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क्या अमेरिका-ईजराइल युद्ध नीति महाभारत कालीन कौरव-पांडव युद्ध से प्रेरित है?
प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश
पश्चिम एशिया में गहराता वर्तमान सैन्य गतिरोध और लैटिन अमेरिका से लेकर ईरान तक सत्ता परिवर्तन की हालिया रणनीतियां अनायास ही महाभारत के उस प्रसंग की याद दिलाती हैं, जहाँ युद्ध केवल शौर्य से नहीं बल्कि शत्रु के नेतृत्व को पंगु बनाने की सूक्ष्म कूटनीति से लड़ा जाता था। आधुनिक सैन्य शब्दावली में जिसे 'लीडरशिप डिकैपिटेशन' कहा जाता है, उसका बीज हमें कुरुक्षेत्र के मैदान में मिलता है, जब दुर्योधन ने युधिष्ठिर को बंदी बनाकर युद्ध को एक झटके में समाप्त करने की योजना बनाई थी।
वो बात अलग है कि श्रीकृष्ण होते हुए यह योजना विफल हुई ,पर अभिमन्यु के रूप में बहुत बड़े योद्धा को खोना पड़ा। आज अमेरिका और इजरायल की रणनीतियों में भी प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के बजाय शीर्ष नेतृत्व को लक्ष्य बनाने, सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित करने या राजनीतिक अलगाव पैदा करने के तत्व प्रधान दिखाई देते हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी किसी राष्ट्र के शीर्ष प्रतीक को हटाया गया, युद्ध का परिणाम निर्णायक रूप से बदल गया। वर्ष 2003 में इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की गिरफ्तारी और 1989 में पनामा के राष्ट्रपति मैनुअल नोरीएगा को बंदी बनाया जाना इसके पुराने उदाहरण हैं, किंतु वर्ष 2026 की घटनाओं ने इस परिपाटी को और अधिक आक्रामक बना दिया है।
हाल ही में अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंदी बनाना और उसके पश्चात 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से ईरान पर भीषण मिसाइल हमला कर सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई को मौत के घाट उतारना, इसी 'नेतृत्व विनाश' की नीति का चरमोत्कर्ष है। इन घटनाओं ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है और यह स्पष्ट कर दिया है कि अब 'अभय' माने जाने वाले नेतृत्व के सुरक्षित घेरे भी आधुनिक तकनीक और खुफिया ऑपरेशन्स के सामने बेबस हैं। सामरिक होड़ के बीच संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय कानून एक नैतिक सीमा रेखा जरूर खींचते हैं, पर शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए ये नियम अब गौण प्रतीत होते हैं।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) किसी भी सदस्य राष्ट्र की संप्रभुता के उल्लंघन को वर्जित करता है और सैन्य कार्रवाई को केवल अनुच्छेद 51 के तहत 'आत्मरक्षा' की स्थिति में ही वैध मानता है। इसके इतर किसी राष्ट्राध्यक्ष को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन है, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में महाशक्तियाँ अक्सर 'आतंकवाद-निरोध' या 'रासायनिक या जैविक हथियारों की उपस्थिति','परमाणु अप्रसार' जैसे तर्कों का सहारा लेकर इन नियमों की व्याख्या अपने हितों के अनुरूप करती रही हैं।
भविष्य की आशंकाएं अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों के युग में भी 'नेतृत्व विनाश' की यह नीति सुरक्षित है? अयातुल्ला खामेनेई की हत्या और मादुरो की गिरफ्तारी से अमेरिका और इजरायल ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि आधुनिक युद्ध अब किसी भी मर्यादा को लांघ सकते हैं। चीन और रूस जैसी महाशक्तियां भविष्य में इस पर क्या रुख अपनाती हैं, यह देखना शेष है, लेकिन छोटे राष्ट्रों को अब यह चिंता सताने लगी है कि कब कोई शक्तिशाली देश उन्हें अपने अधीन बना ले या उनके नेतृत्व को मिटा दे। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों और सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना बनाना प्रतिबंधित है, पर इक्कीसवीं सदी के युद्धों ने साबित कर दिया है कि शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए न तो इन नियमों का कोई बंधन है और न ही उन्हें यूएन की निंदा की चिंता है।
महाभारत हमें अंततः यही सिखाता है कि चतुर रणनीतियों और नियमों के उल्लंघन से युद्ध तो जीता जा सकता है, किंतु प्रतिशोध और सत्ता-लालसा पर आधारित जीत कभी स्थायी शांति नहीं लाती। आज विश्व समुदाय के सामने चुनौती कुरुक्षेत्र की इस पुनरावृत्ति को रोकने और अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन को पुनर्जीवित करने की है।
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