राजनीति
रिकॉर्ड मतदान, बदलता भारत — लोकतंत्र अब जनता की मुट्ठी में
बारिश, धूप और जिद — तीन प्रदेशों ने दिखा दी असली ताकत, असम की जिद, केरल की समझ, पुडुचेरी का उत्साह - लोकतंत्र की नई मिसाल
कभी-कभी इतिहास शोर से नहीं, कतारों में खड़ी खामोश भीड़ के संकल्प से लिखा जाता है। 9 अप्रैल 2026 ऐसा ही दिन था। असम, केरल और पुडुचेरी में भोर से पहले ही मतदान केंद्रों के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं भीगे हाथों में छाते थे, कहीं तपती सुबह से पहले ही चेहरों पर जिद चमक रही थी। कोई कांपते कदमों और झुकी कमर के साथ पहुंचा था, तो कोई पहली बार वोट देने का उत्साह आंखों में लिए खड़ा था। चेहरे अलग थे, भाषाएं अलग थीं, परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन सबको एक ही विश्वास जोड़ रहा था—लोकतंत्र को और मजबूत करने का विश्वास। शाम तक आंकड़ों ने बता दिया कि जनता ने केवल मतदान नहीं किया, बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।
चुनाव आयोग के अनुसार मतदान समाप्ति से एक घंटे पहले (शाम 5 बजे तक) के आंकड़े चौंकाने वाले ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नई ताकत का ऐलान करने वाले हैं—असम में 84.42 प्रतिशत, केरल में 75.01 प्रतिशत और पुडुचेरी में 86.92 प्रतिशत मतदान। ये केवल संख्या नहीं, बल्कि उस जागते भारत की तस्वीर हैं, जो अब राजनीति को दूर से देखना नहीं, उसे अपनी मुट्ठी में लेना चाहता है। लगभग 5.3 करोड़ मतदाताओं की इस भागीदारी ने साफ कर दिया कि जनता अब भाषणों और नारों के पीछे चलने वाली भीड़ नहीं रही। वह सवाल करती है, जवाब मांगती है और अपने वोट से बता रही है कि सत्ता का असली मालिक नागरिक है। यही वजह है कि ये चुनाव केवल तीन राज्यों की घटना नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा बन गए हैं।
असम में इस बार का चुनाव कई अर्थों में ऐतिहासिक रहा। 126 सीटों वाले राज्य में 84.42 प्रतिशत मतदान ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। 2023 के परिसीमन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच यह पहला चुनाव था, इसलिए लोगों की भागीदारी भी बढ़ी। भाजपा-एनडीए, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सत्ता बचाने में जुटा है, जबकि कांग्रेस और अन्य दल वापसी की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि मतदाता दलों से अधिक अपने मुद्दों पर केंद्रित दिखा। भूमि अधिकार, सांस्कृतिक पहचान, सीमा सुरक्षा, बेरोजगारी और विकास जैसे सवाल लोगों को बूथ तक ले आए। डलगांव जैसे क्षेत्रों में 94 प्रतिशत से अधिक मतदान ने बता दिया कि असम अब केवल सरकार नहीं, अपना भविष्य चुन रहा है।
असम की जनता ने इस बार केवल वोट नहीं डाला, बल्कि अपनी राजनीतिक चेतना भी दिखा दी। पहचान, घुसपैठ, सीमाई तनाव और अवसरों की कमी से लंबे समय तक जूझते रहे इस राज्य ने साफ कर दिया कि अब उसे केवल वादे नहीं, ठोस जवाब चाहिए। गांवों, पहाड़ी इलाकों और सीमा से लगे क्षेत्रों में जिस तरह महिलाएं, बुजुर्ग और युवा मतदान के लिए निकले, उसने साबित कर दिया कि लोकतंत्र की ताकत शहरों तक सीमित नहीं है। असम ने यह भी दिखाया कि पूर्वोत्तर अब राष्ट्रीय राजनीति का किनारा नहीं, बल्कि उसकी दिशा तय करने वाली मजबूत आवाज बन चुका है। वहां की जनता ने बता दिया कि लोकतंत्र सबसे मजबूत तब होता है, जब सबसे दूर बैठा नागरिक भी अपने वोट की कीमत समझने लगे।
केरल में तस्वीर अलग थी, लेकिन संदेश उतना ही मजबूत। 140 सीटों पर हुए चुनाव में 75.01 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। यह आंकड़ा असम और पुडुचेरी से कम जरूर है, लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक केरल में यह भागीदारी अपने आप में असाधारण है। एलडीएफ, यूडीएफ और भाजपा गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबले ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया। पलक्कड़, कोझीकोड और कई जिलों में 80 प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ। स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी, पर्यावरण और महंगाई जैसे मुद्दों पर जनता ने खुलकर अपनी राय दी। यहां मतदाता केवल दल नहीं देखता, बल्कि उनके काम, नीतियों और भविष्य की दिशा को भी परखता है।
केरल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वहां लोकतंत्र केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कृति बन चुका है। बारिश के बावजूद बूथों पर लगी लंबी कतारों ने बता दिया कि यहां का नागरिक मतदान को अधिकार से अधिक कर्तव्य मानता है। बड़ी संख्या में महिलाएं और पहली बार वोट डालने वाले युवा मतदान के लिए पहुंचे। युवाओं ने बेरोजगारी, तकनीकी शिक्षा और बेहतर अवसरों के सवाल उठाए, जबकि महिलाओं ने स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दी। केरल के मतदाता ने साफ कर दिया कि अब राजनीति केवल विचारधारा तक सीमित नहीं रहेगी। जनता का विश्वास उसी दल को मिलेगा, जो उसकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा।
इन चुनावों में अगर किसी ने पूरे देश को सबसे ज्यादा चौंकाया, तो वह पुडुचेरी था। केवल 9.5 लाख मतदाताओं वाले इस छोटे केंद्र शासित प्रदेश में 86.92 प्रतिशत मतदान ने लोकतंत्र की नई मिसाल कायम कर दी। 30 सीटों वाले पुडुचेरी में एनडीए, कांग्रेस-डीएमके गठबंधन और अन्य दलों के बीच मुकाबला था, लेकिन सबसे बड़ी जीत जनता की भागीदारी की रही। कराईकल, पुडुचेरी और आसपास के इलाकों में सुबह से शाम तक मतदान केंद्रों पर भीड़ उमड़ी रही। स्थानीय रोजगार, पर्यटन, बुनियादी सुविधाएं, विकास और स्वायत्तता जैसे मुद्दों ने लोगों को बूथ तक पहुंचाया। इस छोटे प्रदेश ने पूरे देश को बता दिया कि लोकतंत्र की ताकत आबादी से नहीं, नागरिकों की जागरूकता से तय होती है।
असम, केरल और पुडुचेरी के चुनावों ने भारत को एक बड़ा संदेश दिया है। चुनाव आयोग की तैयारी, कड़ी सुरक्षा, ईवीएम पर बढ़ा भरोसा, डिजिटल अभियान और सोशल मीडिया से बढ़ी जागरूकता ने मतदान को जन-आंदोलन बना दिया। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि भारत का मतदाता अब बदल चुका है। वह चुप रहने वाला नागरिक नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और भविष्य के प्रति सजग प्रहरी बन गया है। 4 मई को नतीजे आएंगे, सरकारें बनेंगी और समीकरण बदलेंगे, लेकिन इन चुनावों की सबसे बड़ी जीत पहले ही सामने आ चुकी है। वह जीत है जनता का यह विश्वास कि उसकी उंगली पर लगी स्याही केवल निशान नहीं, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”


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