ईरान के गर्ल्स स्कूल पर हमला मानवता के विरुद्ध अपराध और वैश्विक अंतरात्मा की पुकार

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दक्षिणी ईरान के एक गर्ल्स स्कूल पर हुआ हवाई हमला पूरी दुनिया को झकझोर देने वाला है। मासूम बच्चियों की मौत ने युद्ध की भयावहता को एक बार फिर दुनिया के सामने रख दिया है। इस घटना की गूंज केवल ईरान या मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानवता की अंतरात्मा को झकझोरने वाली त्रासदी बन चुकी है। जब युद्ध की आग में निर्दोष बच्चों की जान जाती है तो वह केवल एक देश की नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता की हार होती है।
 
इस घटना के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोकर तुर्क  ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस मामले की जल्द निष्पक्ष और पूरी जांच होनी चाहिए। जिनेवा में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की प्रवक्ता रवीना शामनाशादी ने भी कहा कि जिस पक्ष ने हमला किया है उसी की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी जांच सुनिश्चित करे और सच्चाई दुनिया के सामने लाए। उनका यह बयान अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों के सिद्धांतों की याद दिलाता है जिनका पालन हर परिस्थिति में अनिवार्य है चाहे हालात कितने भी तनावपूर्ण क्यों न हों।
 
बताया जा रहा है कि हमले में 150 छात्राओं की मौत हुई है और मिनाब शहर में उनके अंतिम संस्कार के लिए सामूहिक कब्रें खोदी गईं। यह दृश्य केवल ईरान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए पीड़ा का कारण है। नन्हीं बच्चियों के ताबूतों के सामने खड़े परिजन और रोते बिलखते परिवार इस बात का प्रमाण हैं कि युद्ध का सबसे बड़ा खामियाजा हमेशा आम नागरिक और मासूम बच्चे ही भुगतते हैं। सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों ने इस त्रासदी को और भी वास्तविक और भयावह बना दिया है। हर तस्वीर युद्ध की निर्ममता और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण की कहानी कहती है।
 
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि अमेरिकी सेना जानबूझकर किसी स्कूल को निशाना नहीं बनाती। वहीं इजराइल की ओर से भी कहा गया है कि इस घटना की जांच की जा रही है। इन बयानों के बीच सच्चाई क्या है यह एक निष्पक्ष और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा। युद्ध के दौरान अक्सर सूचनाएं और दावे एक दूसरे से टकराते हैं लेकिन सच्चाई तक पहुंचना ही न्याय की पहली शर्त है।
 
यह हमला ऐसे समय में हुआ जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इस अभियान को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया गया है। दोनों पक्षों के बीच मिसाइल और ड्रोन हमलों का सिलसिला जारी है। ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है और क्षेत्रीय तनाव चरम पर है। ऐसे माहौल में एक स्कूल पर हमला केवल सैन्य रणनीति का सवाल नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन का गंभीर आरोप बन जाता है।
 
युद्ध के नियम स्पष्ट हैं कि स्कूल अस्पताल और नागरिक ठिकाने संरक्षित क्षेत्र माने जाते हैं। यदि किसी भी कारण से इन पर हमला होता है तो उसकी गहन जांच आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी है कि वह भावनाओं से परे जाकर तथ्यों की पुष्टि करे और दोषियों को जवाबदेह ठहराए। यदि इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी साध ली जाती है तो यह भविष्य में और भी भयावह हमलों का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
 
दुनिया के विभिन्न देशों से इस घटना पर शोक और आक्रोश व्यक्त किया गया है। मानवाधिकार संगठनों ने इसे निंदनीय बताया है और तत्काल युद्धविराम की मांग की है। बच्चों की मौत किसी भी राजनीतिक या सामरिक तर्क से उचित नहीं ठहराई जा सकती। चाहे कोई भी विचारधारा हो या कोई भी रणनीतिक लक्ष्य हो निर्दोषों की हत्या उसे नैतिक वैधता नहीं दे सकती।
 
इस त्रासदी ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या आधुनिक हथियारों और तकनीकी श्रेष्ठता के बावजूद हम मानवीय मूल्यों की रक्षा कर पा रहे हैं। यदि नहीं तो यह प्रगति अधूरी है। सभ्यता का वास्तविक पैमाना युद्ध में भी मानवता को जीवित रखना है। जब स्कूलों पर बम गिरते हैं तो यह केवल इमारतों का नहीं बल्कि भविष्य का विध्वंस होता है।
 
ईरान और इजराइल अमेरिका के बीच जारी संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी चिंता में डाल दिया है। तेल की कीमतों में उछाल और क्षेत्रीय असुरक्षा ने दुनिया को यह एहसास कराया है कि यह युद्ध सीमित नहीं रहेगा। लेकिन इन भू राजनीतिक चिंताओं से परे एक सच्चाई यह है कि युद्ध की कीमत सबसे पहले और सबसे अधिक आम नागरिक चुकाते हैं।
 
स्कूल पर हमला केवल एक सैन्य घटना नहीं बल्कि मानवता की परीक्षा है। यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस पर एकजुट होकर निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित करता है तो यह भविष्य के लिए एक सकारात्मक संदेश होगा। अन्यथा यह घटना इतिहास के उन काले अध्यायों में दर्ज हो जाएगी जहां निर्दोषों का खून न्याय की प्रतीक्षा करता रह गया।
 
आज पूरी दुनिया उन बच्चियों के लिए आंसू बहा रही है जिनके सपने अधूरे रह गए। वे डॉक्टर बनना चाहती थीं शिक्षक बनना चाहती थीं या शायद केवल अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन जीना चाहती थीं। उनकी हंसी और खिलखिलाहट अब केवल यादों में रह गई है। यह क्षति अपूरणीय है।
 
ऐसे समय में सबसे बड़ी आवश्यकता है संयम संवाद और शांति की दिशा में ठोस पहल की। युद्ध से कभी स्थायी समाधान नहीं निकलता। हिंसा का हर दौर नई हिंसा को जन्म देता है। यदि इस त्रासदी से भी दुनिया सबक नहीं लेती तो भविष्य और भी भयावह हो सकता है।
 
इसलिए यह आवश्यक है कि इस हमले की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच हो दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए। मानवता की रक्षा केवल शब्दों से नहीं बल्कि ठोस कदमों से होगी। नन्हीं बच्चियों की याद में यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी कि दुनिया एक ऐसी व्यवस्था बनाने का संकल्प ले जहां स्कूल कभी युद्ध का निशाना न बनें और बच्चों का भविष्य सुरक्षित रहे।
 
कांतिलाल मांडोत

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