भारत-नेपाल संबंध मात्र राजनीतिक संबंध नहीं, अपितु संवेदना, परंपरा और आत्मीयता से जुड़े हुए हैं : पूर्व आचार्य प्रोफेसर रामदेव शुक्ल

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

सिद्धार्थनगर, सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु में कुलपति प्रोफेसर कविता शाह की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में हिंदुस्तानी अकादमी उत्तर प्रदेश, प्रयागराज तथा सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु के हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में 'भारत-नेपाल संबंधों का हिंदी भाषा एवं साहित्य पर प्रभाव' विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत शोधपत्रों के संकलन पर आधारित संपादित पुस्तक 'भारत-नेपाल सम्बन्ध : हिन्दी भाषा, साहित्य एवं विविध आयाम' का विमोचन भी मंचासीन अतिथियों द्वारा किया गया। इस पुस्तक के संपादक प्रोफेसर सत्येंद्र कुमार दुबे हैं।
 
उद्घाटन अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व आचार्य प्रोफेसर रामदेव शुक्ल ने भारत और नेपाल के संबंधों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय गहराई पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल संबंध मात्र राजनीतिक संबंध नहीं, अपितु संवेदना, परंपरा और आत्मीयता से जुड़े हुए हैं। राजनीतिक अस्थिरता या गतिरोध कभी-कभी प्रभाव डाल सकते हैं, परंतु दोनों देशों की मैत्री का आधार मानवीय संबंधों में निहित है, जो अटूट और अविच्छिन्न हैं, विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व बेसिक शिक्षा मंत्री प्रोफेसर सतीश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि नेपाल का विकास सदैव भारत की चिंतनधारा के केंद्र में रहा है।
 
कार्यक्रम की अध्यक्षता कला संकाय की अधिष्ठाता प्रोफेसर नीता यादव ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के संबंध सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक हैं। साहित्य, लोकसंस्कृति और शैक्षिक संवाद इन संबंधों को गहराई प्रदान करते हैं। विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे इन आयामों पर शोध को प्रोत्साहित करें। 
 
स्वागत उद्बोधन हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व अधिष्ठाता प्रोफेसर हरीशकुमार शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल संबंधों की जड़ें लोकजीवन में रची-बसी हैं और साहित्य इन संबंधों का जीवंत दर्पण है। विषय प्रस्तावना संगोष्ठी के संयोजक एवं हिंदी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सत्येंद्र कुमार दुबे द्वारा प्रस्तुत की गई। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी केवल औपचारिक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि अपने भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ा हुआ एक जीवंत प्रयास है।
 
इस अवसर पर कुलसचिव डॉ. अश्वनी कुमार एवं परीक्षा नियंत्रक दीनानाथ यादव सहित विश्वविद्यालय एवं अन्य महाविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे। प्रथम दिवस दो तकनीकी सत्रों का आयोजन हुआ, जिसमें दो दर्जन से अधिक प्रतिभागियों ने विभिन्न विषयों पर अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. राम पाण्डेय ने की और मुख्य वक्ता डॉ. राणा प्रताप तिवारी रहे जबकि दूसरे सत्र के अध्यक्ष डॉ. विशाल गुप्ता तथा मुख्य वक्ता डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव रहे। दूसरे दिन दो तकनीकी सत्रों के साथ समापन समारोह आयोजित होगा,

About The Author

Post Comments

Comments

संबंधित खबरें