हिंसा के दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए भरोसे संवाद और न्याय की सबसे बड़ी जरूरत

व्यापार और रोजगार पर असर पड़ता है। सामान्य जनजीवन बाधित हो जाता है और विकास की गति थम जाती है।

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पूर्वोत्तर भारत का सुंदर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य मणिपुर पिछले कई वर्षों से अशांति और हिंसा की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक बार फिर कांगपोकपी जिले में हुई दर्दनाक घटना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर मणिपुर की आग कब बुझेगी।
 
हथियारबंद हमलावरों द्वारा एक गांव पर किए गए हमले में चर्च से जुड़े तीन लोगों की हत्या कर दी गई जिनमें सात माह की गर्भवती महिला भी शामिल थी। कई लोग घायल हुए और अनेक घर जलकर राख हो गए। यह घटना केवल तीन व्यक्तियों की मृत्यु भर नहीं है बल्कि उस गहरे सामाजिक विभाजन और अविश्वास का प्रतीक है जिसने मणिपुर को लंबे समय से अपनी गिरफ्त में ले रखा है।
 
मणिपुर की समस्या को केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे ऐतिहासिक विवाद जातीय असुरक्षाएं राजनीतिक मतभेद और संसाधनों पर अधिकार को लेकर लंबे समय से चली आ रही प्रतिस्पर्धा भी शामिल है। राज्य में विभिन्न समुदायों के बीच संबंध समय के साथ जटिल होते गए हैं। जब भी कोई हिंसक घटना होती है तो उसका प्रभाव केवल प्रभावित परिवारों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा हो जाता है। बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। व्यापार और रोजगार पर असर पड़ता है। सामान्य जनजीवन बाधित हो जाता है और विकास की गति थम जाती है।
 
हाल की घटना ने एक बार फिर यह दिखाया है कि हिंसा का कोई धर्म जाति या समुदाय नहीं होता। गोली और आग केवल जान लेती है। वह यह नहीं देखती कि सामने कौन है और उसकी पहचान क्या है। जब एक गर्भवती महिला हिंसा का शिकार होती है तो उसके साथ एक अजन्मा जीवन भी समाप्त हो जाता है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए गहरी पीड़ा और आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। ऐसे समय में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।
 
मणिपुर में लंबे समय से चल रहे संघर्ष ने दोनों प्रमुख समुदायों के बीच अविश्वास की ऐसी खाई पैदा कर दी है जिसे केवल सुरक्षा बलों की तैनाती से नहीं भरा जा सकता। सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है क्योंकि नागरिकों की रक्षा राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन स्थायी शांति केवल हथियारों के बल पर स्थापित नहीं की जा सकती। शांति तब आती है जब लोग एक दूसरे को दुश्मन नहीं बल्कि पड़ोसी और साथी नागरिक के रूप में देखने लगते हैं। इसके लिए संवाद और मेलमिलाप की प्रक्रिया को मजबूत करना होगा।
 
सरकार की भूमिका इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जिसमें सभी समुदाय अपनी बात खुलकर रख सकें और उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए। केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं हैं। जमीनी स्तर पर विश्वास बहाली के ठोस प्रयास आवश्यक हैं। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है उन्हें न्याय मिलना चाहिए। दोषियों की पहचान कर निष्पक्ष कार्रवाई की जानी चाहिए। जब लोगों को यह भरोसा होगा कि कानून सभी के लिए समान है तभी व्यवस्था में विश्वास लौटेगा।
 
हालांकि केवल सरकार के प्रयासों से समस्या का समाधान संभव नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। धार्मिक संगठन सामाजिक संस्थाएं बुद्धिजीवी युवा और स्थानीय नेतृत्व शांति की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चर्च मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल केवल पूजा के केंद्र नहीं बल्कि समाज को जोड़ने वाले मंच भी बन सकते हैं। यदि विभिन्न समुदायों के धार्मिक और सामाजिक नेता मिलकर शांति का संदेश दें तो उसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
 
मणिपुर की वर्तमान स्थिति यह भी बताती है कि अफवाहें और नफरत फैलाने वाली सूचनाएं कितनी खतरनाक हो सकती हैं। डिजिटल युग में सोशल मीडिया के माध्यम से गलत जानकारी तेजी से फैलती है और लोगों की भावनाओं को भड़का सकती है। इसलिए जिम्मेदार संवाद और तथ्य आधारित जानकारी का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। मीडिया को भी अपनी भूमिका संतुलित और संवेदनशील ढंग से निभानी होगी ताकि तनाव कम हो और समाज में सकारात्मक संदेश पहुंचे।
 
युवाओं को हिंसा से दूर रखना भी समय की मांग है। संघर्ष और अशांति का सबसे अधिक प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ता है। यदि उन्हें शिक्षा रोजगार और सकारात्मक अवसर नहीं मिलेंगे तो वे निराशा और कट्टरता की ओर बढ़ सकते हैं। इसलिए विकास और शांति को एक दूसरे का पूरक मानते हुए आगे बढ़ना होगा। स्कूलों कॉलेजों और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से सामाजिक सद्भाव और आपसी सम्मान की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।
 
मणिपुर का इतिहास केवल संघर्ष का इतिहास नहीं है। यह सांस्कृतिक विविधता परंपराओं और सहअस्तित्व की समृद्ध विरासत का भी इतिहास है। सदियों से विभिन्न समुदायों ने यहां साथ रहकर अपनी पहचान को विकसित किया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि उस साझा विरासत को याद किया जाए और उसे भविष्य की नींव बनाया जाए। विभाजन की राजनीति और हिंसा का रास्ता अंततः सभी को नुकसान पहुंचाता है जबकि संवाद और सहयोग सभी के लिए बेहतर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
 
कांगपोकपी की घटना ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। निर्दोष लोगों की हत्या और घरों का जलना केवल समाचार नहीं बल्कि उन परिवारों का असहनीय दर्द है जिनकी दुनिया एक पल में बदल गई। इस पीड़ा को समझना और उससे सीख लेना जरूरी है। यदि हर नई घटना के बाद केवल शोक व्यक्त किया जाए और फिर सब कुछ पहले जैसा चलता रहे तो समाधान कभी नहीं निकलेगा।
 
मणिपुर की आग तब बुझेगी जब भय की जगह विश्वास लेगा। जब प्रतिशोध की जगह संवाद होगा। जब राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सामाजिक सहभागिता भी जुड़ेगी। जब हर समुदाय यह महसूस करेगा कि उसकी सुरक्षा सम्मान और अधिकार सुरक्षित हैं। और सबसे महत्वपूर्ण तब जब इंसान की पहचान किसी जातीय या सामुदायिक खांचे से पहले एक नागरिक और एक मानव के रूप में की जाएगी।
 
शांति कोई एक दिन में हासिल होने वाली उपलब्धि नहीं है। यह धैर्य समझदारी और निरंतर प्रयासों का परिणाम होती है। मणिपुर को आज इसी सामूहिक संकल्प की आवश्यकता है। सरकार समाज और दोनों समुदायों को मिलकर आगे बढ़ना होगा। हिंसा का प्रत्येक नया अध्याय राज्य को और पीछे धकेलता है जबकि सुलह और संवाद का हर कदम उसे स्थायी शांति और विकास की दिशा में आगे ले जाता है। अब समय आ गया है कि बंदूक की आवाज को बातचीत की आवाज से बदला जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां एक सुरक्षित शांत और समृद्ध मणिपुर देख सकें।
 
कांतिलाल मांडोत

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