सामाजिक बदलाव में किताब की भूमिका' विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा विशेष व्याख्यान का आयोजन
सामाजिक चेतना के साथ किताबों ने अस्मिता और आकांक्षाओं का निर्माण किया है : प्रो. अर्चना
दया शंकर त्रिपाठी की रिपोर्ट
ब्यूरो प्रयागराज। आज इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. धीरेन्द्र वर्मा शताब्दी सभागार में विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया. जिसका विषय 'सामाजिक बदलाव में किताब की भूमिका' था. मुख्य वक्ता प्रो. अर्चना सिंह थी तथा अध्यक्षता हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. लालसा यादव ने की. मुख्य अतिथि के रुप में कला संकाय के डीन प्रो. वी. के. राय उपस्थित थे.कार्यक्रम का कुशल संचालन एवं प्रस्तावना डॉ. दीनानाथ मौर्य ने रखी , कार्यक्रम का संयोजन हिंदी विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. संतोष भदौरिया ने किया.
कार्यक्रम के प्रारम्भ में संयोजक प्रोफेसर संतोष भदौरिया ने एक परिचयात्मक वक्तव्य दिया। उन्होंने बताया कि सं 2024 में प्रेमचंद की जयंती पर 'किताबें कुछ कहना चाहती हैं 'पुस्तकालय की शुरुआत निजी प्रयास से हुई थी। पुस्तकालय का कुशल संचालन शोधार्थियों द्वारा अबाधित रूप से किया जाता रहा है। इस पुस्तकालय में सभी विधाओं की पुस्तकें उपलब्ध हैं। प्रोफेसर भदौरिया ने पुस्तकालय के लिए शुभचिंतक शिक्षकों व विद्यार्थियों का आभार ज्ञापित करने के क्रम में बताया कि प्रो.राजेंद्र कुमार ने पुस्तकालय हेतु किताबें दी
डॉ० सूर्यनारायण सिंह, डॉ० दीनानाथ मौर्य, प्रो.अब्दुल बिस्मिल्लाह, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री असरार गाँधी, श्री संजय पाण्डेय डॉ० जनार्दन आदि ने लाइब्रेरी के लिए बहुमूल्य पुस्तकें तथा मेरे शोध छात्र डॉ० अम्बरीश शुक्ल ने उन्हें सहेजने के लिए आलमारी भेंट की। शोध छात्रा उजाला यादव ने हाल ही में लगभग पांच हजार की नई किताबें भेंट की। प्रदर्शनी सहयोग के लिए प्रोफेसर भदौरिया ने अनु प्रिया , हरिओम कुमार,अभिषेक, धर्मवीर, जगदीश, सोम, रिया, पारस, ज्योति, श्वेता, सृष्टि, पारस के कार्य को सराहा।
तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय कला संकाय के डीन एवं कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो० वी के राय नेकहा कि दरअसल किताबें जो कहना चाहती हैं और प्रदर्शनी जो कहना चाहती हैं उन दोनों में एक तारतम्यता है। किताबें हमारी सोच को विकसित करने, हमारी काया को अमूर्त से मूर्त रूप देने का कार्य करती हैं। किताबें क्या कहना चाहती हैं इस बात का उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “किताबें कहना चाहती हैं कि यदि तुम मेरे पास आओगे तो मैं तुम्हारे जीवन का दिशा निर्देश करूंगी।” प्रो० वी के राय के अनुसार बड़े सा बड़ा बदलाव लाने में किताबें सक्षम हैं। हमारी सोच में परिवर्तन उसमें क्रांतिकारी भावना लाने का काम भी किताबें करती आ रही हैं। वे अपनी बात को उदाहरण द्वारा पुष्ट करते हुए कहते हैं कि हिंद स्वराज जो 1909 में लिखी गई, उसका स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक प्रभाव पड़ा। इस दृष्टि से पुस्तकें संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम हैं।
विशेष व्याख्यान की मुख्य वक्ता प्रो. अर्चना सिंह ने कहा कि समाज के बदलाव में किताबों ने बड़ी भूमिका निभाई है। वह सामाजिक परिवर्तन में किताबों की भूमिका एवं महत्व पर अपनी राय रखते हुए कहती हैं कि निश्चित ही इस सामाजिक परिवर्तन के युग में किताबें नए रूप में आएंगी। प्रो.अर्चना 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की बात करते हुए कहती हैं कि उस समय किताबें तो एक छोटा समुदाय ही लिख रहा था परन्तु एक बड़ा तबका किताबों को पढ़ रहा था। जिससे सामाजिक चेतना के साथ- साथ अस्मिता और आकांक्षा का निर्माण हो रहा था। लेखक इतिहास से प्रतीक को लेकर किताबों में उसे नए अर्थ में प्रयोग कर रहा था। उस समय पाठक पुस्तक की समीक्षा भी करते थे और एक समृद्ध बहस भी होती थी जिससे नया क्रिएशन होता था। उस समय अंबेडकर जो लिख रहे थे उसका निचले तबके तक पहुंच बनाने के लिए अनुवाद किया जा रहा था.
किताबों द्वारा अस्मिता निर्माण की बात करते हुए उन्होंने कहा कि एक ओर आंबेडकर के विचारों को ट्रांसलेट किया जा रहा था तो दूसरी ओर हमारी अस्मिता के लिए भी लिखा जा रहा था। भारतीय समाज में स्त्री विमर्श से संबंधित कई पुस्तकें लिखी गई.महादेवी वर्मा से लेकर आज तक। हमारे समाज में किताबों ने लोगों के सपनो को जगाया है। सामाजिक परिवर्तन डिजिटलाइजेशन और बाज़ार से भी हुआ है उसमें किताबों पर बाजार से उतना खतरा नहीं है। गाजीपुर और आजमगढ़ में पुस्तक मेला लगता है तो पाठक किताबों को छूते है जो उनके अंदर क्यूरियोसिटी जगाते हैं। जिस समाज में सेक्सुअलिटी जैसे विषयों पर बातचीत नहीं होती उसको भी अपना विषय बनाती हैं। पढ़ने की संस्कृति पुस्तक पुस्तिकाओं की समाज में हमेशा जरूरत बनी रहेंगी। किताबें कभी अप्रासंगिक नहीं होती हैं, वे नए रूप में हमारे सामने आती रहेंगी ।
प्रोफेसर लालसा यादव ने किताबों के महत्व को प्रतिपादित किया। वे कहती हैं कि - 'पढ़ते समय हो सकता है किताबें बोझिल लगेंगी लेकिन अंततः किताबें आपको सुकून देती हैं, आपकी भाषा को समृद्ध करती हैं।' उन्होंने जोर देकर कहा कि कई बार विद्यार्थी ज्ञान होते हुए भी उत्तर देने में सक्षम नहीं होते हैं, कारण यह कि ज्ञान को वे संयोजित नहीं कर पा रहे हैं। किताबें पढ़ने से बातों को संयोजित करने का गुण आता है।
इस अवसर पर विशेष रुप से विभाग की अध्यक्ष प्रो. लालसा यादव, जी बी पंत संस्थान से प्रो. अर्चना सिंह, संयोजक प्रो. संतोष भदौरिया,प्रो. शिव प्रसाद शुक्ल प्रो. कल्पना वर्मा, प्रो. राकेश सिंह,प्रो राजेश गर्ग,श्री प्रवीण शेखर, श्री संजय पाण्डेय डॉ. दीनानाथ मौर्य, डॉ. अमितेश कुमार,डॉ. जनार्दन सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी शामिल रहे।

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