नोट नकली निकले, लेकिन सवाल असली है

जब भरोसे की अर्थव्यवस्था में नकलीपन घुस जाए तो नुकसान केवल मुद्रा का नहीं, व्यवस्था के विश्वास का होता है।

अजय यादव Picture
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नोट पर छपी महात्मा गांधी की तस्वीर असली हो सकती है, कागज भी असली जैसा दिखाई दे सकता है और उस पर लिखी कीमत भी वही हो सकती है, लेकिन अगर वह नोट नकली है तो उसका कोई मूल्य नहीं। यही बात केवल मुद्रा पर लागू नहीं होती, बल्कि समाज और व्यवस्था पर भी लागू होती है।

सहारनपुर के एक बैंक करेंसी चेस्ट में बड़ी मात्रा में नकली ₹500 के नोट मिलने की खबर ने इसी सवाल को फिर सामने खड़ा किया है। समाचार के अनुसार जांच में लगभग 17 करोड़ रुपये मूल्य के नकली नोट सामने आए और 340 बंडलों में रखे नोटों की जांच की गई। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि नई करेंसी की तस्वीर की प्रतिलिपि बनाकर नकली नोट तैयार किए गए और उन्हें असली नोटों के साथ मिलाया गया।

यह केवल नकली नोटों का मामला नहीं है। यह उस विश्वास पर चोट है जिसके आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था चलती है।

हम बाजार में कोई वस्तु खरीदते हैं तो दुकानदार से यह उम्मीद करते हैं कि उसके बदले दिया गया नोट असली होगा। दुकानदार बैंक में पैसा जमा करता है तो उसे भरोसा होता है कि बैंक उस धन को स्वीकार करेगा। बैंक से पैसा निकलता है तो नागरिक उसे बिना संदेह अपनी जेब में रखता है। यही भरोसा मुद्रा को कागज के टुकड़े से आर्थिक शक्ति में बदलता है।

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लेकिन जब नकली नोट बैंकिंग व्यवस्था के भीतर तक पहुंचने लगें तो सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि नकली नोट छापने वाले कौन हैं? सवाल यह भी है कि नकलीपन की पहचान करने वाली हमारी व्यवस्था कहां चूक रही है?

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भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को नकली नोटों की पहचान, उन्हें अलग करने और दोबारा चलन में आने से रोकने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश दिए हैं। ₹100 और उससे ऊपर के नोटों को पुनः चलन में डालने से पहले मशीन से जांचने के निर्देश भी हैं।

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फिर यदि इतने बड़े पैमाने पर नकली नोट करेंसी चेस्ट तक पहुंचते हैं तो यह केवल अपराधियों की चालाकी नहीं, प्रणाली की परीक्षा भी है। हमें यह समझना होगा कि नकली नोट केवल अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाते। वे आम आदमी के विश्वास को नुकसान पहुंचाते हैं।

कल्पना कीजिए उस छोटे दुकानदार की, जिसके पास दिनभर की बिक्री के बाद एक ₹500 का नकली नोट निकल आए। उसके लिए वह पांच सौ रुपये केवल एक कागज नहीं, बल्कि उसकी दिनभर की मेहनत का हिस्सा हैं। कोई मजदूर अपनी मजदूरी लेकर घर पहुंचे और पता चले कि उसमें से कुछ नोट नकली हैं तो उसके लिए यह आर्थिक चोट से कहीं अधिक बड़ी बात है।

नकली मुद्रा का सबसे बड़ा शिकार अक्सर वह व्यक्ति बनता है जिसके पास उसे पहचानने के साधन सबसे कम होते हैं। यही कारण है कि इस समस्या का समाधान केवल पुलिस की कार्रवाई या कुछ गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। बल्कि नकली नोट छापने वाले हाथों तक पहुंचना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है उस पूरे नेटवर्क तक पहुंचना जो उसे बाजार में पहुंचाता है।

और अगर बैंकिंग व्यवस्था के किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो वहां भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। बैंक का करेंसी चेस्ट देश की मुद्रा का सुरक्षित भंडार माना जाता है। वहां नकली नोटों की बड़ी मात्रा पहुंचना सामान्य घटना मानकर छोड़ देना भविष्य के लिए खतरनाक संकेत होगा।

आज तकनीक अपराधियों के हाथ में भी है। पहले नकली नोट की पहचान शायद कागज, छपाई और रंग से की जा सकती थी। अब डिजिटल तकनीक और प्रिंटिंग के साधनों ने नकलीपन को अधिक परिष्कृत बना दिया है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को भी उसी गति से आगे बढ़ना होगा।

लेकिन तकनीक से भी बड़ा हथियार है,सजग नागरिक।RBI स्वयं लोगों को नोटों की सुरक्षा विशेषताओं को देखकर, छूकर और तिरछा करके पहचानने की जानकारी देता है।

हमें अपने दुकानदारों, व्यापारियों, कर्मचारियों और आम नागरिकों को यह जानकारी देनी होगी कि नोट केवल देखकर स्वीकार न करें। बैंक कर्मचारियों और बड़े नकद लेन-देन करने वालों को नियमित प्रशिक्षण मिलना चाहिए और संदेहास्पद मुद्रा के मामले में तत्काल निर्धारित प्रक्रिया अपनानी चाहिए।

क्योंकि नकली नोटों की समस्या केवल नोट की असलियत की समस्या नहीं है। यह हमारे समय के उस बड़े संकट का प्रतीक है जिसमें नकली और असली के बीच अंतर करना लगातार कठिन होता जा रहा है। नकली नोट बाजार में चल सकता है, नकली दवा शरीर में जा सकती है, नकली सामान घर में पहुंच सकता है, नकली खबर समाज में फैल सकती है और नकली विश्वास रिश्तों को भी खोखला कर सकता है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि नकली नोट कहां छपे? सवाल यह भी है, हमारी व्यवस्था में नकलीपन इतनी दूर तक पहुंच कैसे गया?

मुद्रा की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है व्यवस्था के विश्वास की सुरक्षा। क्योंकि रुपये की कीमत उसके कागज में नहीं, उस विश्वास में है कि यह कागज सचमुच ₹500 का मूल्य रखता है। और जिस दिन नागरिक को अपनी जेब में रखे नोट से भी भरोसा उठने लगे, उस दिन चोट केवल मुद्रा पर नहीं पड़ेगी, अर्थव्यवस्था की नींव में छिपे विश्वास पर पड़ेगी। नोट नकली थे, लेकिन सवाल बिल्कुल असली है, क्या हमारी व्यवस्था नकलीपन से एक कदम आगे चल रही है?

वीरेंद्र हीरालाल पथरिया

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