राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल संगठन नहीं एक परिवार है

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज शताब्दी वर्ष मना रहा है संघ को जो लोग समाचार पत्रों से टेलीविजन से एवं अन्यान्य लोगों से सुनते और समझते हैं उन्हें संघ केवल एक हिन्दुओं का संगठन समझ में आता होगा लेकिन जब आप संघ में आकर, जुड़कर साथ मिलकर काम करेंगे तो ध्यान में आएगा कि मैं एक संगठन से ही नहीं बल्कि एक परिवार से भी जुड़े हैं। इस विषय में मैं अपना स्वयं का अनुभव भी साझा कर रहा हूं - मेरी संघ आयु लगभग 20 वर्ष हो रही है मैं संघ में सामान्य स्वयंसेवक, गटनायक, गणशिक्षक, मुख्य शिक्षक से लेकर विस्तारक और जिला प्रचारक तक के सघन दायित्वों का निर्वहन करते हुए आज भी सक्रिय दायित्व में रहकर काम कर रहा हूं। हमको जब कभी जहां संघ का कार्य करने का अवसर मिला, नए - नए क्षेत्रों में गया, नए - नए स्वयंसेवकों से मिला हमे सभी जगह अपनापन मिला, एक परिवार जैसा भाव मिला।

संघ में एक व्यवस्था के नाते कोई अधिकारी है तो कोई सामान्य कार्यकर्ता बस वास्तव में है तो सभी भाई साहब ही। संघ में प्रत्येक स्वयंसेवक की संभाल व देखरेख, शारीरिक और बौद्धिक , चारित्रिक प्रशिक्षण परिवार भावना से किया जाता है। मेरा आठ वर्ष का प्रचारक जीवन रहा है मै नए स्थानों पर काम करने गया। नए पुराने स्वयंसेवकों से मिला सभी ने मुझे पुत्रवत, भातृत्व स्नेह दिया, कभी यह नहीं लगा कि हम अपने परिवार से दूर हैं। संघ में अधिकारी और स्वयंसेवक के बीच कोई अंतर नहीं रहता बस यही लगता है कि भाई साहब हमारे परिवार के मुखिया हैं। स्वयंसेवक का परिवार बिल्कुल अपना परिवार जैसा ही लगता है।

मैं यहां एक घटना की भी चर्चा करूंगा - इसी लखनऊ पश्चिम भाग में मै मालवीय नगर में विस्तारक था एक दिन शाम को शाखा के बाद रात्रि भोजन पर नगर कार्यवाह श्री विनय जी के यहां भोजन पर गया उसी समय मुझे तेज बुखार आ गया, भोजन करना भी कठिन हो गया तुरन्त नगर कार्यवाह जी ने बुखार नापा और दवाई दी अपने यहां ही रुकने का आग्रह किया मैने कहा कि कार्यालय ही रुकेंगे उन्होंने रात में ही कार्यालय भारती भवन राजेन्द्र नगर में छोड़ गए और प्रातः ही आकर फिर हाल चाल लिया व दवाई इत्यादि की व्यवस्था की। अब यह भाव केवल संघ में ही देखने को मिलते हैं।  सन २०२० में प्रचारक जीवन से वापस लौट आने के बाद भी हमारे सभी स्वयंसेक परिवारिक वातावरण के साथ आज भी मिलते हैं।

हम जब बाहर के अन्य संगठनों को देखते हैं तो वहां कहीं न कहीं स्वार्थ, राजनैतिक महत्वाकांक्षा, पद का मोह दिखाई पड़ता है लेकिन संघ विशुद्ध पारिवारिक संगठन है। अभी ९ माह पूर्व मेरी मेरी धर्म पत्नी शिविल हॉस्पिटल लखनऊ में एडमिट थी मैने संकोच बस किसी को नहीं बताया कि सभी परेशान होंगे, लेकिन किसी तरह हमारे स्वयंसेवकों को पता चला तो सभी कार्यकर्ताओं ने हाथों हांथ लिया। भोजन आदि की व्यवस्था भी किया रोज कोई न कोई स्वयंसेवक दोनों समय का भोजन हॉस्पिटल पहुंचा जाता।

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अब यही भाव ही परिवार भाव है। संघ में हम लोग गीत भी गाते हैं कि शुद्ध सात्विक प्रेम अपने कार्य का आधार है..... मेरा समाज के लोगों से आग्रह है कि संघ को साहित्य से पढ़कर नहीं समझा जा सकता संघ जानना है तो शाखा में आइए। संघ जैसा दुनियां में कोई नहीं.... संघ के अपने अनुभव को शब्दों में लिख पाना बहुत मुश्किल है। अबिगत- गति कछु कहत न आवै। ज्यों गूँगे मीठे फल कौ रस अंतरगत ही भावै।।

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बालभास्कर मिश्र

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