भारत की सुरक्षा के खिलाफ साजिशें और सतर्कता की जीत आतंकवाद के बदलते स्वरूप पर गंभीर चिंतन

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देश की राजधानी दिल्ली और कोलकाता जैसे महानगरों में हाल ही में जिस प्रकार की आतंकी साजिश का खुलासा हुआ, उसने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का खतरा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने रूप बदलकर समाज के भीतर घुसपैठ करने की कोशिश करता रहता है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की तत्परता से एक बड़े षड्यंत्र को समय रहते विफल कर दिया गया। यह घटना केवल कुछ पोस्टर लगाने या संदिग्ध गतिविधियों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक संगठित मॉड्यूल, विदेशी निर्देश और व्यापक नेटवर्क की आशंका सामने आई है।
 
सात फरवरी को कश्मीरी गेट और आसपास के क्षेत्रों में लगाए गए देशविरोधी पोस्टरों ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया। इन पोस्टरों में भारत विरोधी संदेश और आतंकवादी संगठनों से जुड़े व्यक्तियों की तस्वीरें थीं। सबसे पहले इस गतिविधि पर सीआईएसएफ की नजर पड़ी और सूचना मिलते ही दिल्ली पुलिस की पेट्रोलिंग यूनिट सक्रिय हुई। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को सौंपी गई। स्पेशल सेल के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त प्रमोद कुमार कुशवाहा के नेतृत्व में जांच आगे बढ़ी और संदिग्धों की धरपकड़ शुरू हुई।
 
जांच में यह खुलासा हुआ कि इस साजिश के तार बांग्लादेश से जुड़े हुए थे। कोलकाता से एक बांग्लादेशी नागरिक सहित दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने दिल्ली और कोलकाता के विभिन्न स्थानों पर पोस्टर लगाए थे। यह भी सामने आया कि कोलकाता के कई मेट्रो स्टेशनों पर इसी प्रकार की गतिविधियां की गई थीं। आरोपियों को निर्देश देने वाला शख्स शब्बीर अहमद लोन बताया गया, जो जम्मू कश्मीर के गंदेरबल का निवासी है और पूर्व में लश्कर ए तैयबा से जुड़ा रहा है। वर्ष 2007 में उसकी गिरफ्तारी के बाद वह जेल में रहा और 2019 में रिहा हुआ। जांच एजेंसियों का दावा है कि रिहाई के बाद उसने फिर से आतंकी संपर्क स्थापित किए और एक नया मॉड्यूल खड़ा करने की कोशिश की।
 
आतंकवाद की यही प्रवृत्ति सबसे अधिक चिंताजनक है कि वह बार बार नए चेहरों और नई रणनीतियों के साथ सामने आता है। कभी वह हथियारों के जरिए हमला करता है, कभी वैचारिक युद्ध के माध्यम से समाज में जहर घोलने की कोशिश करता है। पोस्टर जैसे प्रतीत होने वाले साधारण माध्यम का उपयोग भी यदि किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है, तो यह सुरक्षा तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
 
तमिलनाडु से छह बांग्लादेशी नागरिकों की गिरफ्तारी ने इस पूरे प्रकरण को और व्यापक बना दिया है। जांच में यह संकेत मिले कि इन लोगों को किसी बड़ी वारदात के लिए तैयार किया जा रहा था। सुरक्षा एजेंसियां अब इनके नेटवर्क, फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की पड़ताल कर रही हैं। यह भी जांच का विषय है कि किस प्रकार सीमापार बैठे हैंडलर भारत के भीतर युवाओं को प्रभावित करने या भ्रमित करने का प्रयास करते हैं।
 
इस पूरे घटनाक्रम के समानांतर अरब सागर में विदेशी सामान की तस्करी का मामला भी सामने आया, जिसमें अल मुख्तार नामक नाव से लगभग पांच करोड़ रुपये मूल्य की विदेशी सिगरेट बरामद की गई। चार ईरानी नागरिकों को हिरासत में लिया गया और उनके पास से सैटेलाइट फोन जब्त किए गए। यद्यपि यह मामला सीधे तौर पर आतंकवाद से जुड़ा हुआ सिद्ध नहीं हुआ है, परंतु तस्करी, अवैध वित्तीय लेनदेन और आतंकी गतिविधियों के बीच संबंधों को नकारा नहीं जा सकता। कई बार ऐसे अवैध माध्यम ही आतंकवाद की फंडिंग का आधार बनते हैं।
 
आतंकवाद केवल बंदूक और बम का नाम नहीं है। यह एक विचारधारा भी है जो असंतोष, कट्टरता और भ्रम के सहारे पनपती है। जब कोई संगठन युवाओं को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए प्रेरित करता है, तो वह केवल कानून का उल्लंघन नहीं करता बल्कि समाज की एकता और विश्वास को भी तोड़ने का प्रयास करता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जहां अनेक धर्म, भाषाएं और संस्कृतियां साथ रहती हैं, वहां ऐसी गतिविधियां सामाजिक सौहार्द के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की सफलता इस बात का प्रमाण है कि देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि को हल्के में नहीं लिया जाता। तकनीकी निगरानी, खुफिया सूचनाओं का आदान प्रदान और राज्यों के बीच समन्वय ने इस साजिश को नाकाम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। किंतु यह भी सत्य है कि आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल सुरक्षा बलों के भरोसे नहीं लड़ी जा सकती। समाज की सजगता, नागरिकों की जिम्मेदारी और युवाओं में सकारात्मक सोच का विकास भी उतना ही आवश्यक है।
 
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट के माध्यम से कट्टरपंथी विचारों का प्रसार तेज गति से होता है। सीमापार बैठे तत्व भ्रामक सूचनाओं और उकसावे के जरिए युवाओं को अपने जाल में फंसाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में शिक्षा, जागरूकता और संवाद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि युवाओं को सही दिशा, रोजगार और अभिव्यक्ति के स्वस्थ अवसर मिलें, तो वे किसी भी भटकाव का शिकार नहीं होंगे।
भारत ने पिछले दशकों में आतंकवाद की भारी कीमत चुकाई है। जम्मू कश्मीर से लेकर महानगरों तक अनेक निर्दोष लोगों ने अपनी जान गंवाई है। इसलिए प्रत्येक साजिश का समय रहते पर्दाफाश होना न केवल सुरक्षा की जीत है, बल्कि यह उन सभी नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वाह भी है जो शांति और विकास का सपना देखते हैं।
इस घटना से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि आतंकवाद चाहे वैचारिक हो या सशस्त्र, उसकी जड़ें काटने के लिए बहुआयामी रणनीति आवश्यक है। सीमाओं की सुरक्षा, खुफिया तंत्र की मजबूती, वित्तीय लेनदेन पर निगरानी और समाज में जागरूकता का विस्तार एक साथ चलना चाहिए। साथ ही, जो लोग भटक चुके हैं, उनके पुनर्वास और मुख्यधारा में लौटने के प्रयास भी किए जाने चाहिए, ताकि वे फिर किसी साजिश का हिस्सा न बनें।
अंततः यह समझना होगा कि आतंकवाद का लक्ष्य केवल भय फैलाना नहीं होता, बल्कि वह राष्ट्र की एकता और विश्वास को कमजोर करना चाहता है। जब देश की एजेंसियां सतर्कता और समन्वय के साथ ऐसी साजिशों को विफल करती हैं, तो यह लोकतंत्र की शक्ति और सामूहिक संकल्प का प्रतीक बनता है। भारत की विविधता, लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिकों की सजगता ही आतंकवाद के विरुद्ध सबसे बड़ी ढाल है। यदि हम सभी मिलकर शांति, सद्भाव और कानून के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करें, तो कोई भी आतंकी साजिश हमारे राष्ट्रीय आत्मविश्वास को डिगा नहीं सकती है।
          *कांतिलाल मांडोत*

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