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मानव चेतना का उत्कर्ष: आध्यात्मिक जागरण और सामाजिक समरसता
भौतिक संपदा की प्रचुरता के बीच मानवीय संवेदनाओं का अकाल एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है
प्रो.(डा) मनमोहन प्रकाश
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भौतिक संपदा की प्रचुरता के बीच मानवीय संवेदनाओं का अकाल एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। आज की महती आवश्यकता केवल सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि नहीं, बल्कि व्यक्ति को प्रबुद्ध मनुष्य, समाज को संवेदनशील इकाई और विश्व को शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में रूपांतरित करने की है।मानव जीवन मात्र दैहिक क्षुधा की तृप्ति या लोलुपतापूर्ण भौतिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं है। मनुष्य की वास्तविक श्रेष्ठता उसकी परिष्कृत चेतना में अंतर्निहित है।
यही चेतना तर्क से विवेक की ओर ले जाती है। जब यह संकीर्ण स्व की परिधि को लांघकर सर्व के कल्याण हेतु प्रवाहित होती है, तभी मानव चेतना का सच्चा उत्कर्ष प्रकट होता है।चेतना का ऊर्ध्वगमन आकस्मिक घटना नहीं, अपितु सतत स्व-साधना है। इसका प्रारंभ आत्मबोध से होता है। सुकरात के "स्वयं को जानो" से लेकर उपनिषदों के "तत् त्वम् असि" तक, सभी महापुरुषों ने आध्यात्मिक जागरण पर बल दिया है। यांत्रिकता का परित्याग कर जब मनुष्य अस्तित्वपरक प्रश्न करता है, तब विवेक जागृत होता है। यही विवेक जैविक दासता और आवेगों से मुक्ति देकर उद्देश्यपूर्ण जीवन प्रदान करता है।प्रगति के पथ पर मूल्यबोध महत्वपूर्ण चरण है। सत्य, करुणा, अपरिग्रह और न्याय जैसे शाश्वत मूल्य सामाजिक मेरुदंड हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन ने ठीक कहा था कि "धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा।"
तकनीकी प्रगति और नैतिक मूल्यों का समन्वय ही विनाशकारी विकास को कल्याणकारी सभ्यता में बदल सकता है।संकीर्ण पहचानें जैसे भाषा, जाति, उग्र राष्ट्रवाद या सांप्रदायिकता आदि चेतना को कुंठित कर पृथकतावाद की ओर धकेलती हैं। विविधता में एकता का बोध चेतना को वैश्विक विस्तार देता है। भारतीय मनीषा का "वसुधैव कुटुम्बकम्" आध्यात्मिक जागरण की पराकाष्ठा है, जहाँ परायापन समाप्त होकर ब्रह्मांड एक परिवार प्रतीत होता है।चेतना का उत्कर्ष दार्शनिक विमर्श से नहीं, निष्काम कर्मयोग से सिद्ध होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता सिखाती है कि जब व्यक्ति अपनी सामर्थ्य वंचितों के सशक्तिकरण में लगाता है, तो अहं करुणा में विलीन हो जाता है। यही व्यष्टि का समष्टि में विलय है, जो सामाजिक समरसता की नींव रखता है।सूचना विस्फोट के युग में हम डेटा से परिपूर्ण होते जा रहे हैं, किंतु प्रज्ञा से रिक्त। ऐसे समय में शिक्षा का लक्ष्य जीविकोपार्जन न होकर शील और चरित्र निर्माण होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, "शिक्षा मनुष्य में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।"सच्ची उन्नति अंतर्मुखी है। आंतरिक द्वंद्व शांत होकर जब प्रज्ञा प्रज्वलित होती है, तब व्यक्ति और समाज दोनों शांति एवं दिव्यता अनुभव करते हैं। चेतना का यह उत्कर्ष ही आध्यात्मिक जागरण से उपजी सामाजिक समरसता की गारंटी है।

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