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जीजा-साले का ‘चीन कनेक्शन’ उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन वेंटीलेटर घोटाला–2
जीजा-साले का ‘चीन कनेक्शन’ गहराया, नियमों को दरकिनार कर करोड़ों की खरीद पर सवाल
📍 लखनऊ | संवाददाता
स्थापना का उद्देश्य और वर्तमान स्थिति
वर्ष 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन (UPMSCL) की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि प्रदेश के सरकारी अस्पतालों को उच्च गुणवत्ता वाली दवाएं और आधुनिक उपकरण पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से उपलब्ध कराए जा सकें।
कारपोरेशन को स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माना गया था, लेकिन हाल के घटनाक्रम इस संस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, कुछ अधिकारियों, आउटसोर्स कर्मचारियों और कथित बिचौलियों के गठजोड़ ने खरीद प्रक्रिया को प्रभावित कर इसे कथित रूप से भ्रष्टाचार का केंद्र बना दिया है।

ICU वेंटीलेटर टेंडर में ‘खेल’
ताजा मामला जेम (GeM) पोर्टल पर जारी टेंडर संख्या GEM/2025/B/5823357 से जुड़ा है, जिसके तहत प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों के लिए 221 ICU वेंटीलेटर खरीदे जाने हैं।
Read More सरकार के मानक के अनुरूप तीन से चार महीने अन्दर ग्राम पंचायत लायन में बनाया गया है अंत्येष्टि स्थल। इस टेंडर में कुल 11 कंपनियों ने भाग लिया है। इनमें शामिल Heidelco Medicore Pvt. Ltd. पर आरोप है कि यह कंपनी अलग-अलग टेंडरों में अपनी पहचान बदलकर हिस्सा लेती रही है—कभी खुद को निर्माता, तो कभी अधिकृत वितरक बताकर।
इस बार कंपनी ने खुद को Sysmed Medical Technologies Pvt. Ltd., चंडीगढ़ का अधिकृत वितरक बताया है और जिस वेंटीलेटर मॉडल की आपूर्ति का प्रस्ताव दिया गया है, वह Topnotch TV-15 है।
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KGMU की रिपोर्ट ने खड़े किए सवाल
लखनऊ स्थित प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) ने पूर्व में एक अन्य टेंडर (GEM/2026/R/647614) में इसी मॉडल के वेंटीलेटर को गुणवत्ता और सर्विस से जुड़े कारणों से खारिज कर दिया था।
KGMU की तकनीकी समिति द्वारा की गई जांच में निम्न बिंदुओं पर आपत्ति जताई गई थी:
- उपकरण की परफॉर्मेंस मानकों पर खरा न उतरना
- क्लिनिकल उपयोग में विश्वसनीयता की कमी
- सर्विस और मेंटेनेंस सपोर्ट कमजोर होना
इसके बावजूद वही मॉडल दोबारा टेंडर प्रक्रिया में शामिल होना कई सवाल खड़े करता है।
‘मेड इन इंडिया’ के नाम पर चीनी उत्पाद?
आरोप यह भी है कि जिस वेंटीलेटर को भारतीय कंपनी के नाम से पेश किया जा रहा है, वह वास्तव में चीन की कंपनी Shenzhen Mindray Bio-Medical Electronics Co. Ltd. का उत्पाद है।
यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो यह न केवल खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े नियमों का उल्लंघन भी हो सकता है।
GFR 144(XI) की अनदेखी?
भारत सरकार के GFR 144(XI) नियम के अनुसार, सुरक्षा कारणों से चीनी कंपनियों और उनसे जुड़े उत्पादों की सरकारी खरीद पर सख्त प्रतिबंध है, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी से अनुमति न ली जाए।
ऐसे में बिना स्पष्ट खुलासे के चीनी उत्पाद को भारतीय कंपनी के माध्यम से पेश करना नियमों की अवहेलना माना जा सकता है।

विभागीय जिम्मेदारी और निगरानी पर सवाल
इस पूरे मामले में प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। विभाग की जिम्मेदारी उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक के पास है।
सूत्रों का दावा है कि:
- एक आउटसोर्स कर्मचारी उज्ज्वल कुमार कथित रूप से खरीद प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा था
- टेंडर प्रक्रिया में तकनीकी जांच को प्रभावित करने के प्रयास हुए
- कथित दलालों के साथ मिलकर निर्णयों को प्रभावित किया गया
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
कारपोरेशन का पक्ष
मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन के कर्मचारी देवव्रत कुमार आर्य ने संवाददाता से बातचीत में कहा:
“यदि किसी कंपनी द्वारा चीनी उत्पाद को छिपाकर सप्लाई करने का प्रयास किया जाता है, तो उसकी विस्तृत जांच की जाएगी। नियमों के विरुद्ध पाए जाने पर टेंडर तत्काल निरस्त किया जाएगा।”
बड़े सवाल
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- क्या पहले से रिजेक्टेड उपकरण को दोबारा टेंडर में शामिल किया जा सकता है?
- क्या टेंडर प्रक्रिया में तकनीकी मानकों से समझौता किया जा रहा है?
- क्या ‘मेड इन इंडिया’ के नाम पर विदेशी उत्पादों की आपूर्ति हो रही है?
- क्या निगरानी तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है?
📢 निष्कर्ष
यह मामला केवल एक टेंडर तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकारी खरीद प्रणाली की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न सिर्फ आर्थिक घोटाला होगा बल्कि मरीजों की जान से भी खिलवाड़ माना जाएगा।
✍️ (स्वतंत्र प्रभात की खोजी टीम अगले अंक में इस मामले से जुड़े और बड़े खुलासे करेगी…)


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