24 फरवरी 2002: नरेंद्र मोदी के राजनीतिक उत्कर्ष का प्रज्वलित आरंभ
24 फरवरी 2002: लोकतंत्र में जनादेश की सर्वोच्चता का दिवस, प्रचारक से पुरुषार्थी शासक बने नरेंद्र मोदी: 24 फरवरी का अमर अध्याय
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
24 फरवरी 2002—यह तिथि केवल एक उपचुनाव की घोषणा नहीं थी, यह भारतीय लोकतंत्र के विस्तृत आकाश में उगते एक नए सूर्य का प्रथम उषाकाल था। वडनगर की साधारण पृष्ठभूमि से निकला एक अनुशासित प्रचारक, नरेंद्र मोदी, जब राजकोट की राजकोट-II विधानसभा सीट से पहली बार विधायक निर्वाचित हुआ, तब वह क्षण प्रतीक बना—संघर्ष से शिखर तक की यात्रा का, विचार से शासन तक के रूपांतरण का। 45,298 मतों के साथ प्राप्त जनादेश केवल जीत का प्रमाण नहीं था; वह जनविश्वास का उद्घोष था। 14,728 मतों का अंतर उस दौर की राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अटूट आस्था का संकेत बना। यह वही क्षण था जिसने ‘प्रचारक से शासक’ बनने की दिशा को स्थिरता दी और एक ऐसी यात्रा का प्रारंभ किया, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया।
उस समय गुजरात का राजनीतिक वातावरण अनिश्चितताओं से भरा था। अक्टूबर 2001 में केशुभाई पटेल के स्थान पर मोदी को मुख्यमंत्री का दायित्व सौंपा गया, परंतु वे विधानसभा के सदस्य नहीं थे। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार 6 महीनों के भीतर सदन में प्रवेश आवश्यक था। इसीलिए गुजरात विधान सभा की सदस्यता प्राप्त करने के लिए उपचुनाव अनिवार्य बना। सीट खाली कर मार्ग प्रशस्त किया वजुभाई वाला ने। विपक्ष ने इसे अवसर के रूप में देखा और कांग्रेस प्रत्याशी अश्विनभाई मेहता को चुनावी मैदान में उतारा गया। आरोपों, आक्षेपों और तीखे प्रचार के बीच यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, नेतृत्व की वैधता का प्रश्न बन गया। किंतु मतदाता ने असमंजस नहीं, निर्णायक नेतृत्व चुना—और यही इस जीत की सबसे बड़ी शक्ति थी।
यह विजय आकस्मिक नहीं थी; इसके पीछे वर्षों की तपस्या और संगठनात्मक साधना थी। किशोर अवस्था में राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित होकर मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में स्वयं को समर्पित किया। अनुशासन, समयनिष्ठा और जनसंपर्क उनके व्यक्तित्व की पहचान बने। 1987 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाई और संगठन विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 1990 के दशक में रणनीतिक कौशल के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित हुए। किंतु चुनावी राजनीति का प्रत्यक्ष परीक्षण शेष था। राजकोट ने वह अवसर दिया, जहाँ वैचारिक प्रतिबद्धता और जनस्वीकृति का संगम हुआ। इसीलिए 24 फरवरी 2002 की जीत केवल मतगणना का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालीन विश्वास का प्रमाणपत्र बनी।
प्रचार अभियान के दौरान मोदी ने संवाद को हथियार बनाया। उन्होंने विकास, सुरक्षा और सुशासन को केंद्रीय विषय रखा। सभाओं में स्थानीय अपेक्षाओं को व्यापक दृष्टि से जोड़ा और प्रशासनिक स्पष्टता का आश्वासन दिया। विपक्ष ने वैचारिक प्रश्नों और अनुभव पर आक्षेप लगाए, किंतु मतदाता ने कार्यदृष्टि को प्राथमिकता दी। 57.32 प्रतिशत मत प्राप्त कर उन्होंने स्पष्ट जनादेश अर्जित किया, जबकि प्रतिद्वंद्वी को 38.68 प्रतिशत मत मिले। यह अंतर संख्यात्मक से अधिक मनोवैज्ञानिक था—इसने मुख्यमंत्री पद को वैधानिक स्थिरता दी। 25 फरवरी को शपथ ग्रहण के साथ सदन में उनका प्रवेश हुआ और शासन की दिशा को विधायी समर्थन मिला। यह क्षण लोकतंत्र में जनादेश की सर्वोच्चता का सजीव उदाहरण बना।
किन्तु यह विजय आसान समय में नहीं आई थी। 27 फरवरी 2002 को गोधरा की दुखद घटना और उसके बाद उपजे दंगों ने राज्य को गंभीर संकट में डाल दिया। प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक संतुलन की कठोर परीक्षा हुई। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाएँ उठीं, प्रश्नों की बौछार हुई। ऐसे समय में राजकोट से मिला विश्वास ही संबल बना। कानून-व्यवस्था की पुनर्स्थापना, पुनर्वास और दीर्घकालिक स्थिरता की दिशा में प्रयास किए गए। इसी कालखंड में आर्थिक पुनरुत्थान की रूपरेखा उभरी, जिसका विस्तार आगे चलकर वाइब्रेंट गुजरात जैसे निवेश सम्मेलनों में दिखाई दिया। औद्योगिक विकास, आधारभूत संरचना और ऊर्जा सुधारों ने राज्य को नए आत्मविश्वास से जोड़ा। इस परिवर्तन की आधारशिला राजकोट की वही पहली जीत थी।
Read More बंगाल में ‘दीदी बनाम मोदी’ की सीधी जंग, तमिलनाडु में द्रविड़ किले पर ‘विजय’ फैक्टर की दस्तकराजकोट-II की विजय ने नेतृत्व को आत्मविश्वास की स्थायी धुरी प्रदान की। 2002, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में लगातार सफलता ने प्रशासनिक मॉडल को स्थिरता दी। ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़क विस्तार, कृषि वृद्धि और निवेश आकर्षण जैसे क्षेत्रों में परिणामों ने परिवर्तन का संकेत दिया। शासन में लक्ष्यनिर्धारण, समयबद्ध क्रियान्वयन और उत्तरदायित्व की शैली प्रमुख रही। इस क्रम में विकास-केंद्रित विमर्श को बल मिला, जिसने समर्थकों के बीच उन्हें निर्णायक और परिणामोन्मुख नेता के रूप में स्थापित किया। राजकोट से प्रारंभ यह यात्रा केवल पदोन्नति की कहानी नहीं थी; यह शासन-कार्य संस्कृति में बदलाव का प्रयास थी, जिसका प्रभाव राज्य की सीमाओं से परे गया।
राष्ट्रीय राजनीति में 2014 का वर्ष उसी क्रम का विस्तार माना गया। प्रधानमंत्री पद की शपथ ने उस यात्रा को राष्ट्रीय आयाम दिया, जिसकी प्रथम सीढ़ी राजकोट में रखी गई थी। संगठनात्मक अनुभव, प्रशासनिक प्रयोग और चुनावी विश्वसनीयता—इन तीन आधारों पर राष्ट्रीय नेतृत्व का निर्माण हुआ। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय कूटनीति, आधारभूत संरचना पर बल और जनकल्याण योजनाओं की व्यापकता ने समर्थकों के बीच उनकी पहचान को विशिष्ट बनाया। आलोचनाओं और प्रतिस्पर्धा के बावजूद चुनावी सफलता का सिलसिला जारी रहा। इस दृष्टि से 24 फरवरी 2002 केवल अतीत का अध्याय नहीं, वर्तमान की निरंतरता का स्रोत है।
आज जब उस ऐतिहासिक दिन को स्मरण किया जाता है, तो वह तिथि समय की धूल में खोई घटना नहीं, बल्कि परिवर्तन की ज्वलंत प्रेरणा बनकर सामने आती है। राजकोट ने एक प्रचारक को विधायी मान्यता दी, और उसी से प्रशासनिक प्रयोगों की श्रृंखला प्रारंभ हुई। समर्थकों की दृष्टि में यह यात्रा साधारण पृष्ठभूमि से वैश्विक नेतृत्व तक पहुँचे व्यक्तित्व की अप्रतिम गाथा है—अथक परिश्रम, अटूट संकल्प और जनविश्वास से निर्मित। 24 फरवरी 2002 इसलिए अमर है, क्योंकि उसने संघर्ष को अवसर में, विचार को शासन में और विश्वास को विजय में रूपांतरित किया। वह दिन केवल एक जीत नहीं था; वह युगारंभ था—और उसकी गूँज आज भी भारतीय लोकतंत्र की धड़कनों में सुनाई देती है।

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