विश्व शान्ति का दिव्यास्त्र अहिंसा

यही कारण है कि आज संसार के अनेक हिस्सों में अशान्ति का वातावरण दिखाई देता है

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मानव सभ्यता का इतिहास जितना पुराना है उतना ही पुराना संघर्ष और हिंसा का इतिहास भी है। मनुष्य ने विज्ञान में प्रगति की है तकनीक में उन्नति की है और आकाश से लेकर समुद्र की गहराइयों तक अपने कदम बढ़ा दिए हैं। परन्तु एक सत्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था कि यदि मानव के भीतर करुणा और अहिंसा नहीं है तो उसकी सारी प्रगति अधूरी है। आज विश्व के अनेक देशों में युद्ध और संघर्ष का वातावरण बना हुआ है। बड़े राष्ट्र अपनी शक्ति और प्रभुत्व दिखाने के लिए छोटे देशों पर दबाव बना रहे हैं। परिणाम यह हो रहा है कि निर्दोष लोगों का जीवन संकट में पड़ गया है और मानवता पीड़ा से कराह रही है। ऐसे समय में संसार को यदि कोई सच्चा मार्ग दिखा सकता है तो वह है अहिंसा का मार्ग।
 
मानव जीवन में धर्म का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है। धर्म केवल पूजा पाठ या किसी विशेष सम्प्रदाय का नाम नहीं है बल्कि वह जीवन की वह चेतना है जो मनुष्य को मानव बनाती है। धर्म हमें संयम सिखाता है करुणा सिखाता है और दूसरों के जीवन के प्रति सम्मान करना सिखाता है। जब मनुष्य धर्म से दूर हो जाता है तब उसके जीवन में स्वार्थ अहंकार और हिंसा का प्रवेश हो जाता है। यही कारण है कि आज संसार के अनेक हिस्सों में अशान्ति का वातावरण दिखाई देता है।
 
अहिंसा को भारतीय संस्कृति ने सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्वीकार किया है। अहिंसा का अर्थ केवल किसी को शारीरिक रूप से चोट न पहुँचाना ही नहीं है बल्कि किसी भी प्राणी के प्रति मन वचन और कर्म से पीड़ा न पहुँचाना भी है। यह एक ऐसी भावना है जो मानव के भीतर दया और प्रेम का विस्तार करती है। जब मनुष्य अपने भीतर करुणा को जगाता है तब उसके भीतर से क्रोध और घृणा स्वतः समाप्त होने लगती है।
 
इतिहास इस बात का साक्षी है कि हिंसा ने कभी भी स्थायी समाधान नहीं दिया। युद्ध चाहे किसी भी कारण से किया गया हो उसका परिणाम केवल विनाश ही रहा है। युद्ध में केवल सैनिक ही नहीं मरते बल्कि असंख्य निर्दोष नागरिक भी अपनी जान गंवा देते हैं। बच्चों का बचपन छिन जाता है माताओं की गोद सूनी हो जाती है और पूरे समाज की खुशियाँ समाप्त हो जाती हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद भी उसके घाव वर्षों तक समाज को पीड़ा देते रहते हैं।
 
आज दुनिया के कई देशों में युद्ध की आग जल रही है। कहीं सीमा विवाद के नाम पर संघर्ष हो रहा है तो कहीं सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। बड़े देश अपनी सैन्य शक्ति और आर्थिक ताकत के बल पर छोटे देशों को दबाने की कोशिश करते हैं। यह प्रवृत्ति मानवता के लिए अत्यन्त खतरनाक है। जब शक्तिशाली राष्ट्र अपने अहंकार में आकर कमजोर देशों पर आक्रमण करते हैं तो उसका सबसे अधिक दुष्परिणाम उन निर्दोष लोगों को भुगतना पड़ता है जिनका उस संघर्ष से कोई सम्बन्ध ही नहीं होता।
 
युद्ध में मरने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी का बेटा होता है किसी का पिता होता है और किसी का जीवन साथी होता है। जब बम और मिसाइलें गिरती हैं तो वे केवल भवनों को ही नष्ट नहीं करतीं बल्कि हजारों सपनों को भी मिटा देती हैं। युद्ध की विभीषिका से केवल सैनिक ही नहीं बल्कि सामान्य नागरिक भी प्रभावित होते हैं। भूख गरीबी और विस्थापन जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं और पूरा समाज संकट में घिर जाता है।
 
मानवता के लिए यह अत्यन्त पीड़ादायक स्थिति है कि आज भी दुनिया में समस्याओं का समाधान हिंसा और युद्ध के माध्यम से खोजा जा रहा है। जबकि इतिहास बार बार यह सिद्ध कर चुका है कि हिंसा से केवल हिंसा ही जन्म लेती है। जब एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण करता है तो प्रतिशोध की भावना जन्म लेती है और संघर्ष की श्रृंखला लम्बी होती चली जाती है। इस प्रकार हिंसा का यह चक्र कभी समाप्त नहीं होता।
 
ऐसे समय में संसार को अहिंसा के मार्ग की ओर लौटने की आवश्यकता है। अहिंसा केवल एक आदर्श नहीं बल्कि एक शक्तिशाली नीति है जो समाज को स्थायी शान्ति की ओर ले जा सकती है। भारत के महान नेता महात्मा गांधी ने इसी अहिंसा के मार्ग को अपनाकर विश्व को एक नई दिशा दी थी। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि बिना हथियार उठाए भी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया जा सकता है और सत्य तथा अहिंसा के बल पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
 
अहिंसा का मार्ग साहस और धैर्य का मार्ग है। यह कमजोर लोगों का नहीं बल्कि महान आत्मबल वाले लोगों का मार्ग है। जो व्यक्ति या राष्ट्र अपने भीतर आत्मविश्वास और नैतिक शक्ति रखते हैं वही अहिंसा को अपनाने का साहस कर सकते हैं। अहिंसा हमें यह सिखाती है कि किसी भी समस्या का समाधान संवाद और समझदारी से किया जा सकता है।
 
विश्व के सभी देशों को यह समझना होगा कि युद्ध और हथियारों की दौड़ से किसी का भला नहीं होने वाला। यदि मानवता को सुरक्षित रखना है तो राष्ट्रों को परस्पर विश्वास और सहयोग की भावना विकसित करनी होगी। शक्ति का उपयोग विनाश के लिए नहीं बल्कि मानव कल्याण के लिए होना चाहिए।आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व के नेता और समाज के बुद्धिजीवी मिलकर शान्ति का संदेश फैलाएँ। शिक्षा और संस्कार के माध्यम से नई पीढ़ी को यह सिखाया जाए कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। जब तक मानव के भीतर करुणा और सहानुभूति का भाव नहीं जागेगा तब तक शान्ति की स्थापना सम्भव नहीं है।
 
यदि मानव जाति को अपने भविष्य को सुरक्षित बनाना है तो उसे अहिंसा को अपनाना ही होगा। यही वह मार्ग है जो भय और संघर्ष से भरे संसार को शान्ति और सुख की ओर ले जा सकता है। हिंसा का मार्ग विनाश की ओर ले जाता है जबकि अहिंसा का मार्ग सृजन और विकास की ओर।इसलिए आज समय की पुकार है कि हम सब मिलकर अहिंसा के संदेश को स्वीकार करें और मानवता की रक्षा के लिए आगे आएँ। जब मनुष्य के हृदय में करुणा और प्रेम का दीपक जल उठेगा तब ही विश्व में सच्ची शान्ति स्थापित हो सकेगी। अहिंसा ही वह दिव्य शक्ति है जो युद्ध की आग को बुझाकर संसार को सुख और शान्ति का मार्ग दिखा सकती है।
 
कांतिलाल मांडोत

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