एआई ईपैक्ट और महिलाओं से जुड़ी प्रचुर संभावनाएं

महिलाओं को तकनीकी प्रशिक्षण की ज्यादा जरूरत

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अर्थात एआई आज केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक संरचनाओं, आर्थिक अवसरों और शक्ति संतुलन को पुनर्परिभाषित करने वाला परिवर्तनकारी माध्यम बन चुका है। इस परिवर्तन के केंद्र में यदि किसी वर्ग के लिए सर्वाधिक संभावनाएँ छिपी हैं तो वह है महिला वर्ग, क्योंकि सदियों से अवसरों की असमानता, संसाधनों तक सीमित पहुँच और निर्णय-निर्माण में कम भागीदारी जैसी बाधाओं का सामना करने वाली महिलाओं के लिए एआई एक नई ऊर्जा, नई दिशा और नया इम्पैक्ट लेकर आया है।

विश्व स्तर पर उपलब्ध नवीन आँकड़े यह संकेत देते हैं कि तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी अभी भी संतोषजनक नहीं है, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार  एआई से जुड़े कार्यक्षेत्रों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 28 से 30 प्रतिशत के बीच है, जबकि नेतृत्वकारी भूमिकाओं में यह प्रतिशत और भी कम हो जाता है, भारत में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में लगभग 20 प्रतिशत एआई पेशेवर महिलाएँ हैं, परंतु यदि प्रशिक्षण, डिजिटल पहुँच और नीतिगत समर्थन को व्यापक बनाया जाए तो 2027 तक इस संख्या के चार गुना तक बढ़ने की संभावना व्यक्त की गई है। यह आँकड़ा केवल सांख्यिकीय वृद्धि का संकेत नहीं बल्कि सामाजिक शक्ति संतुलन में संभावित बड़े बदलाव का संकेत है। एआई इम्पैक्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह कौशल आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है।

जहाँ पारंपरिक लैंगिक पूर्वाग्रह अपेक्षाकृत कम प्रभावी होते हैं। ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म, वर्चुअल ट्यूटर, एआई-आधारित भाषा अनुवाद उपकरण और कोडिंग सिमुलेटर उन महिलाओं के लिए वरदान सिद्ध हो रहे हैं जो भौगोलिक, सामाजिक या पारिवारिक कारणों से औपचारिक संस्थानों तक नहीं पहुँच पाती थीं।इस संदर्भ मे यूनेस्को ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि एआई को समावेशी दृष्टिकोण के साथ विकसित किया जाए तो यह महिलाओं की कार्यभागीदारी और नेतृत्व क्षमता को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा सकता है, इसी प्रकार डिजिटल ऑर्गेनाइजेशन ने अपनी रिपोर्टों में उल्लेख किया है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में लैंगिक समानता सुनिश्चित करना वैश्विक विकास की अनिवार्य शर्त है।

एआई इम्पैक्ट का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम कार्यस्थल पर महिलाओं की आवाज़ को सशक्त करना है। मीटिंग एनालिटिक्स कंपनी  की एक हालिया रिपोर्ट में पाया गया कि एआई-सहायता प्राप्त वर्चुअल मीटिंग टूल्स के उपयोग से महिलाएँ औसतन 9 प्रतिशत अधिक बोलती हैं, क्योंकि एआई आधारित नोट-टेकिंग और समय प्रबंधन उपकरण उन्हें बिना बाधा अपनी बात रखने का अवसर देते हैं। यह परिवर्तन प्रतीकात्मक नहीं बल्कि संरचनात्मक है, क्योंकि निति-निर्माण में आवाज़ की उपस्थिति ही शक्ति का पहला चरण होती है।  ग्रामीण और अर्धशहरी भारत में एआई इम्पैक्ट का एक और आयाम उभर कर आया है जहाँ डिजिटल सखी, एआई चैटबॉट और स्मार्ट कृषि सलाह प्लेटफॉर्म महिलाओं को उद्यमिता की दिशा में प्रेरित कर रहे हैं।

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स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएँ अब एआई आधारित बाजार विश्लेषण, मूल्य पूर्वानुमान और ग्राहक पहुँच टूल्स का उपयोग कर अपने उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुँचा पा रही हैं इससे आय में वृद्धि के साथ आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है। यह आर्थिक सशक्तिकरण सामाजिक सशक्तिकरण में रूपांतरित हो रहा है; स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई इम्पैक्ट और भी गहरा है। मातृ स्वास्थ्य निगरानी, पोषण परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य चैटबॉट और प्रारंभिक रोग पहचान प्रणाली ग्रामीण महिलाओं के लिए जीवनरक्षक सिद्ध हो रही हैं, जहाँ पहले विशेषज्ञ डॉक्टरों की पहुँच कठिन थी वहाँ अब मोबाइल आधारित एआई समाधान प्राथमिक मार्गदर्शन उपलब्ध करा रहे हैं।

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इससे स्वास्थ्य असमानताओं में कमी आने की संभावना है; किंतु एआई का यह सकारात्मक पक्ष तभी स्थायी होगा जब इसके नकारात्मक आयामों को भी गंभीरता से समझा जाए, अनेक अध्ययनों में यह पाया गया है कि लगभग 40 प्रतिशत एआई मॉडल किसी न किसी रूप में लैंगिक पूर्वाग्रह से प्रभावित होते हैं, यदि प्रशिक्षण डेटा असंतुलित है तो निर्णय भी असंतुलित होंगे, यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ से संबद्ध एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि डिजिटल हिंसा, डीपफेक और ऑनलाइन उत्पीड़न की घटनाएँ महिलाओं को प्रभावित कर रही हैं।

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अनुमान है  विश्व की लगभग 38 प्रतिशत महिलाएँ किसी न किसी रूप में ऑनलाइन हिंसा का अनुभव कर चुकी हैं। अतः एआई इम्पैक्ट को सकारात्मक बनाए रखने के लिए सख्त डेटा नैतिकता, एल्गोरिथमिक पारदर्शिता और लैंगिक संवेदनशील नीति ढाँचा अत्यंत आवश्यक है।एआई महिलाओं के लिए केवल नौकरी का साधन नहीं बल्कि नेतृत्व का माध्यम भी बन सकता है । डेटा-आधारित निर्णय प्रणाली राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ा सकती है जिससे महिलाओं की भागीदारी मजबूत हो, जब निर्णय तथ्यों और विश्लेषण पर आधारित होंगे तो पूर्वाग्रहों की गुंजाइश घटेगी, इसके अतिरिक्त फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल मार्केटिंग, एआई ट्रेनिंग और माइक्रो-टास्किंग जैसे नए क्षेत्रों ने उन महिलाओं को भी आर्थिक स्वतंत्रता दी है जो पारंपरिक नौकरी संरचना में शामिल नहीं हो पाती थीं।

यह लचीला कार्य-मॉडल मातृत्व और पारिवारिक दायित्वों के साथ संतुलन बनाने में सहायक है। एआई इम्पैक्ट का मनोवैज्ञानिक पहलू भी उल्लेखनीय है, जब महिलाएँ तकनीक की उपभोक्ता मात्र न रहकर उसकी निर्माता और नवोन्मेषक बनती हैं तो आत्मविश्वास और पहचान दोनों का विस्तार होता है, विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में महिला सहभागिता बढ़ाने के प्रयास यह संकेत देते हैं कि आने वाले दशक में एआई क्षेत्र में महिला नेतृत्व की नई पीढ़ी उभरेगी; निष्कर्षतः एआई एक दोधारी तलवार अवश्य है।

परंतु यदि इसे समावेशी नीति, लैंगिक संतुलन, डिजिटल साक्षरता और नैतिक नियमन के साथ आगे बढ़ाया जाए तो इसका इम्पैक्ट महिलाओं के लिए ऐतिहासिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है, यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक, बौद्धिक और राजनीतिक शक्ति संतुलन का परिवर्तन होगा, जहाँ महिला केवल भागीदार नहीं बल्कि निर्णयकर्ता, निर्माता और नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित होगी, और यही एआई की वास्तविक सफलता होगी कि वह तकनीक को मानवता और समानता की दिशा में प्रयुक्त करे, क्योंकि जब महिला सशक्त होती है तो समाज सशक्त होता है और जब समाज सशक्त होता है तो राष्ट्र प्रगतिशील बनता है।

संजीव ठाकुर

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