कांग्रेस में अनुशासन संकट और नेतृत्व पर उठते सवाल
भारतीय राजनीति में दलों के भीतर मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब ये मतभेद सार्वजनिक मंचों से तीखे व्यक्तिगत हमलों में बदल जाएं, तो उनका असर केवल पार्टी की छवि तक सीमित नहीं रहता बल्कि व्यापक राजनीतिक परिदृश्य को भी प्रभावित करता है। हाल के दिनों में मणिशंकर अय्यर, पवन खेड़ा और जयराम रमेश के बीच चला बयानबाजी का दौर इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है। इस विवाद ने कांग्रेस के भीतर अनुशासन, नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि केरल की राजनीति से जुड़ी है, जहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की संभावित वापसी को लेकर बयान सामने आया। कांग्रेस लंबे समय से केरल में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के माध्यम से सत्ता में वापसी का प्रयास करती रही है। ऐसे में पार्टी के वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रतिद्वंद्वी मोर्चे के नेता की प्रशंसा और उनके दोबारा मुख्यमंत्री बनने की भविष्यवाणी करना स्वाभाविक रूप से विवाद का कारण बना। पार्टी प्रवक्ता की ओर से यह कहा जाना कि संबंधित नेता व्यक्तिगत क्षमता में बोल रहे हैं और उनका पार्टी से औपचारिक संबंध सक्रिय नहीं है, आग में घी डालने जैसा साबित हुआ।
इसके बाद जिस तरह से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई, उसने राजनीतिक असहमति को व्यक्तिगत कटाक्षों में बदल दिया। किसी को कठपुतली या तोता कहना, पार्टी सहयोगियों को राउडी बताना या सार्वजनिक रूप से यह कहना कि यदि निकाला गया तो प्रतिशोध लेंगे, यह सब उस राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है जिसमें संयम और संवाद की जगह उत्तेजना और आक्रोश ले लेते हैं। लोकतांत्रिक दलों में असहमति स्वाभाविक है, परंतु असहमति की अभिव्यक्ति का भी एक मर्यादित तरीका होता है। जब वरिष्ठ नेता ही मर्यादा की सीमाएं लांघते दिखें, तो कार्यकर्ताओं और समर्थकों को क्या संदेश जाता है, यह विचारणीय है।
कांग्रेस एक ऐतिहासिक दल है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं की विरासत का दावा करने वाला दल यदि अपने ही नेताओं के बीच सार्वजनिक कटुता से जूझता दिखे, तो मतदाताओं में भ्रम और निराशा स्वाभाविक है। आज जब भारतीय राजनीति अत्यंत प्रतिस्पर्धी और ध्रुवीकृत हो चुकी है, तब किसी भी दल के लिए आंतरिक एकजुटता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है।
नेतृत्व का प्रश्न भी इस पूरे विवाद के केंद्र में है। पार्टी के भीतर यह धारणा बनना कि कौन गांधीवादी है, कौन नेहरूवादी है और कौन किस नेतृत्व के प्रति प्रतिबद्ध है, यह वैचारिक बहस का विषय हो सकता है। लेकिन जब यह बहस सार्वजनिक मंच से चुनौती और कटाक्ष के रूप में सामने आए, तो वह संगठनात्मक अनुशासन को कमजोर करती है। किसी भी राजनीतिक दल में नेतृत्व के प्रति असहमति दर्ज कराने के औपचारिक मंच होते हैं—कार्यसमिति, समन्वय बैठकें, आंतरिक संवाद। यदि इन मंचों की बजाय मीडिया और सार्वजनिक सभाओं को माध्यम बनाया जाए, तो संदेश यही जाता है कि पार्टी के भीतर संवाद की प्रक्रिया कमजोर है।
इस प्रकरण का एक व्यापक राजनीतिक आयाम भी है। विपक्षी दल ऐसे बयानों को तुरंत लपकते हैं और यह संदेश देने का प्रयास करते हैं कि पार्टी के भीतर नेतृत्व पर भरोसा नहीं है। इससे न केवल पार्टी की साख पर असर पड़ता है, बल्कि गठबंधन राजनीति में भी उसकी स्थिति कमजोर होती है। केरल जैसे राज्यों में जहां बहुकोणीय मुकाबला है, वहां विपक्षी एकता और स्पष्ट रणनीति की आवश्यकता और भी अधिक होती है। यदि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ही अलग-अलग सुर में बोलते दिखें, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरना स्वाभाविक है।
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं है, बल्कि संगठन को पुनर्गठित करने और कार्यकर्ताओं में विश्वास जगाने की भी है। पिछले वर्षों में कई वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ना या निष्क्रिय हो जाना यह संकेत देता है कि भीतर कहीं संवाद और संतुलन की कमी रही है। अनुशासन केवल दंडात्मक कार्रवाई से स्थापित नहीं होता, बल्कि पारदर्शी संवाद, स्पष्ट जिम्मेदारी और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया से बनता है। यदि कोई नेता पार्टी लाइन से अलग बयान देता है, तो पहले आंतरिक स्तर पर बात होनी चाहिए। सार्वजनिक फटकार या सार्वजनिक अपमान स्थिति को और बिगाड़ता है।
राजनीति में शब्दों का महत्व बहुत बड़ा होता है। एक कठोर टिप्पणी क्षणिक संतोष दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में वह संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाती है। मतदाता केवल नीतियों और घोषणाओं को नहीं देखते, बल्कि नेताओं के व्यवहार और भाषा को भी परखते हैं। जब मंच से अभद्रता या व्यक्तिगत हमले दिखाई देते हैं, तो आम नागरिक यह सोचने पर मजबूर होता है कि क्या यही राजनीतिक संस्कृति देश को दिशा देगी।
कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है। उसे यह तय करना होगा कि क्या वह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और सार्वजनिक बयानबाजी के आधार पर आगे बढ़ेगी या सामूहिक नेतृत्व और अनुशासन के आधार पर। संगठन के भीतर मतभेदों को स्वीकार करते हुए भी एक साझा सार्वजनिक रुख अपनाना आवश्यक है। पार्टी को अपने प्रवक्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा, ताकि संदेश स्पष्ट और एकसमान रहे।
अंततः किसी भी राजनीतिक दल की मजबूती उसके विचार, संगठन और अनुशासन से तय होती है। यदि कांग्रेस को अपने गिरते जनाधार को पुनर्जीवित करना है, तो उसे शांत चित्त से सोचकर संगठनात्मक सुधार, नेतृत्व की स्पष्टता और संवाद की संस्कृति को मजबूत करना होगा। सार्वजनिक मंचों से कटाक्ष और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति अल्पकालिक सुर्खियां तो दिला सकती है, परंतु दीर्घकाल में वही दल सफल होता है जो संयम, एकजुटता और स्पष्ट दिशा के साथ आगे बढ़ता है। कांग्रेस के सामने आज यही सबसे बड़ी परीक्षा है।
कांतिलाल मांडोत

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