विकास की दौड़ में पिछड़ता भारत

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महेन्द्र तिवारी

 

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनावों का स्वरूप समय के साथ काफी बदल गया है। पहले जहां चुनाव विचारधाराओं, दीर्घकालिक विकास के वादों, बुनियादी ढांचे के निर्माण और राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर मुद्दों पर लड़े जाते थे, वहीं अब यह एक तरह के अल्पकालिक आर्थिक प्रलोभन के बाजार में तब्दील होता जा रहा है। 'फ्रीबीज' यानी मुफ्त सुविधाओं की राजनीति ने पूरे देश को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है। राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त लैपटॉप, स्मार्टफोन और यहां तक कि बिना किसी उत्पादक कार्य के सीधे नकद राशि देने की अंधी होड़ में लगे हुए हैं। यह होड़ अब इतनी खतरनाक हो गई है कि राज्य के खजाने की वास्तविक क्षमता और राजकोषीय घाटे को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया जाता है। चुनाव जीतने की यह 'शॉर्टकट' रणनीति न केवल अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है, बल्कि यह देश की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी गहरे दांव पर लगा रही है।

हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने इस खतरनाक प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए बहुत ही सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश या सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों, विशेषकर जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने तमिलनाडु बिजली कंपनी से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए जो टिप्पणियां कीं, वे पूरे देश और नीति निर्माताओं की आंखें खोलने वाली हैं। अदालत ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि इन तथाकथित मुफ्त की रेवड़ियों का अंतिम और पूरा आर्थिक बोझ देश के उन ईमानदार करदाताओं पर ही पड़ता है जो दिन-रात मेहनत करके अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं। जब सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्त सुविधाएं बांटती हैं, तो इसका सीधा और नकारात्मक असर देश के वास्तविक विकास कार्यों पर पड़ता है। अदालत की यह चिंता केवल एक राज्य या एक विशेष मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पूरी वृहद आर्थिक नीति पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब न्यायपालिका भी इस लोकलुभावन राजनीति के विनाशकारी आर्थिक दुष्प्रभावों को लेकर मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती।

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भारत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में, जहां आयकर देने वालों की संख्या कुल आबादी का बमुश्किल छह से सात प्रतिशत ही है, वहां मुफ्त की इन विशाल योजनाओं का पूरा ढांचा एक बहुत छोटे से वर्ग के कंधों पर टिका हुआ है। यह मध्यम वर्ग, जो हर दिन कड़ी मेहनत करता है, नियमों का पालन करता है और ईमानदारी से अपने करों का भुगतान करता है, खुद को ठगा हुआ और उपेक्षित महसूस करता है। करदाताओं के खून-पसीने की कमाई का उपयोग आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण, जर्जर शिक्षा प्रणाली को विश्वस्तरीय बनाने और ग्रामीण व शहरी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने के बजाय, केवल सत्ता हासिल करने और वोट बैंक को पक्का करने के लिए किया जा रहा है। जब राज्य सरकारें अपनी आय से कहीं अधिक खर्च करने लगती हैं, तो उनके पास बाजार से भारी ब्याज दरों पर कर्ज लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। भारतीय रिजर्व बैंक की कई हालिया रिपोर्टों में यह कड़ी चेतावनी दी जा चुकी है कि देश के कई राज्यों का राजकोषीय घाटा उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद के सुरक्षित और निर्धारित स्तर को पार कर चुका है। यह बढ़ता हुआ कर्ज कोई हवा में गायब नहीं हो जाएगा; अंततः यह हमारी भविष्य की पीढ़ियों को ही चुकाना होगा, जिसका सीधा अर्थ है कि आज के मुफ्त के वादे कल के भारी भरकम टैक्स और बेलगाम महंगाई का कारण बनेंगे।

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मुफ्त की राजनीति का सबसे बुरा और स्पष्ट असर देश के ऊर्जा क्षेत्र पर देखा जा रहा है। मुफ्त बिजली का वादा हर विधानसभा चुनाव में एक प्रमुख हथियार बन गया है। इसका भयानक परिणाम यह है कि राज्य संचालित बिजली वितरण कंपनियां (डिस्कॉम) लाखों करोड़ रुपये के भारी-भरकम घाटे में डूब चुकी हैं। जब बिजली पूरी तरह से मुफ्त दी जाती है, तो इसका बेतहाशा दुरुपयोग होता है। जो नागरिक या किसान मुफ्त बिजली प्राप्त कर रहा होता है, वह ऊर्जा संरक्षण या उसके सही उपयोग पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता क्योंकि उसे इसकी कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती। इसके अलावा, लोकलुभावन वादों के दबाव में राज्य सरकारें डिस्कॉम कंपनियों को समय पर सब्सिडी का पैसा नहीं चुका पाती हैं। इससे ये कंपनियां नई तकनीक, ग्रिड आधुनिकीकरण, स्मार्ट मीटरिंग और हरित ऊर्जा में आवश्यक निवेश करने में पूरी तरह असमर्थ हो जाती हैं। तमिलनाडु, पंजाब और अन्य राज्यों के उदाहरण हमारे सामने हैं जहां बिजली सब्सिडी का बिल हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और व्यवस्था चरमरा रही है। अदालत ने भी ठीक यही तार्किक सवाल उठाया था कि कई मामलों में बड़े और संपन्न लोग भी इस मुफ्त बिजली का अनुचित लाभ उठा रहे हैं, जबकि वास्तव में जो अत्यंत गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति है, उसे इसका कोई खास फायदा नहीं मिल रहा है।

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किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की रीढ़ उसका पूंजीगत व्यय होता है। जब सरकारें नई सड़कें, बड़े पुल, रेलवे नेटवर्क, आधुनिक बंदरगाह, अच्छे स्कूल और सर्वसुविधायुक्त अस्पताल बनाती हैं, तो इससे न केवल वर्तमान में भारी मात्रा में रोजगार पैदा होता है, बल्कि भविष्य के लिए एक स्थायी राष्ट्रीय संपत्ति भी बनती है जो दशकों तक अर्थव्यवस्था को गति और मजबूती देती है। इसके ठीक विपरीत, मुफ्त की योजनाओं पर किया जाने वाला अंधाधुंध खर्च राजस्व व्यय की श्रेणी में आता है, जो अनुत्पादक होता है। जब राज्य का एक बड़ा बजट मुफ्त रेवड़ियों में ही स्वाहा हो जाता है, तो पूंजीगत व्यय के लिए पैसा ही नहीं बचता। प्रतिष्ठित संस्थानों के आंकड़े साफ बताते हैं कि राज्यों पर बढ़ता सब्सिडी का भारी बोझ उन्हें दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास परियोजनाओं से दूर कर रहा है। इसका सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि हम आज के क्षणिक राजनीतिक लाभ के लिए देश के भविष्य की मजबूत नींव को खोखला कर रहे हैं। बिना मजबूत बुनियादी ढांचे के कोई भी देश 21वीं सदी में एक विकसित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनने का अपना सपना कभी पूरा नहीं कर सकता।

यहां इस बारीक लेकिन महत्वपूर्ण बात को समझना बहुत जरूरी है कि एक 'कल्याणकारी राज्य' की अवधारणा और 'फ्रीबीज' (मुफ्तखोरी) की राजनीति में एक बहुत बड़ा और बुनियादी अंतर है। भारतीय संविधान के तहत चुनी गई किसी भी सरकार का यह प्राथमिक और नैतिक दायित्व है कि वह समाज के सबसे कमजोर, शोषित और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए काम करे। सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, और आपात स्थिति या आपदा में खाद्य सुरक्षा प्रदान करना एक कल्याणकारी राज्य का अहम कर्तव्य है। लेकिन, बिना किसी उत्पादक कार्य के सीधे लोगों के बैंक खातों में नकद बांटना, या चुनाव से ठीक पहले लैपटॉप, स्मार्टफोन और मंगलसूत्र जैसी चीजें बांटना जन कल्याण बिल्कुल नहीं है, बल्कि यह कानूनी रूप से मतदाताओं को रिश्वत देने के समान है। पूर्व की सरकारों द्वारा शुरू की गई मनरेगा जैसी योजनाओं का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम के बदले रोजगार और पैसा देना था, जिससे संपत्तियों का निर्माण भी होता था। लेकिन आज की 'फ्री राइडर' संस्कृति लोगों को कर्महीन बना रही है। जब लोगों को बिना मेहनत किए बुनियादी जरूरतें और मुफ्त नकद मिलने लगता है, तो समाज में उत्पादकता में भारी गिरावट आती है, जिसका सीधा असर हमारे कृषि और विनिर्माण क्षेत्रों में मजदूरों की भारी कमी के रूप में देखा जा रहा है।

आर्थिक और वृहद दृष्टिकोण से देखें तो इस फ्रीबीज संस्कृति का एक और घातक परिणाम अनियंत्रित मुद्रास्फीति (महंगाई) के रूप में सामने आता है। जब सरकारें मुफ्त नकद योजनाओं के माध्यम से बाजार में बिना किसी मेहनत के पैसा डालती हैं, तो लोगों की क्रय शक्ति अचानक से बढ़ जाती है। लेकिन चूंकि इस पैसे के पीछे कोई नया उत्पादन या नया रोजगार सृजन नहीं हुआ है, इसलिए बाजार में वस्तुओं की आपूर्ति वही पुरानी रहती है। अर्थशास्त्र का यह एक बहुत ही सामान्य और बुनियादी नियम है कि जब बाजार में बहुत सारा पैसा बहुत कम वस्तुओं का पीछा करता है, तो चीजों की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। आज हम जो खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि देख रहे हैं, वह आंशिक रूप से इसी का एक प्रत्यक्ष परिणाम है। अंततः, यह बढ़ती महंगाई उसी गरीब आदमी की कमर सबसे ज्यादा तोड़ती है जिसे चुनाव के समय मुफ्त सुविधाओं का लालच देकर वोट लिया गया था। इस तरह, सरकार एक हाथ से जो मुफ्त में देती है, वह दूसरे हाथ से अदृश्य महंगाई के रूप में वापस छीन लेती है, और आम जनता इस राजनीतिक भ्रमजाल को आसानी से समझ नहीं पाती।

इतिहास और वैश्विक अर्थव्यवस्था के कड़वे अनुभव हमें इस विनाशकारी रास्ते के प्रति बार-बार आगाह करते हैं। लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला का उदाहरण पूरी दुनिया के सामने एक सबक है। प्राकृतिक संसाधनों और तेल के विशाल भंडार से समृद्ध होने के बावजूद, वहां की सरकारों ने दशकों तक सिर्फ चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन नीतियां अपनाईं और जनता को हर चीज मुफ्त देने की बुरी आदत डाल दी। नतीजा यह हुआ कि कुछ ही सालों में देश भारी आर्थिक संकट, हाइपरइन्फ्लेशन (अत्यधिक महंगाई) और भयानक भुखमरी का शिकार हो गया। इसी तरह, 2010 के दशक में ग्रीस का भयंकर आर्थिक संकट भी बेलगाम सरकारी खर्च, कर्ज लेकर घी पीने की आदत और लोकलुभावन नीतियों का ही सीधा परिणाम था, जिसने पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया था। भारत को इन अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से समय रहते सबक लेना चाहिए। आज हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है, लेकिन अगर यह राजकोषीय अनुशासनहीनता और मुफ्तखोरी की राजनीति इसी तरह बढ़ती रही, तो हम भी बहुत जल्द एक गहरे और अकल्पनीय आर्थिक संकट की ओर धकेले जा सकते हैं।

इस जटिल समस्या का समाधान यह बिल्कुल नहीं है कि सरकार गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करना पूरी तरह से बंद कर दे, बल्कि इसका वास्तविक समाधान इस सरकारी मदद को तर्कसंगत, पारदर्शी और पूरी तरह से लक्षित बनाने में छिपा है। आज तकनीक के इस उन्नत युग में हमारे पास आधार कार्ड, मोबाइल और जन-धन खातों का एक बहुत ही मजबूत और सुरक्षित ढांचा मौजूद है। सरकार को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) का शत-प्रतिशत उपयोग करते हुए केवल और केवल उन लोगों तक ही सब्सिडी पहुंचानी चाहिए जो वास्तव में इसके असली हकदार हैं। उदाहरण के लिए, पीएम-किसान योजना एक लक्षित योजना का अच्छा उदाहरण है, जो सीधे छोटे और सीमांत किसानों के खातों में बिना किसी बिचौलिए के पैसा भेजती है। लेकिन एक सार्वभौमिक मुफ्त बिजली या मुफ्त पानी की योजना, जिसका लाभ एक अमीर जमींदार, एक उद्योगपति और एक गरीब मजदूर दोनों समान रूप से उठा रहे हों, न केवल अनुचित है बल्कि यह राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी है। सरकार को मुफ्त की चीजें बांटने के बजाय देश के नागरिकों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

सही मायने में देश से गरीबी उन्मूलन का एकमात्र और सबसे प्रभावी तरीका स्थायी और सम्मानजनक रोजगार पैदा करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी सख्त टिप्पणियों में ठीक इसी बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया है कि राज्य सरकारों को लोकलुभावन वादों के बजाय ठोस रोजगार सृजन की नीतियों पर काम करना चाहिए। 'स्किल इंडिया', 'स्टार्टअप इंडिया' और 'मेक इन इंडिया' जैसी बेहतरीन पहलों को फाइलों से निकालकर धरातल पर अधिक मजबूती और ईमानदारी से लागू करने की तत्काल आवश्यकता है। जब देश के युवाओं के हाथों में कौशल (Skill) होगा और उन्हें अपनी योग्यता के अनुसार सम्मानजनक रोजगार मिलेगा, तो उन्हें अपना जीवन यापन करने के लिए किसी भी सरकार की मुफ्त रेवड़ियों या दया की कोई आवश्यकता नहीं होगी। देश में स्वरोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए सस्ता ऋण उपलब्ध कराना, लालफीताशाही खत्म करना और बेहतर नीतियां बनाना ही असली जन कल्याण है। मुफ्त की चीजें केवल एक कमजोर और सरकार पर निर्भर समाज का निर्माण करती हैं, जबकि मेहनत का रोजगार एक आत्मनिर्भर, स्वाभिमानी और शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करता है।

इस राजनीतिक बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए देश में मजबूत संस्थागत और चुनाव सुधार अब अत्यंत आवश्यक हो गए हैं। भारत के चुनाव आयोग को कानूनी रूप से अधिक अधिकार दिए जाने चाहिए ताकि वह राजनीतिक दलों को उन झूठे वादों को करने से सख्ती से रोक सके जिनका कोई ठोस आर्थिक आधार या बजट उपलब्ध नहीं है। सभी राजनीतिक दलों के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे चुनाव घोषणा पत्र जारी करते समय जनता को यह स्पष्ट रूप से बताएं कि वे मुफ्त की इन लोकलुभावन योजनाओं के लिए हजारों करोड़ रुपये कहां से लाएंगे। क्या वे इसके लिए जनता पर कोई नया टैक्स लगाएंगे या फिर बुनियादी ढांचे और शिक्षा के बजट में कटौती करेंगे? यह वित्तीय पारदर्शिता मतदाताओं को वोट देते समय सही और तार्किक निर्णय लेने में बहुत मदद करेगी। इसके साथ ही, वित्त आयोग के दिशा-निर्देशों का हर राज्य द्वारा कड़ाई से पालन होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जो भी राज्य राजकोषीय घाटे की तय सीमा का जानबूझकर उल्लंघन करते हैं, उनके केंद्रीय अनुदान में कटौती करने या उन्हें बाजार से कर्ज लेने से रोकने जैसे सख्त कदम उठाए जाने चाहिए ताकि पूरे देश में वित्तीय अनुशासन बना रहे।

अंततः, राजनीति में इस बड़े और सकारात्मक बदलाव की पूरी जिम्मेदारी केवल अदालतों या चुनाव आयोग के कंधों पर नहीं छोड़ी जा सकती; यह देश के आम नागरिकों, नागरिक समाज और मीडिया की भी एक बहुत बड़ी सामूहिक जिम्मेदारी है। देश के लोगों को यह गहराई से शिक्षित करने की जरूरत है कि सरकार के पास आसमान से गिरा हुआ अपना कोई पैसा नहीं होता; जो भी पैसा मुफ्त की योजनाओं पर खर्च होता है, वह अंततः आम आदमी और करदाताओं की जेब से ही टैक्स के रूप में वसूला जाता है। मुफ्त की राजनीति एक ऐसा मीठा जहर है जो बहुत ही खामोशी से और धीरे-धीरे देश की आर्थिक नींव को पूरी तरह से खोखला कर रहा है। भारत ने वर्ष 2047 तक दुनिया का एक अग्रणी और विकसित राष्ट्र बनने का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, वह केवल तभी हासिल किया जा सकता है जब हम वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर देश की उत्पादकता, नवाचार, बुनियादी ढांचे और मानव पूंजी के विकास में भारी निवेश करें। सभी राजनीतिक दलों को अब दलगत और क्षुद्र राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में सोचना ही होगा। देश का खजाना और टैक्स का पैसा जनता की एक पवित्र अमानत है और इसे पूरी जिम्मेदारी, जवाबदेही और दूरदर्शिता के साथ खर्च किया जाना चाहिए। मुफ्त रेवड़ियों की इस आत्मघाती संस्कृति को हमेशा के लिए छोड़कर नागरिक सशक्तिकरण, रोजगार और ठोस विकास की राजनीति को अपनाना ही भारत की आर्थिक स्वतंत्रता और उसके उज्ज्वल भविष्य की असली कुंजी है।

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