ए आई के दुरुपयोग का शिकार होते दुनियाभर के मासूम बच्चे

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मानव जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए विकसित की गई वैज्ञानिक तकनीक जहाँ एक ओर वरदान सिद्ध हुई हैवहीं इसके दुरुपयोग ने अनेक नई चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। संचार क्षेत्र में आई मोबाइल क्रांति इसका ताजा उदाहरण है। स्मार्टफोन ने दुनिया की दूरियाँ समाप्त कर लोगों को एक-दूसरे से जोड़ालेकिन यही तकनीक अब पारिवारिक और सामाजिक दूरियाँ बढ़ाने के साथ-साथ नई पीढ़ी के लिए गंभीर खतरे भी पैदा कर रही है । इसी खतरे का एक नया रूप आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक का दुरुपयोग है। यूनिसेफ और इंटरपोल द्वारा तैयार एक हालिया रिपोर्ट के अनुसारकेवल एक वर्ष में दुनियाभर के बारह लाख से अधिक बच्चे डीपफेक तकनीक के शिकार हुए हैं। एशिया और अफ्रीका के ग्यारह देशों पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि ए आई के गलत इस्तेमाल से विशेष रूप से लड़कियों की तस्वीरों को अश्लील रूप में परिवर्तित किया जा रहा है।

एआई की फेस स्वैपिंग तकनीक के माध्यम से किसी भी व्यक्ति के चेहरे को दूसरे फोटो या वीडियो पर आसानी से लगाया जा सकता हैजबकि न्यूडिफिकेशन तकनीक तस्वीरों को अश्लील रूप देने में इस्तेमाल हो रही है। इसके अतिरिक्त वॉयस क्लोनिंग तकनीक किसी भी व्यक्ति की आवाज की हूबहू नकल कर नकली ऑडियो संदेश तैयार करने में सक्षम है। इन तकनीकों का उपयोग कर बनाए गए नकली ऑडियो-वीडियो और तस्वीरों को डीपफेक” कहा जाता हैजिनकी पहचान करना जांच एजेंसियों के लिए भी अत्यंत कठिन होता जा रहा है । रिपोर्ट के अनुसारडीपफेक के मामलों में 65 प्रतिशत से अधिक पीड़ित लड़कियां हैं। चिंता की बात यह भी है कि दुनिया के अधिकांश देशों में ए आई के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त कानून अभी तक नहीं बने हैं। बहुत कम देशों जैसे भारतअमेरिका और ब्रिटेन में बाल शोषण से संबंधित सामग्री को देखना या रखना अपराध की श्रेणी में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। कानूनों की कमी के कारण इंटरनेट पर बड़ी मात्रा में डीपफेक आधारित अश्लील सामग्री तेजी से फैल रही है।

एआई तकनीक निस्संदेह कंप्यूटर विज्ञान की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हैजो मशीनों को सीखनेनिर्णय लेने और जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता प्रदान करती है तथा शिक्षास्वास्थ्य और शोध के क्षेत्र में अनेक सकारात्मक संभावनाएँ खोलती है। किंतु इसका अनियंत्रित और अनैतिक उपयोग दुनिया के मासूम बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है । अतः संयुक्त राष्ट्रवैश्विक संगठनों तथा सभी देशों की सरकारों को मिलकर ए आई के दुरुपयोग को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कठोर कानून बनाने और उनके प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा विज्ञान की यही तकनीकजो मानवता के लिए वरदान बन सकती हैमासूम बच्चों की खुशियों और सुरक्षित भविष्य को निगलने वाली अभिशाप सिद्ध हो सकती है।

अरविंद रावल

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