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मद्रास हाईकोर्ट में रिश्वत के आरोपों पर बड़ी कार्रवाई: 50 लाख रुपये लेने के मामले की सतर्कता जांच के आदेश
113 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का आरोप हाईकोर्ट की सतर्कता शाखा प्रारंभिक जांच करेगी, वरिष्ठ अधिवक्ता ने रिश्वत के नाम पर धन लिया,
चेन्नई।
Madras High Court ने एक वरिष्ठ अधिवक्ता पर जज को रिश्वत देने के नाम पर 50 लाख रुपये लेने के गंभीर आरोपों के मामले में सतर्कता जांच के आदेश दिए हैं। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए न्यायमूर्ति निरमल कुमार ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया और प्रकरण को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया।
यह मामला ऑल इंडिया लॉयर्स एसोसिएशन फॉर जस्टिस (AILAJ) द्वारा दायर प्रतिवेदन के आधार पर सामने आया। संगठन ने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपने मुवक्किल से यह कहकर 50 लाख रुपये लिए कि यह राशि जज को देकर अनुकूल आदेश पारित कराया जाएगा। आरोप है कि धनराशि लेने के बावजूद कोई आदेश पारित नहीं हुआ।
न्यायालय का रुख
न्यायमूर्ति निरमल कुमार ने अपने आदेश में कहा कि लगाए गए आरोप “विशिष्ट और गंभीर प्रकृति” के हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने माना कि निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए मामले को हाईकोर्ट की सतर्कता शाखा को सौंपना आवश्यक है।
इसी आधार पर उन्होंने:
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स्वयं को सुनवाई से अलग किया,
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मामले को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया,
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तथा उचित पीठ गठित कर जांच कराने की सिफारिश की।
किस याचिका से जुड़ा है मामला
यह विवाद एन. गणेश अग्रवाल द्वारा दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका से जुड़ा है। अग्रवाल ने:
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Central Bureau of Investigation (CBI) मामलों की विशेष अदालत द्वारा उनकी आरोपमुक्ति याचिका खारिज किए जाने,
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और उनके विरुद्ध दाखिल आरोपपत्र,
को रद्द करने की मांग की थी।
यह मामला Metal and Minerals Trading Corporation of India (MMTC) से जुड़ा है।
113 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का आरोप
एन. गणेश अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने वर्ष 2008-09 के दौरान:
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विदेशी मुद्रा (रुपये और डॉलर) के उतार-चढ़ाव में सट्टा लगाया,
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बायर्स क्रेडिट योजना के तहत की गई खरीद में पर्याप्त सुरक्षा नहीं ली,
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और आपराधिक साजिश के माध्यम से MMTC को लगभग 113.38 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया।
इसी मामले में उन्हें राहत दिलाने के नाम पर कथित रूप से रिश्वत की मांग किए जाने का आरोप लगाया गया।
मंत्रालय से आया था प्रतिवेदन
5 फरवरी को प्रस्तावित सुनवाई से पहले हाईकोर्ट रजिस्ट्री को Ministry of Law and Justice से एक पत्र प्राप्त हुआ था, जिसमें AILAJ का प्रतिवेदन संलग्न था। इसी पत्र के माध्यम से यह मामला औपचारिक रूप से न्यायालय के संज्ञान में आया।
प्रतिवेदन में कहा गया था कि:
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वरिष्ठ अधिवक्ता ने रिश्वत के नाम पर धन लिया,
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लेकिन न तो आदेश दिलवाया गया,
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न ही राशि लौटाई गई।
अधिवक्ता का पक्ष
जब अदालत ने संबंधित वरिष्ठ अधिवक्ता से स्पष्टीकरण मांगा, तो उन्होंने:
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सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया,
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किसी भी तरह की जांच में सहयोग का आश्वासन दिया।
वहीं, विशेष लोक अभियोजक ने दलील दी कि इस तरह के आरोपों पर खुले मंच पर चर्चा करने से न्यायपालिका की गरिमा प्रभावित हो सकती है।
प्रासंगिक न्यायिक दृष्टांत (Case Law)
इस मामले में न्यायालय का रुख पूर्व में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप माना जा रहा है।
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K. Veeraswami बनाम भारत संघ (1991)
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि न्यायाधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच विशेष सावधानी और संस्थागत प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए। -
C. Ravichandran Iyer बनाम जस्टिस ए.एम. भट्टाचार्य (1995)
इस मामले में अदालत ने “इन-हाउस प्रक्रिया” को मान्यता दी, जिसके तहत न्यायपालिका अपने स्तर पर आरोपों की प्रारंभिक जांच कर सकती है।
इन्हीं सिद्धांतों के तहत मद्रास हाईकोर्ट ने मामले को सतर्कता शाखा को सौंपने का निर्णय लिया है।
न्यायिक पारदर्शिता पर प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश न्यायपालिका की निष्पक्षता बनाए रखने की दिशा में अहम कदम है। किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोपों की स्वतंत्र जांच से जनता का भरोसा मजबूत होता है।
आगे की प्रक्रिया
अब इस मामले में:
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हाईकोर्ट की सतर्कता शाखा प्रारंभिक जांच करेगी,
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अपनी रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को सौंपेगी,
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रिपोर्ट के आधार पर अनुशासनात्मक या कानूनी कार्रवाई तय होगी।
जांच पूरी होने तक मूल याचिका पर सुनवाई स्थगित रहने की संभावना है।
यह मामला न केवल एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा है, बल्कि न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता से भी संबंधित है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस जांच के निष्कर्षों पर पूरे देश की नजर रहेगी।
Source Livelaw

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