बच्चों की पढ़ाई जारी रखने को कर्ज लेने को मजबूर हैं अभिभावक
एक बिषय की तीन से चार किताब खरीदना बना मजबूरी
मनमानी कीमत पर मिलती हैं पुस्तक
बिहार में निजी स्कूलों की पढ़ाई अब पढ़ाई कम वयापार महज अब बनकर रह गई है जिले में नए शैक्षणिक सत्र 2026- 27 की शुरुआत हो चुकी हैं।इसके साथ ही निजी स्कूलों में बच्चों को दी जाने वाली किताबों की कीमतों ने महँगाई की मार झेल रहे अभिभावकों की कमर तोड़ दी है।निजी स्कूलों में कमोबेश प्राइमरी कक्षा तक के किताब सेट चार हजार से अधिक, छठी से आठवीं कक्षा की किताबों का पूरा सेट करीब सात से आठ हजार रुपये में मिल रहा है, जबकि इसके आगे की कक्षाओं के लिए पूरा सेट 15 हजार पार कर जा रहा है।निजी स्कूलों की शिक्षा अब जरूरत से ज्यादा महंगी होती जा रही है, जिससे खासकर मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ रहा है। आश्चर्यजनक पहलू यह है कि कक्षा छह में हिन्दी की एनसीईआरटी किताब की कीमत मात्र 65 रुपये है, वहीं उसी विषय की निजी प्रकाशकों किताब की कीमत लगभग छह सौ रुपए में लेनी पड़ रही है। इसी तरह संस्कृत की एनसीईआरटी किताब 50 रुपये की है, लेकिन निजी प्रकाशकों की पुस्तक 400 रुपये में दी जा रही है। वही अंग्रेजी बिषय में 40 रुपये की किताब के साथ 550 से 700 रुपये तक की दूसरी किताब लेना अनिवार्य बना दिया गया है। इससे साफ है कि एक ही विषय में अभिभावकों को दो से तीन किताबें खरीदनी पड़ रही हैं।
महँगी कीमत की हैं किताबें, लोगों का मासिक बजट बिगड़ा
अभिभावक श्याम चंद्र यादव, रंजीत झा, सिमरन, डॉ इंद्रभूषण प्रसाद व अन्य ने बताया कि जिले के अधिकांश निजी स्कूलों में किताबें स्कूल परिसर में ही बेची जा रही हैं। जिस स्कूल में अंदर में किताब बिकने की व्यवस्था नही है , वहां शहर में एक तय दुकान से ही किताब खरीदने की बाध्यता है।अभिभावकों द्वारा महज कक्षा बताने पर पूरा सेट दे दिया जाता है और निर्धारित कीमत चुकानी पड़ती है। बाहर से किताब क्या कॉपी तक खरीदने का विकल्प लगभग समाप्त कर दिया गया है, जिससे कीमत की प्रतिस्पर्धा खत्म हो गई है और कीमतें मनमानी हो गई हैं। इसका सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जिनके घर में दो या तीन बच्चे पढ़ते हैं। ऐसे परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह बिगड़ चुका है। कई घरों में खाने-पीने तक में कटौती करनी पड़ रही है ताकि बच्चों की पढ़ाई जारी रखी जा सके
ग्रामीण और मध्यम वर्गीय परिवारों में स्थिति चिंताजनक
ग्रामीण और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों में स्थिति औरभी गंभीर है। यहां महिलाएं स्वयं सहायता समूह, छोटे फाइनेंस संस्थानों या महाजनों से 20 हजार से 50 हजार रुपये तक का कर्ज लेने को मजबूर हैं। कई परिवार ब्याज पर पैसा लेकर बच्चों का दाखिला करा रहे हैं। जिसका सूद मनमाना है। जिसका चुकता करना भारी पड़ेगा। अभिभावक दीपनारायण यादव,संतोष राय, मौसम कुमार, पंकज साह ने बताया कि शिक्षा के नाम पर यह आर्थिक बोझ अब लोगों को कर्ज के जाल में फंसाता जा रहा है। अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो पढ़ाई का सपना कई परिवारों के लिए भारी संकट बन सकता हैं।
किताबों की संख्या में वृद्धि
मालूम हो कि कक्षा पांचवीं से सातवीं तक जहां छह विषयों की पढ़ाई होती है, वहां निजी स्कूलों द्वारा 15 से 18 किताबें खरीदवाई जा रही हैं। साइंस की किताब 155 रुपये की है, लेकिन उसके साथ लैब मैनुअल 490 से 600 रुपये तक में दी जा रही है। कम्प्यूटर की किताबें भी 500 से 600 रुपये के बीच बेची जा रही हैं। कुल मिलाकर एक बच्चे की पढ़ाई पर हजारों रुपये का अतिरिक्त बोझ अभिभावक पर पड़ रहा है।
किताब ही स्कूल ड्रेस भी बना उगाही का बड़ा माध्यम
जिले के निजी स्कूलों में किताब ही नहीं बल्कि स्कूली ड्रेस भी शोषण का बड़ा जरिया बन गई है स्कूल प्रबंधन हर साल नए लुक की ड्रेस डिजाइन करते हैं और अभिभावकों को मजबूरी में स्कूल में है ड्रेस खरीदना जरूरी हो जाता है करण सिलेक्टेड ड्रेस अन्य जगहों पर नहीं मिलती है आश्चर्यजनक बात है गर्मी के मौसम में ही सर्दी के स्वेटर और ब्लेजर भी अभिभावकों को लेना मजबूरी बन गया है एक मोटे अनुमान के तहत 1000 तक की ड्रेस के लिए 8 से 10000हजार रुपये चुकाना पड़ता है।सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि अगले साल ड्रेस बदल जाती है।
कहते हैं अधिकारी
स्कूल फीस व अन्य मामले में मनमानी नहीं करें, इसकी जांच के लिए संबंधित पदाधिकारी को निर्देश दिये गए हैं
संग्राम सिंह (जिला शिक्षा पदाधिकारी सुपौल)


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