मुफ्त की योजनाओं की लक्ष्मण रेखा तय करे सुप्रीम कोर्ट

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देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा हाल ही में चुनावों से पूर्व राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता प्राप्ति के लिए मतदाताओं को आकर्षित करने हेतु घोषित लोकलुभावन मुफ्त योजनाओं की कड़ी आलोचना की गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रश्न उठाया है कि आखिर यह “मुफ्त की योजना” वाली संस्कृति कब तक चलती रहेगी ? न्यायालय की यह चिंता राष्ट्रहित में अत्यंत उचित है, क्योंकि आज देश के अधिकांश राज्यों में मुफ्त योजनाओं के सहारे सरकार बनाने की परंपरा सी बन चुकी है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य ऐसा बन गया है कि कोई भी दल बिना मुफ्त की रेवड़ियां बाँटे केवल अपने विकास कार्यों के आधार पर चुनाव लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता।

परिणामस्वरूप, सरकारें जनहित के विकास कार्यों पर व्यय होने वाले धन को मुफ्त योजनाओं के वादों को पूरा करने में खर्च कर देती हैं। इससे विकास कार्य या तो धनाभाव में रुक जाते हैं अथवा समय पर पूर्ण नहीं हो पाते। मुफ्त योजनाओं के बढ़ते बोझ के कारण राज्य सरकारों को बार-बार करोड़ों रुपये का कर्ज लेना पड़ता है। अनेक राज्य पहले से ही राजस्व घाटे में चल रहे हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि मुफ्त योजनाओं पर खर्च किया जाने वाला धन अंततः करदाताओं की गाढ़ी कमाई का ही होता है।

राजनीतिक दलों की लोकलुभावन घोषणाओं का बोझ अंततः आम नागरिकों पर ही पड़ता है । सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि मुफ्त योजनाओं का लाभ केवल वास्तविक जरूरतमंदों को मिलना चाहिए, न कि सक्षम और संपन्न वर्ग को। दुर्भाग्यवश, अनेक योजनाओं का बड़ा हिस्सा उन लोगों तक पहुँच जाता है जिन्हें उसकी वास्तविक आवश्यकता नहीं है, जबकि सचमुच जरूरतमंद आज भी सहायता के अभाव में संघर्ष करते दिखाई देते हैं।

मुफ्त योजनाओं की बढ़ती प्रवृत्ति का एक सामाजिक दुष्प्रभाव भी सामने आ रहा है। जब बिना श्रम के लाभ मिलने लगता है, तो परिश्रम की भावना कमजोर पड़ने का खतरा उत्पन्न होता है। भारत सदैव से मेहनतकश और श्रमजीवी लोगों का देश रहा है। हमारे पूर्वजों ने अपने परिश्रम और स्वावलंबन की परंपरा से विश्व को प्रेरित किया है। ऐसे में मुफ्त की संस्कृति का अत्यधिक विस्तार चिंतन का विषय है । राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे मुफ्त योजनाओं के स्थान पर ऐसी दीर्घकालिक और सुनियोजित नीतियाँ बनाएँ, जो स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन करें और लोगों को आत्मनिर्भर बनाएँ। यदि नागरिक अपने श्रम के बल पर जीवन स्तर सुधारेंगे, तो राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ होगी। 

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हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की  एक पीठ, जिसमें मुख्य न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त की । न्यायालय का यह दृष्टिकोण सराहनीय है कि कल्याणकारी योजनाएं और चुनावी प्रलोभन इन दोनों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया जाना चाहिए। यह भी चिंताजनक है कि मुफ्त की योजनाओं के कारण समाज में श्रम के प्रति अरुचि का भाव पनपने लगा है। यदि सरकारें बिना श्रम के संसाधन उपलब्ध कराती रहेंगी, तो आत्मनिर्भरता की भावना कमजोर पड़ेगी। भारत के मेहनतकश और श्रमजीवी लोगों ने अपने परिश्रम और उद्यमिता से विश्व में पहचान बनाई है। ऐसे में परिश्रम के स्थान पर निर्भरता की संस्कृति को बढ़ावा देना दूरगामी दृष्टि से घातक सिद्ध हो सकता है।

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आज स्थिति यह हो गई है कि सरकारें स्वयं की गई घोषणाओं के बोझ तले दबती जा रही हैं। यदि कोई सरकार मुफ्त योजनाओं में कटौती करने का प्रयास करती है, तो विपक्ष इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर और अधिक मुफ्त योजनाओं की घोषणा कर सत्ता परिवर्तन का प्रयास करता है। सत्ता खोने के भय से कोई भी दल इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का साहस नहीं जुटा पाता । ऐसे में देश की सर्वोच्च संस्था के रूप में सर्वोच्च न्यायालय से अपेक्षा है कि वह मुफ्त योजनाओं की एक स्पष्ट “लक्ष्मण रेखा” निर्धारित करे। यदि कोई राजनीतिक दल मतदाताओं को अव्यावहारिक और आर्थिक रूप से अस्थिर करने वाली मुफ्त योजनाओं का प्रलोभन देकर चुनाव जीतने का प्रयास करता है, तो उसके विरुद्ध कठोर दिशा-निर्देश और वैधानिक प्रावधान होने चाहिए।

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यदि भारत को आर्थिक रूप से सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाना है, तो मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन राजनीति के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का अर्थ अंधाधुंध मुफ्त वितरण नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण, लक्षित और टिकाऊ विकास होना चाहिए। अब समय आ गया है कि राष्ट्रहित में इस विषय पर ठोस और दूरदर्शी निर्णय लिए जाएँ और मुफ़्त कि योजनाओ पर लक्ष्मण रेखा खीच कर उसका पालन सभी राजनीतिक दलों से कढ़ाई से करवाया जाए !

अरविंद रावल

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