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बिहार में मजदूरों का लिंक्डइन?
हजारों परिवारों की जिंदगी बदलने वाली कहानी है।
महेन्द्र तिवारी
क्या मजदूरों का भी लिंक्डइन हो सकता है? ये सवाल सुनकर कई लोग आश्चर्य से भौहें चढ़ा लेंगे। लेकिन बिहार के दरभंगा जिले के चंद्रशेखर मंडल ने न सिर्फ ये सवाल उठाया, बल्कि इसे हकीकत में बदल दिया। हर सुबह शहरों के चौकों पर खड़े उन मजदूरों की तस्वीर देखिए हाथों में हथौड़ा, कुदाल या सिर्फ इंतजार। घंटों धूप में पसीना बहाते हैं, लेकिन काम किसी और को मिल जाता है। बिचौलिए बीच में आ जाते हैं, कमीशन काट लेते हैं, और मजदूर को मिलता है बस थोड़ा-सा पैसा और बहुत सारा अपमान।
चंद्रशेखर ने ये दर्दनाक हकीकत अपनी आंखों से देखी। उन्होंने तय किया अब ये बदलेगा। कोविड महामारी के उस काले दौर में, जब लाखों मजदूर शहरों से गांव लौट आए और भूखे पेट सोने को मजबूर हो गए, चंद्रशेखर ने 'डिजिटल लेबर चौक' नामक प्लेटफॉर्म लॉन्च किया। ये कोई साधारण ऐप नहीं, बल्कि उन अनगिनत हाथों की डिजिटल पहचान है, जो मेहनत तो करते हैं लेकिन सम्मान नहीं पाते। आज इस पहल से एक लाख से ज्यादा मजदूरों को काम मिल चुका है। ये सिर्फ नंबर्स नहीं, हजारों परिवारों की जिंदगी बदलने वाली कहानी है।
चंद्रशेखर मंडल का सफर खुद एक संघर्षपूर्ण गाथा है। दरभंगा के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले चंद्रशेखर ने कभी मजदूरों की पीड़ा को किताबों से नहीं सीखा, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में महसूस किया। बचपन से ही उन्होंने देखा कि कैसे उनके मोहल्ले के मजदूर सुबह चार बजे उठते, साइकिल पर लदकर शहर के चौक पहुंचते, लेकिन शाम को खाली हाथ लौट आते। 'काम मिलेगा या नहीं, ये भाग्य पर निर्भर था,' चंद्रशेखर बताते हैं। खुद आईटी बैकग्राउंड से आने वाले चंद्रशेखर ने कभी सोचा नहीं था कि उनका ज्ञान मजदूरों की भलाई के लिए काम आएगा। 2020 में लॉकडाउन लगा तो हालात और बिगड़ गए। प्रवासी मजदूर पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलकर बिहार लौटे। नौकरियां छूट गईं, ठेकेदार गायब हो गए। चंद्रशेखर ने सोचा, क्यों न एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाया जाए जो मजदूरों को ठेकेदारों से सीधे जोड़े? बिचौलिए खत्म हो जाएं, रेट्स पारदर्शी हों और काम घर बैठे मिले। इस विचार से 'डिजिटल लेबर चौक' का जन्म हुआ। शुरू में ये एक साधारण व्हाट्सएप ग्रुप था, लेकिन जल्दी ही इसे ऐप और वेबसाइट में बदल दिया गया।
डिजिटल लेबर चौक कैसे काम करता है, ये समझना आसान है। मजदूर मोबाइल पर ऐप डाउनलोड करते हैं, जो हिंदी और स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध है। वे अपनी प्रोफाइल बनाते हैं — नाम, उम्र, स्किल्स जैसे मिस्त्री, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, लोडर, पेंटर या निर्माण मजदूर। फोटो अपलोड करते हैं, अनुभव बताते हैं, लोकेशन चुनते हैं और उपलब्धता मार्क करते हैं। अब मजदूरों का अपना 'लिंक्डइन' तैयार! दूसरी तरफ ठेकेदार या मकान मालिक ऐप पर लॉगिन करते हैं।
उन्हें काम की डिटेल्स भरनी पड़ती हैं कितने मजदूर चाहिए, कौन-सी स्किल, कितने दिन का काम, कितना रेट। ऐप एल्गोरिदम मैच करता है और सही मजदूरों की लिस्ट भेजता है। ठेकेदार सीधे कॉल या चैट कर सकता है। कोई कमीशन नहीं, कोई बिचौलिया नहीं। काम पूरा होने पर दोनों पक्ष रिव्यू देते हैं, जो अगले काम के लिए प्रोफाइल को मजबूत बनाता है। पेमेंट डिजिटल होता है UPI से सीधे मजदूर के अकाउंट में। ये सिस्टम न सिर्फ समय बचाता है, बल्कि विश्वास भी बनाता है। दरभंगा के एक मजदूर रामविलास सिंह कहते हैं, 'पहले चौक पर लाइन लगानी पड़ती थी, लड़ाई-झगड़े होते थे। अब फोन पर काम आ जाता है। मेरी मासिक कमाई दोगुनी हो गई।'
इस प्लेटफॉर्म की सफलता के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। लॉन्च के दो सालों में ही एक लाख से ज्यादा मजदूर रजिस्टर हो चुके हैं। बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर से शुरू होकर ये पटना, मुजफ्फरपुर और यहां तक कि दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों तक फैल चुका है। रोजाना हजारों जॉब पोस्ट होते हैं छोटे मरम्मत के काम से लेकर बड़े कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स तक। कोविड के बाद जब कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री पटरी पर लौटी, तो डिजिटल लेबर चौक ने मजदूरों की कमी को पूरा किया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, 70 प्रतिशत यूजर्स ग्रामीण इलाकों से हैं, जो स्मार्टफोन क्रांति का फायदा उठा रहे हैं। चंद्रशेखर ने ट्रेनिंग कैंप भी लगाए, जहां बुजुर्ग मजदूरों को ऐप चलाना सिखाया गया। महिलाओं के लिए अलग सेक्शन है घरेलू कामगारों, धोबी या कढ़ाई करने वालों के लिए। ये प्लेटफॉर्म सिर्फ रोजगार नहीं देता, बल्कि स्किल डेवलपमेंट भी। ऐप पर फ्री ट्यूटोरियल वीडियो हैं सेफ्टी टिप्स, नई तकनीकें सीखने के लिए। एक मजदूर ने बताया, 'मैंने ऐप से वेल्डिंग सीखी और अब दोगुना रेट लेता हूं।'
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं रहीं। शुरू में इंटरनेट की कमी, स्मार्टफोन न होने की समस्या थी। चंद्रशेखर ने लोकल NGO के साथ मिलकर फ्री स्मार्टफोन डिस्ट्रीब्यूट किए। बिचौलिए खुश नहीं हुए उन्होंने विरोध किया, अफवाहें फैलाईं। लेकिन मजदूरों का समर्थन मिला। सरकार ने भी सराहना की। बिहार सरकार की 'डिजिटल बिहार' पहल से इसे बढ़ावा मिला। अब ये स्टार्टअप फंडिंग की तलाश में है, ताकि AI फीचर्स जोड़े जा सकें जैसे वॉयस सर्च हिंदी में या लोकेशन बेस्ड मैचिंग। चंद्रशेखर कहते हैं, 'हमारा सपना पूरे भारत को कवर करना है। हर मजदूर का डिजिटल चौक हो।'
ये कहानी सिर्फ चंद्रशेखर की नहीं, बल्कि उन अनाम नायकों की है जो देश की रीढ़ हैं। भारत में 50 करोड़ से ज्यादा अनौपचारिक मजदूर हैं। उनकी 90 प्रतिशत कमाई बिचौलियों के कारण कम हो जाती है। डिजिटल लेबर चौक जैसे प्लेटफॉर्म डिजिटल इंडिया को ग्रामीण स्तर पर साकार कर रहे हैं। ये साबित करता है कि तकनीक अमीरों तक सीमित नहीं। एक साधारण स्मार्टफोन हाथ में आ जाए, तो जिंदगी बदल सकती है।
महात्मा गांधी ने कहा था, 'भारत की आत्मा गांवों में बसती है।' चंद्रशेखर गांवों को डिजिटल बना रहे हैं। आज जब हम लिंक्डइन पर प्रोफेशनल्स देखते हैं, तो सोचिए मजदूरों का भी लिंक्डइन क्यों न हो? चंद्रशेखर ने दिखा दिया, ये मुमकिन है। उनकी ये पहल न सिर्फ आर्थिक सशक्तिकरण ला रही है, बल्कि सामाजिक सम्मान भी बहाल कर रही है। वो हाथ जो कभी अनदेखे थे, आज ऐप पर चमक रहे हैं। अगर आप भी कोई ठेकेदार हैं या मजदूर, तो digitallabourchowk.com पर विजिट करें। ये बदलाव की शुरुआत है एक ऐसे भारत की, जहां मेहनत का पूरा हक मिले। चंद्रशेखर मंडल जैसे योद्धा हमें सिखाते हैं कि समस्या जितनी बड़ी, समाधान उतना ही सरल हो सकता है। बस हिम्मत चाहिए, और थोड़ा सा डिजिटल जादू।


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