मैं सूतपुत्र कर्ण से नहीं करूंगी विवाह – द्रोपद पुत्री द्रौपदी
इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।
पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:- द्रौपदी के स्वयंवर सभा में जब अंगराज कर्ण ने नीचे पात्र में रखे तेल की छाया में मछली की आंख में निशान लगाने के लिए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना चाहा तभी पांचाली बोल पड़ी—मैं नहीं करूंगी सूतपुत्र से विवाह। इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।
पांचाली पांचाल देश के राजा द्रोपद की कन्या थी और वह अग्निकुंड से प्रकट हुई थी। इस कारण इन्हें अग्निसूता भी कहा जाता है। स्वयंवर सभा में वीर-महावीरों ने भरपूर प्रयत्न करने के बाद भी प्रत्यंचा चढ़ाने में विफल रहे। तब ब्राह्मण वेषधारी कौंतेय ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर मछली की आंख को भेदते हुए सभी को अचंभित कर दिया।
कर्ण महावीर थे और मछली की आंख आसानी से भेद सकते थे, पर पांचाली ने विवाह नहीं करने की बात क्यों कही? क्या सूत होने के कारण ही द्रौपदी ने मना किया या इसके पीछे कई गूढ़ रहस्य छिपे हैं? यद्यपि उक्त प्रसंग हजारों वर्ष पूर्व का है, परन्तु प्रमाणिक तथ्यों की अनदेखी कर लोग, विशेषकर भारतीय ज्ञानपरक व राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा कर, उन गूढ़ रहस्यों को स्वार्थवश नहीं कहते और राष्ट्रीय जनजीवन को भ्रमित करते रहे हैं। इससे देश ही नहीं, भारत विरोधी तत्व भी देश की मान्य छवि को धुंधला करते रहे हैं।
सनातन संस्कृति, धर्म एवं परम्पराओं में सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में, ईसा की सातवीं सदी अर्थात भारत पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण से पूर्व तक, किसी प्रकार की जातीयता का प्रमाणिक उल्लेख नहीं मिलता। सनातन सांस्कृतिक मूल्य कर्म आधारित रहा है।
कर्ण के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि वे कौंतेय थे। गुरु द्वारा प्रदत्त सूर्य मंत्र का परीक्षण करने हेतु कुंती ने आह्वान किया और सूर्य भगवान प्रकट हुए। वहीं वरदान स्वरूप पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन उन्होंने कुंती को आशीर्वाद दिया कि वे कुमारी ही रहेंगी। लोकलाज के कारण उन्होंने बालक को गंगा में प्रवाहित कर दिया। कर्ण कवच-कुंडल लेकर जन्मे थे।
दूसरी ओर कर्ण का पालन-पोषण एक सूत परिवार में हुआ और राधेय इनकी माता कही गईं। इसी कारण कर्ण राधेय भी कहलाए। उन दिनों रथ चलाने वाले को सूत कहा जाता था। जिस प्रकार आज वाहन चलाने वाले को चालक या ड्राइवर कहा जाता है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो।
उपमा के तौर पर आज भी कोई सम्पन्न या रईस व्यक्ति किसी चालक से अपनी सुकन्या का विवाह करना पसंद नहीं करता। लोग कहते हैं कि द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के संकेत से ऐसा किया। पांचाली को कृष्णा भी कहा जाता है और भाई होने के नाते वे बहन के हित की ही सोचते।
श्रीकृष्ण भगवान थे और पांचाली के पूर्व जन्मों के सभी कर्मों व इच्छाओं को भली-भांति जानते थे कि उनका परिणय किनके साथ होगा तथा भविष्य में कौन-कौन सी घटनाएं घटेंगी और उनका समाधान कैसे होगा।
कहा जाता है कि कौरव दल में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कर्ण जैसे महारथी थे। इसे ध्यान में रखते हुए संजय ने धृतराष्ट्र से कहा—महाराज, विजय दुर्योधन की होगी, परन्तु दुर्योधन सहित पांच को छोड़कर सभी मारे जाएंगे और अंततः भारी पराजय होगी। इस पर धृतराष्ट्र ने कहा—संजय, तुमने मुझसे कभी झूठ नहीं कहा, पर ऐसा कैसे हो सकता है?
इस पर संजय ने विनम्र होकर कहा—महाराज, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसके मूल में श्रीकृष्ण थे और वे सदैव सत्य और धर्म का पक्ष लेते हैं।
सनातन धर्म और संस्कृति कर्म आधारित रही है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के साथ विश्व कल्याण की कामना करती है।


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