ट्रम्प का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ और गाजा संकट की नई कूटनीति भारत की भागीदारी
राहत पैकेज और वैश्विक शक्ति-संतुलन की बदलती तस्वीर
अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में आयोजित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक ने वैश्विक राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पहल पर गठित इस मंच का उद्देश्य गाजा युद्ध के बाद पुनर्निर्माण, स्थिरता और दीर्घकालिक शांति की रूपरेखा तैयार करना बताया गया है। इस बैठक में भारत ने ऑब्जर्वर देश के रूप में भाग लिया, जबकि करीब 50 देशों के प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए। गाजा के पुनर्निर्माण के लिए लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा ने इसे और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। यह पहल केवल मानवीय सहायता तक सीमित नहीं दिखती, बल्कि इसके माध्यम से वैश्विक शक्ति-संतुलन और कूटनीतिक नेतृत्व की नई दिशा भी उभरती दिखाई दे रही है।
गाजा में पिछले ढाई वर्षों से जारी युद्ध ने अभूतपूर्व मानवीय संकट खड़ा कर दिया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, लगभग 75 हजार लोगों की मौत हो चुकी है और 1.7 लाख से अधिक घायल हैं। मरने वालों में बड़ी संख्या आम नागरिकों और बच्चों की है। 19 लाख लोग बेघर हो चुके हैं और 78 प्रतिशत इमारतें क्षतिग्रस्त बताई जाती हैं। इस पृष्ठभूमि में राहत और पुनर्निर्माण की किसी भी पहल का महत्व स्वतः बढ़ जाता है। ट्रम्प ने बैठक में कहा कि यह राशि युद्ध पर होने वाले खर्च की तुलना में बहुत कम है, और यदि सभी देश मिलकर प्रयास करें तो स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है।
बैठक में 9 सदस्य देशों द्वारा लगभग 7 अरब डॉलर और अमेरिका द्वारा 10 अरब डॉलर देने की घोषणा की गई। ट्रम्प स्वयं इस बोर्ड के अध्यक्ष हैं। इसमें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बगया और ट्रम्प के सलाहकार जारेद कुधनर जैसे नाम शामिल हैं। इस संरचना से स्पष्ट है कि यह मंच केवल सरकारी प्रतिनिधियों तक सीमित नहीं, बल्कि राजनीतिक और वित्तीय नेतृत्व को साथ लेकर चलने का प्रयास है।
भारत की भागीदारी विशेष महत्व रखती है। भारत ने अभी पूर्ण सदस्यता को लेकर कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है, परंतु ऑब्जर्वर के रूप में उसकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि वह पश्चिम एशिया के बदलते समीकरणों पर पैनी नजर बनाए हुए है। भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से संतुलन और संवाद पर आधारित रही है। एक ओर उसके इजराइल से मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी ओर वह फिलिस्तीन के मानवीय अधिकारों का भी समर्थन करता रहा है। ऐसे में इस मंच पर भारत की भागीदारी उसकी बहुपक्षीय कूटनीति का हिस्सा मानी जा सकती है।
बैठक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रोबो सुप्रिण्टो अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जावेद मिलाई और हंगरी के प्रधानमंत्री विकटन ओबराय स्वयं उपस्थित रहे। इससे यह संकेत मिलता है कि कई देश इस मंच को गंभीरता से ले रहे हैं। हालांकि जर्मनी, ब्रिटेन और नॉर्वे जैसे कुछ देशों ने सदस्यता नहीं ली, पर ऑब्जर्वर के रूप में भागीदारी की।
इस बैठक का एक अहम पहलू गाजा में एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की तैनाती का प्रस्ताव है। लगभग 12 हजार पुलिसकर्मियों और 20 हजार सैनिकों की जरूरत का अनुमान लगाया गया है। इसका उद्देश्य सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखना और हमास को निरस्त्र करना बताया गया है। इजराइल की यह प्रमुख मांग रही है कि जब तक हमास हथियार नहीं छोड़ता, तब तक सेना की वापसी संभव नहीं है। दूसरी ओर हमास का कहना है कि जब तक इजराइली सेना पूरी तरह नहीं हटती, वह हथियार नहीं डालेगा। इस टकराव की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय बल की भूमिका निर्णायक हो सकती है, लेकिन इसकी व्यवहारिकता और स्वीकृति पर अभी प्रश्नचिह्न बना हुआ है।
ट्रम्प ने इस मंच को संयुक्त राष्ट्र की निगरानी करने वाला बताया है। उनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में क्षमता तो बहुत है, लेकिन उसका पूरा उपयोग नहीं हो पाया है। यह बयान वैश्विक कूटनीति में नई बहस को जन्म देता है। क्या यह बोर्ड वास्तव में संयुक्त राष्ट्र का पूरक बनेगा या उसकी भूमिका को चुनौती देगा? यूनाइटेड नेशन और विशेष रूप से यूनाइटेड नेशन सिक्युरिटी काउंसिल की भूमिका पर पहले से ही प्रश्न उठते रहे हैं। यदि यह नया मंच प्रभावी हुआ तो वैश्विक संस्थागत ढांचे में बदलाव की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
बैठक के दौरान ट्रम्प द्वारा ईरान को 10 दिन का अल्टीमेटम देना भी महत्वपूर्ण है। यह संकेत है कि यह मंच केवल गाजा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक क्षेत्रीय समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है। पश्चिम एशिया में ईरान, इजराइल और अरब देशों के बीच जटिल संबंध हैं। यदि यह बोर्ड किसी ठोस समझौते की दिशा में आगे बढ़ता है तो क्षेत्रीय राजनीति में नए संतुलन बन सकते हैं।
फिर भी इस पहल को लेकर शंकाएं भी कम नहीं हैं। फंडिंग, सैनिक तैनाती की समयसीमा, प्रशासनिक ढांचा और स्थानीय स्वीकृति जैसे कई सवाल अनुत्तरित हैं। गाजा के दक्षिणी हिस्से में नए शहर बसाने और पर्यटन परियोजनाओं के प्रस्ताव को भी आलोचनात्मक नजर से देखा जा रहा है। पुनर्निर्माण केवल भौतिक ढांचे तक सीमित नहीं होता; इसके लिए सामाजिक विश्वास, राजनीतिक समाधान और दीर्घकालिक सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता होती है।
भारत जैसे देशों के लिए यह मंच अवसर और चुनौती दोनों है। अवसर इसलिए कि वह वैश्विक शांति प्रयासों में रचनात्मक भूमिका निभा सकता है; चुनौती इसलिए कि उसे अपने पारंपरिक संतुलन को बनाए रखते हुए नए शक्ति-संतुलन में खुद को स्थापित करना होगा। भारत की भूमिका भविष्य में इस बात पर निर्भर करेगी कि यह बोर्ड कितनी पारदर्शिता और निष्पक्षता से कार्य करता है।
अंततः ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की सफलता केवल घोषित धनराशि या सैनिक तैनाती पर निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस पर निर्भर करेगी कि क्या यह वास्तव में स्थायी राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ पाता है। गाजा का संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक नैतिक और मानवीय परीक्षा बन चुका है। यदि यह पहल वास्तविक संवाद, न्याय और पुनर्निर्माण का मार्ग प्रशस्त करती है, तो यह वैश्विक कूटनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय सिद्ध हो सकती है। अन्यथा, यह भी इतिहास के उन प्रयासों में शामिल हो जाएगी जो उम्मीदों के साथ शुरू हुए, पर जटिल राजनीतिक यथार्थ के सामने टिक नहीं सकती।
कांतिलाल मांडोत

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