने लोगों का शुगर कंट्रोल हुआ, कितनों की दवा कम हुई - ये डेटा इकट्ठा करो। तभी पॉलिसी मेकर मानेंगे। योग दिवस का महत्व कम नहीं हुआ है। इसने भारत की सॉफ्ट पावर बढ़ाई है। लेकिन अगर अगले 10 साल भी हम सिर्फ 21 जून को मैट बिछाते रहे, तो योग "इंस्टाग्रामेबल एक्टिविटी" बनकर रह जाएगा। योग का असली मकसद था - "योगः कर्मसु कौशलम्"। काम में कुशलता। वो कुशलता तब आएगी जब योग स्कूल की क्लास से निकलकर अस्पताल की OPD, फैक्ट्री के ब्रेक रूम और गांव के चौपाल तक पहुंचे। तस्वीरें अच्छी लगती हैं, लेकिन बदलाव तब दिखता है जब किसी गांव के डायबिटिक मरीज की दवा आधी हो जाए क्योंकि उसने रोज 30 मिनट अनुलोम-विलोम किया।


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